सड़क में गड्ढे हैं या गड्ढों में सड़क? मुंबई-नासिक हाईवे की बदहाली से उबले लोग
विशेष रिपोर्टर, ठाणे/नासिक: "सड़क में गड्ढे हैं या गड्ढों में सड़क?"—यह सवाल आज मुंबई, ठाणे और नासिक के बीच सफर करने वाले लाखों दैनिक यात्रियों की जुबान पर है। मानसून की बारिश के बीच मुंबई-नासिक राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-160) की हालत इतनी खस्ताहाल और जानलेवा हो चुकी है कि इस मार्ग पर सफर करना किसी दुःस्वप्न से कम नहीं रह गया है। सड़कों पर बने कई-कई फीट गहरे गड्ढों, उड़ती धूल और घंटों लंबे ट्रैफिक जाम के कारण लोग त्रस्त हैं। हद तो तब हो गई जब हाईवे के इस बदहाल पैच पर जानलेवा गड्ढे के कारण ठाणे आपदा मोचन बल (TDRF) के एक निडर जवान की दर्दनाक सड़क हादसे में मौत हो गई। इस हृदयविदारक घटना के बाद भी राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) और स्थानीय प्रशासन की नींद न खुलने से जनता का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया है।
मुंबई को उत्तरी महाराष्ट्र और देश के अन्य हिस्सों से जोड़ने वाला यह अत्यंत महत्वपूर्ण और व्यस्ततम हाईवे आज हादसों का 'ब्लैक स्पॉट' बन चुका है। खड्डे भरने के नाम पर केवल मिट्टी और क्रशर डालकर खानापूर्ति किए जाने से पहली ही बारिश में गिट्टियां बिखर जाती हैं, जिससे दोपहिया वाहनों के फिसलने और भारी वाहनों के पलटने का खतरा लगातार बना रहता है।
TDRF जवान की शहादत और जानलेवा गड्ढों का सच
हाल ही में ठाणे आपदा प्रबंधन प्रकोष्ठ (TDRF) में कार्यरत जवान जब अपनी बाइक से ड्यूटी के लिए मुंबई-नासिक हाईवे से गुजर रहे थे, तभी भिवंडी-खारेगांव टोल नाके के पास सड़क पर बने एक गहरे गड्ढे में उनकी बाइक अनियंत्रित होकर गिर गई। संतुलन बिगड़ने के कारण पीछे से आ रहे एक तेज रफ्तार भारी वाहन (ट्रक) ने उन्हें कुचल दिया, जिससे मौके पर ही उनकी दर्दनाक मौत हो गई।
जो जवान हर दिन दूसरों की जान बचाने के लिए आपदाओं में कूद पड़ता था, वह खुद प्रशासन की लापरवाही और खस्ताहाल सड़क का शिकार बन गया। इस हादसे ने न केवल मृतक जवान के परिवार और सहकर्मियों को झकझोर कर रख दिया है, बल्कि आम जनता के मन में यह खौफ पैदा कर दिया है कि जब एक आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षित जवान इस हाईवे पर सुरक्षित नहीं है, तो आम नागरिकों की सुरक्षा की गारंटी कौन लेगा?
घंटों का ट्रैफिक जाम और आर्थिक नुकसान: भिवंडी से खारेगांव तक हाल बेहाल
मुंबई-नासिक हाईवे पर गड्ढों के कारण यातायात की गति थम सी गई है। जिस सफर को तय करने में सामान्यतः 1 से डेढ़ घंटे का समय लगता था, आज उसमें 4 से 5 घंटे लग रहे हैं।
हाईवे पर बदहाली के प्रमुख केंद्र:
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भिवंडी बायपास और पडघा पैच: यहां सड़क का अस्तित्व लगभग समाप्त हो चुका है। गिट्टियां उखड़ने से गाड़ियां रेंगने को मजबूर हैं।
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खारेगांव टोल नाका और मानकोली फ्लाईओवर: रोजाना किलोमीटर लंबा जाम लग रहा है। एम्बुलेंस, स्कूली बसें और दफ्तर जाने वाले लोग घंटों फंसे रहते हैं।
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मुंब्रा बायपास और साकेत ब्रिज: जर्जर पुलों और गड्ढों के चलते भारी वाहनों की आवाजाही से हादसों का खतरा बना हुआ है।
दैनिक यात्रियों का कहना है कि वे हर साल भारी-भरकम टोल टैक्स (Toll Tax) चुकाते हैं, लेकिन बदले में उन्हें केवल जानलेवा गड्ढे और मानसिक उत्पीड़न मिलता है। टोल नाकों पर गाड़ियां रोकने के लिए मुस्तैद रहने वाले अधिकारी सड़क की मरम्मत के नाम पर पूरी तरह आंखें मूंदे बैठे हैं।
आक्रोशित जनता और विपक्ष का हमला: "कब जागेगा NHAI और PWD प्रशासन?"
TDRF जवान की मौत और हाईवे की दुर्दशा के बाद ठाणे, भिवंडी और नासिक के स्थानीय नागरिकों, व्यापारिक संगठनों और राजनीतिक दलों का गुस्सा फूट पड़ा है। मनसे (MNS), शिवसेना (यूबीटी) और स्थानीय नागरिक संगठनों ने हाईवे पर विरोध प्रदर्शन करते हुए टोल वसूली तुरंत बंद करने की मांग की है।
जनता और प्रदर्शनकारियों के मुख्य सवाल:
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टोल वसूली पर रोक क्यों नहीं? जब हाईवे चलने लायक ही नहीं है, तो आम जनता से रोजाना करोड़ों रुपये का टोल क्यों वसूला जा रहा है?
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घटिया सामग्री की जांच कब? हर साल बारिश में ही हाईवे की परतें क्यों उधड़ जाती हैं? ठेकेदारों और पीडब्ल्यूडी (PWD) अधिकारियों की मिलीभगत की निष्पक्ष जांच क्यों नहीं कराई जाती?
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हत्या का मामला दर्ज हो: नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मांग है कि सड़क पर गड्ढों के कारण होने वाली मौतों को 'हादसा' न मानकर संबंधित ठेकेदारों और NHAI के अधिकारियों पर गैर-इरादतन हत्या (Section 105 BNS) का मामला दर्ज किया जाना चाहिए।
प्रशासन की ढुलमुल सफाई: क्या कभी सुधरेगी मुंबई-नासिक हाईवे की सूरत?
हादसे और बढ़ते जनआक्रोश के बाद एनएचएआई और पीडब्ल्यूडी के अधिकारियों ने बयान जारी करते हुए कहा है कि भारी बारिश के कारण पैचवर्क (Patchwork) टिकाऊ नहीं हो पा रहा है। बारिश थमते ही 'कोल्ड मिक्स' और पेवर ब्लॉक की मदद से गड्ढों को भरने का काम युद्धस्तर पर शुरू किया जाएगा।
हालांकि, जनता को प्रशासन के इन खोखले आश्वासनों पर अब कोई भरोसा नहीं रहा। लोगों का कहना है कि प्रशासन केवल किसी बड़े हादसे का इंतजार करता रहता है और जब तक स्थायी रूप से कंक्रीट की गुणवत्तापूर्ण सड़कें नहीं बनाई जातीं, तब तक मुंबई-नासिक हाईवे पर मौतों का यह सिलसिला यूं ही जारी रहेगा। जब तक संबंधित अधिकारियों और लापरवाह ठेकेदारों पर कड़ा कानूनी शिकंजा नहीं कसा जाएगा, तब तक "सड़क में गड्ढे हैं या गड्ढों में सड़क" का यह भयावह मंजर खत्म होने वाला नहीं है।