थ्री स्टार होटल के रेट पर बेड और इंश्योरेंस में OPD कवर: जानिए निजी अस्पतालों में इलाज सस्ता करने के लिए समिति ने दिए कौन-कौन से बड़े सुझाव
भारत में निजी स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र जहां एक तरफ आधुनिक तकनीकों और बेहतरीन इलाज की सुविधा प्रदान करता है, वहीं दूसरी ओर इसका लगातार महंगा होना आम नागरिकों के लिए चिंता का बड़ा कारण बना हुआ है। देश में हर साल करोड़ों लोग केवल किसी गंभीर बीमारी के इलाज के कारण अपनी जमा-पूंजी गंवा बैठते हैं या कर्ज के जाल में फंस जाते हैं। अस्पतालों के मनमाने बिल, कमरों के अत्यधिक किराए और दवाओं पर भारी मार्जिन जैसी समस्याओं से निपटने के लिए गठित उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति (Health Care Reform Panel) ने अपनी नवीनतम रिपोर्ट में कई क्रांतिकारी और व्यावहारिक सुझाव दिए हैं। यदि इन सिफारिशों को कड़ाई से लागू किया जाता है, तो देश के निजी अस्पतालों में इलाज न केवल किफ़ायती होगा बल्कि पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता भी आएगी।
3-स्टार होटल के टैरिफ पर बेड चार्जेस: कमरों के मनमाने किराए पर कसेगी लगाम
निजी अस्पतालों में भर्ती होने वाले मरीजों के लिए सबसे बड़ा वित्तीय बोझ कमरे का किराया (Bed/Room Rent) होता है। वर्तमान व्यवस्था में कई बड़े कॉर्पोरेट अस्पताल एक साधारण कमरे के लिए भी प्रतिदिन 10,000 से 25,000 रुपये तक वसूलते हैं। समिति ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए सिफारिश की है कि निजी अस्पतालों में बेड चार्जेस का निर्धारण संबंधित शहर या श्रेणी के आधार पर 3-स्टार होटल के औसत किराए की तर्ज पर कैप (सीमित) किया जाना चाहिए।
इसके अलावा, समिति ने उस प्रचलित व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त करने का सुझाव दिया है जिसके तहत कमरे की श्रेणी (जैसे जनरल वार्ड, ट्विन शेयरिंग या सिंगल प्राइवेट रूम) के आधार पर डॉक्टर की विजिटिंग फीस, नर्सिंग चार्ज, आईसीयू शुल्क और सर्जिकल प्रक्रिया की लागत बदल जाती है। समिति का स्पष्ट कहना है कि डॉक्टर का ज्ञान और सर्जिकल उपकरण वही रहते हैं, इसलिए केवल मरीज के महंगे कमरे में रहने के आधार पर इलाज का कुल खर्च बढ़ाना सर्वथा अनुचित है।
हेल्थ इंश्योरेंस में ओपीडी (OPD) और पैथोलॉजी कवर: जेब से होने वाले खर्च पर राहत
भारत में स्वास्थ्य बीमा (Health Insurance) का बड़ा दायरा अब भी केवल अस्पताल में 24 घंटे या उससे अधिक समय के लिए भर्ती होने (IPD) पर ही कवरेज प्रदान करता है। हालांकि, आंकड़े बताते हैं कि किसी भी आम नागरिक के स्वास्थ्य पर होने वाले कुल जेब खर्च (Out-of-Pocket Expenditure) का 60 से 70 प्रतिशत हिस्सा अस्पतालों के चक्कर काटने, डॉक्टरों की फीस (OPD Consultation), खून की जांच, एमआरआई/सीटी स्कैन और नियमित दवाओं में चला जाता है।
समिति ने बीमा विनियामक प्राधिकरण (IRDAI) और केंद्र सरकार को सुझाव दिया है कि सभी स्वास्थ्य बीमा पॉलिसियों में ओपीडी (OPD) और पैथोलॉजी टेस्ट को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए। इससे मरीज को छोटी-मोटी बीमारियों के इलाज या शुरुआती जांचों के लिए अपनी जेब से भारी रकम खर्च नहीं करनी पड़ेगी। साथ ही, समय पर जांच होने से गंभीर बीमारियों का शुरुआती दौर में ही पता लगाया जा सकेगा, जिससे बाद में होने वाले बड़े ऑपरेशनों का खर्च भी बचेगा।
जेनेरिक दवाएं, कंज्यूमेबल्स और इम्प्लांट्स की कीमतों पर मार्जिन कैपिंग
अस्पतालों में भर्ती मरीजों के अंतिम बिल को बड़ा बनाने में दवाओं और मेडिकल कंज्यूमेबल्स (जैसे दस्ताने, सिरिंज, ड्रिप सेट, कॉटन, पट्टियां आदि) का बड़ा हाथ होता है। अक्सर देखा गया है कि निजी अस्पताल मरीजों और उनके परिजनों को अस्पताल के इन-हाउस फार्मेसी से ही दवाएं खरीदने के लिए बाध्य करते हैं, जहां एमआरपी (MRP) पर 300 से 1000 प्रतिशत तक का भारी-भरकम मुनाफा वसूला जाता है।
समिति ने इस मुनाफाखोरी पर लगाम लगाने के लिए निम्नलिखित मुख्य सिफारिशें की हैं:
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ट्रेड मार्जिन पर सीमा: नॉन-शेड्यूल दवाओं और कंज्यूमेबल आइटम्स के ट्रेड मार्जिन पर अधिकतम 30 से 50 प्रतिशत की सीमा तय की जाए।
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बाहर से दवा खरीदने की छूट: मरीजों को यह पूरी आजादी दी जाए कि वे अस्पताल के बाहर किसी भी अधिकृत या जन औषधि केंद्र से दवाएं और मेडिकल सामान खरीद सकें।
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जेनेरिक साल्ट का उपयोग: डॉक्टरों के लिए ब्रांडेड दवाओं के स्थान पर केवल साल्ट (जेनेरिक) नाम लिखना अनिवार्य किया जाए।
स्टैंडर्ड इलाज पैकेज और डिजिटल रेट बोर्ड्स: बिलिंग में आएगी पूरी पारदर्शिता
अक्सर मरीजों की सबसे बड़ी शिकायत यह होती है कि भर्ती होते समय बताया गया अनुमानित बजट (Estimated Cost) डिस्चार्ज के समय दोगुना या तिगुना हो जाता है। बिल में दर्ज अज्ञात शुल्क और 'अदर चार्जेस' परिजनों को असमंजस में डाल देते हैं।
इस समस्या के समाधान के लिए समिति ने स्टैंडर्ड ट्रीटमेंट गाइडलाइंस (STG) और फिक्स्ड पैकेज दरों को लागू करने का सुझाव दिया है। मोतियाबिंद, एंजियोप्लास्टी, नी-रिप्लेसमेंट, हर्निया और गॉल ब्लेडर जैसी सामान्य और नियमित सर्जरी के लिए निश्चित पैकेज दरें तय की जानी चाहिए। इसके साथ ही, सभी निजी अस्पतालों को अपने रिसेप्शन, प्रवेश द्वार और आधिकारिक वेबसाइट पर इलाज, बेड चार्ज, जांच और सर्जिकल पैकेजों की दर सूची (Rate List) को डिजिटल बोर्ड के माध्यम से प्रदर्शित करना अनिवार्य किया जाना चाहिए।
मरीज अधिकार चार्टर और त्वरित शिकायत निवारण तंत्र (Grievance Redressal)
इलाज के दौरान मरीजों और उनके परिवारों के अधिकारों की रक्षा के लिए समिति ने 'पेशेंट राइट्स चार्टर' को कड़ाई से लागू करने पर बल दिया है। इसमें मरीज को अपनी बीमारी, इलाज के विकल्पों, दूसरे डॉक्टर से परामर्श (Second Opinion) लेने और मेडिकल रिकॉर्ड्स की कॉपी तुरंत प्राप्त करने का कानूनी अधिकार शामिल है।
समिति ने यह भी सिफारिश की है कि प्रत्येक जिले और राज्य स्तर पर एक स्वतंत्र 'हेल्थकेयर ओंबुड्समैन' (स्वास्थ्य लोकपाल) या शिकायत निवारण सेल का गठन किया जाए। यदि कोई अस्पताल तय मानकों से अधिक बिल वसूलता है, मरीज की मृत्यु होने पर बिल बकाया के नाम पर शव को रोकने की कोशिश करता है, या गलत इलाज करता है, तो मरीज के परिजन इस सेल में त्वरित ऑनलाइन शिकायत दर्ज करा सकेंगे, जिस पर 7 से 15 दिनों के भीतर सख्त कार्रवाई और पेनल्टी का प्रावधान होगा।
इन व्यापक सुझावों का मुख्य उद्देश्य देश में स्वास्थ्य सेवा प्रणाली को अधिक मानवीय, किफ़ायती और पारदर्शी बनाना है ताकि किसी भी परिवार को अपनी सेहत या अपनों के जीवन की रक्षा के लिए आर्थिक रूप से तबाह न होना पड़े।