Hindi Diwas: संविधान सभा में हुआ था सबसे तीखा मंथन, 3 साल की मैराथन बहस के बाद मुंशी-आयंगर फॉर्मूले से ऐसे राजभाषा बनी 'हिंदी'

Hindi Diwas: संविधान सभा में हुआ था सबसे तीखा मंथन, 3 साल की मैराथन बहस के बाद मुंशी-आयंगर फॉर्मूले से ऐसे राजभाषा बनी 'हिंदी'

प्रत्येक वर्ष 14 सितंबर को पूरा देश 'राष्ट्रीय हिंदी दिवस' (National Hindi Diwas) अत्यंत गर्व और उल्लास के साथ मनाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि स्वतंत्र भारत की संपर्क और प्रशासनिक भाषा के रूप में हिंदी को स्थापित करने की राह आसान नहीं थी? आज के ही दिन यानी 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा (Constituent Assembly) ने लगभग तीन वर्षों के गहन विचार-विमर्श, तीखी बहसों और भाषाई मतभेदों के बाद ऐतिहासिक फैसला लेते हुए देवनागरी लिपि में हिंदी को भारत संघ की 'राजभाषा' (Official Language) के रूप में स्वीकार किया था। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 343(1) इसी ऐतिहासिक दिन की देन है, जो घोषित करता है कि "संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी।"

संविधान सभा में भाषाई संग्राम: राष्ट्रभाषा बनाम राजभाषा की बहस

वर्ष 1946 में जब संविधान सभा का गठन हुआ, तब देश के सामने सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह था कि सदियों की गुलामी के बाद आजाद भारत का राजकाज किस भाषा में चलेगा। ब्रिटिश शासन में सारा आधिकारिक कामकाज अंग्रेजी में होता था, जबकि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक और सुभाष चंद्र बोस जैसे नेताओं ने देश को जोड़ने के लिए 'हिंदुस्तानी' (हिंदी और उर्दू का मिलाजुला रूप) या सरल हिंदी की वकालत की थी।

संविधान सभा में भाषा को लेकर तीन प्रमुख विचार खुलकर आमने-सामने आ गए थे:

  • कट्टर समर्थक गुट: पुरुषोत्तम दास टंडन, सेठ गोविंद दास, संपूर्णानंद और बाबू काका कालेलकर जैसे दिग्गज चाहते थे कि संस्कृतनिष्ठ हिंदी को तुरंत भारत की 'राष्ट्रभाषा' (National Language) घोषित किया जाए और अंग्रेजी को पूरी तरह बाहर किया जाए।

  • गैर-हिंदी भाषी राज्यों का रुख: दक्षिण भारतीय राज्यों (मद्रास प्रांत) और बंगाल के प्रतिनिधियों—जैसे टी.टी. कृष्णमाचारी, एन. गोपालस्वामी आयंगर और दुर्गाबाई देशमुख—का तर्क था कि गैर-हिंदी भाषियों पर हिंदी थोपने से राष्ट्रीय एकता को नुकसान पहुंच सकता है। वे अंग्रेजी को प्रशासनिक कामकाज में जारी रखने के पक्षधर थे।

  • महात्मा गांधी और नेहरू का दृष्टिकोण: पंडित जवाहरलाल नेहरू और मौलाना अबुल कलाम आजाद साझा संस्कृति वाली 'हिंदुस्तानी' भाषा के पक्ष में थे, ताकि समाज के हर वर्ग को साथ लेकर चला जा सके।

'मुंशी-आयंगर फॉर्मूला': जिसने तोड़ा 3 साल का गतिरोध

जब भाषा पर सहमति बनना लगभग असंभव लग रहा था और संविधान सभा के भीतर विभाजन की नौबत आ गई, तब दो प्रख्यात विद्वानों—के.एम. मुंशी (K.M. Munshi) और एन. गोपालस्वामी आयंगर (N. Gopalaswami Ayyangar)—ने एक ऐतिहासिक समझौता प्रस्ताव तैयार किया, जिसे इतिहास में 'मुंशी-आयंगर फॉर्मूला' (Munshi-Ayyangar Formula) कहा जाता है।

इस फॉर्मूले के मुख्य बिंदु इस प्रकार थे:

  • राजभाषा का दर्जा, राष्ट्रभाषा का नहीं: विवाद को शांत करने के लिए हिंदी को 'राष्ट्रभाषा' के बजाय केंद्र की 'राजभाषा' (Official Language) का दर्जा दिया गया, ताकि क्षेत्रीय भाषाओं के अस्तित्व पर कोई आंच न आए।

  • 15 वर्षों के लिए अंग्रेजी का उपयोग जारी: संविधान लागू होने (26 जनवरी 1950) से अगले 15 वर्षों यानी 1965 तक संघ के सभी आधिकारिक कार्यों में अंग्रेजी का उपयोग पहले की तरह जारी रखने की व्यवस्था की गई।

  • अंकों का अंतरराष्ट्रीय रूप: एक बड़ा विवाद अंकों को लेकर था। दक्षिण भारत और अन्य प्रांतों के सुझाव पर तय हुआ कि भारतीय अंकों का अंतरराष्ट्रीय रूप (1, 2, 3...) ही आधिकारिक उपयोग में लाया जाएगा, न कि देवनागरी अंक (१, २, ३...)।

व्यौहार राजेंद्र सिंह का 50वां जन्मदिन और 14 सितंबर का चयन

14 सितंबर की तारीख के चयन के पीछे एक बेहद प्रेरक व्यक्तिगत योगदान भी शामिल है। प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार, विद्वान और संस्कृतिकर्मी व्यौहार राजेंद्र सिंह (Beohar Rajendra Simha) ने हिंदी को संविधान में आधिकारिक स्थान दिलाने के लिए काका कालेलकर, मैथिलीशरण गुप्त और हजारी प्रसाद द्विवेदी के साथ मिलकर देशव्यापी सघन अभियान चलाया था।

14 सितंबर 1949 को व्यौहार राजेंद्र सिंह का 50वां जन्मदिन था। संविधान सभा ने उनके अथक प्रयासों और हिंदी के प्रति समर्पण को सम्मान देते हुए इसी दिन हिंदी को संघ की आधिकारिक भाषा के रूप में अंगीकार करने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया।

1953 से औपचारिक शुरुआत: कैसे बना राष्ट्रीय उत्सव?

संविधान सभा के इस फैसले के महत्व को रेखांकित करने और देश भर में हिंदी के प्रचार-प्रसार को गति देने के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा ने एक विशेष दिन तय करने का अनुरोध किया था।

  • तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की पहल पर भारत सरकार ने वर्ष 1953 से प्रत्येक 14 सितंबर को औपचारिक रूप से 'राष्ट्रीय हिंदी दिवस' के रूप में मनाने की घोषणा की।

  • इसके बाद से ही हर साल 14 सितंबर को राष्ट्रपति भवन में 'राजभाषा कीर्ति पुरस्कार' और 'राजभाषा गौरव पुरस्कार' प्रदान किए जाते हैं, जो केंद्र सरकार के मंत्रालयों, सार्वजनिक उपक्रमों और नागरिकों को हिंदी में उत्कृष्ट कार्य के लिए दिए जाते हैं।

आधुनिक युग में हिंदी: डिजिटल दुनिया से वैश्विक मंच तक

आज 21वीं सदी में हिंदी केवल सरकारी फाइलों या साहित्य तक सीमित नहीं रही है, बल्कि यह दुनिया की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा बन चुकी है। इंटरनेट, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सर्च इंजन, सोशल मीडिया और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर हिंदी कंटेंट की मांग में पिछले एक दशक में हजारों गुना की बढ़ोतरी हुई है। संविधान सभा में हुए उस ऐतिहासिक मंथन की बदौलत ही आज हिंदी अपनी लोकतांत्रिक और बहुभाषी पहचान को सुरक्षित रखते हुए वैश्विक ज्ञान और तकनीक की भाषा बनने की दिशा में अग्रसर है।