छात्र प्रदर्शन मामले में सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस, प्रशांत भूषण के सवाल पर सॉलिसिटर जनरल का तीखा पलटवार

छात्र प्रदर्शन मामले में सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस, प्रशांत भूषण के सवाल पर सॉलिसिटर जनरल का तीखा पलटवार

देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट में छात्र प्रदर्शन से जुड़े संवेदनशील और बहुचर्चित मामले की सुनवाई के दौरान एक बार फिर से बेहद तीखी बहस और नाटकीय घटनाक्रम देखने को मिला है। न्यायालय कक्ष के भीतर उस समय माहौल गर्म हो गया जब वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने इस मामले की निगरानी के लिए गठित की गई हाई पावर्ड कमेटी के एक सदस्य की निष्पक्षता और साख पर सीधा सवालिया निशान खड़ा कर दिया। प्रशांत भूषण द्वारा उठाए गए इस आपत्तिजनक कदम पर केंद्र सरकार की ओर से पक्ष रख रहे सॉलिसिटर जनरल ने बेहद कड़ा ऐतराज जताते हुए तीखा पलटवार किया और कहा कि याचिकाकर्ता पक्ष की कार्यशैली ऐसी है कि यदि उनके चश्मे से देखा जाए तो उन्हें केवल कुछ गिने-चुने लोगों को छोड़कर बाकी पूरी व्यवस्था और हर शख्स 'बेईमान' ही नजर आता है। इस हाई-प्रोफाइल सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के बीच हुई इस गर्मागरम बहस ने न्यायिक गलियारों में खलबली मचा दी है, क्योंकि यह पूरा मामला देश की कानून-व्यवस्था, छात्रों के अधिकारों और प्रशासनिक पारदर्शिता से गहराई से जुड़ा हुआ है।

हाई पावर्ड कमेटी का गठन और 15 सितंबर को होने वाली आगामी बैठक पर अपडेट

सुप्रीम कोर्ट में चल रही इस महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को आधिकारिक रूप से अवगत कराया कि छात्र प्रदर्शन से जुड़े विभिन्न पहलुओं और शिकायतों की निष्पक्ष जांच व समाधान के लिए सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार गठित की गई हाई पावर्ड कमेटी ने अब जमीनी स्तर पर अपना कार्य पूरी सक्रियता के साथ शुरू कर दिया है। सरकार की ओर से अदालत को यह भी जानकारी दी गई कि इस उच्चाधिकार प्राप्त समिति की अगली और बेहद महत्वपूर्ण बैठक आगामी 15 सितंबर को प्रस्तावित है, जिसमें कई अहम बिंदुओं पर मंथन किया जाएगा। हालांकि, जैसे ही कमेटी के कामकाज और उसकी कार्यप्रणाली पर चर्चा शुरू हुई, याचिकाकर्ता पक्ष की तरफ से पेश हुए वकीलों ने अदालत से विशेष आग्रह किया कि इस कमेटी के कामकाज और उसकी दैनिक प्रगति की रिपोर्ट सीधे सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचाने के लिए किसी स्वतंत्र एमिकस क्यूरी (न्यायमित्र) या फिर एक जिम्मेदार नोडल अधिकारी की तुरंत नियुक्ति की जानी चाहिए। वकीलों का तर्क था कि यदि कोई नोडल अधिकारी नियुक्त होगा, तो न केवल अदालत को कमेटी के हर कदम की सटीक जानकारी मिलती रहेगी, बल्कि आम पीड़ित और मामले से जुड़े अन्य वकील भी अपनी बात और दस्तावेज सुगमता से उस कमेटी तक पहुँचा सकेंगे।

प्रशांत भूषण द्वारा कमेटी के सदस्य पर सवाल और जस्टिस बागची की महत्वपूर्ण टिप्पणी

सुनवाई के दौरान जब वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने हाई पावर्ड कमेटी में शामिल एक विशिष्ट सदस्य की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए उसकी विश्वसनीयता पर संदेह व्यक्त किया, तो अदालत कक्ष में मौजूद सभी लोगों की धड़कनें तेज हो गईं। प्रशांत भूषण के इस आरोप पर तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए सॉलिसिटर जनरल ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई और तीखे लहजे में कहा कि याचिकाकर्ता पक्ष की यह प्रवृत्ति बन चुकी है कि वे अपनी पसंद के लोगों को छोड़कर बाकी हर संस्था और व्यक्ति की ईमानदारी पर सवालिया निशान लगा देते हैं, मानों उनके हिसाब से बाकी सभी लोग बेईमान हों। इस गरमागरम बहस के बीच बेंच के सम्मानित सदस्य जस्टिस बागची ने हस्तक्षेप करते हुए बेहद संतुलित और सख्त टिप्पणी की। जस्टिस बागची ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस हाई पावर्ड कमेटी का गठन सुप्रीम कोर्ट ने किसी जल्दबाजी में नहीं, बल्कि बेहद गंभीर विचार-विमर्श और मंथन के बाद किया है, इसलिए इसकी निष्पक्षता और गरिमा पर बेवजह सवाल उठाना उचित नहीं है। अदालत के इस रुख ने साफ कर दिया कि न्यायपालिका अपने द्वारा गठित संस्थाओं के कामकाज को लेकर पूरी तरह गंभीर और अडिग है।

जंतर-मंतर की घटना के प्रत्यक्षदर्शी और 14 साल की नाबालिग गवाह की सुरक्षा का मुद्दा

अदालत में सुनवाई आगे बढ़ी तो याचिकाकर्ता पक्ष के एक अन्य वकील ने जंतर-मंतर पर हुए छात्र प्रदर्शन और हिंसक झड़प की घटना के एक प्रत्यक्षदर्शी को सीधे कोर्ट के सामने पेश कर दिया और उसे अपनी बात रखने की अनुमति दिए जाने की पुरजोर मांग की। इस पर सुप्रीम कोर्ट के जजों ने स्पष्ट किया कि किसी भी गवाह या पीड़ित को व्यक्तिगत रूप से अदालत में आने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि हर कोई अपनी शिकायत लेकर इस नवनिर्मित हाई पावर्ड कमेटी के सामने जा सकता है और अपनी बात रख सकता है। इसके जवाब में वकील ने मांग उठाई कि ऐसे कई गवाह और पीड़ित हैं जो खुद को अत्यधिक असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, इसलिए उनकी गोपनीय बातें सुनने और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक विशेष नोडल अधिकारी का होना अनिवार्य है। वकील ने विशेष रूप से हवाला दिया कि इस मामले में एक 14 साल की नाबालिग बच्ची भी गवाह है और वह भी वर्तमान में खुद को बेहद असुरक्षित महसूस कर रही है। इस मांग पर भी सॉलिसिटर जनरल ने तीखा प्रहार करते हुए कहा कि सोशल मीडिया पर दिन में पांच-पांच बार सक्रिय रहने वाले लोग भी खुद को ऐसा 'असुरक्षित गवाह' बता रहे हैं जिनकी पहचान छिपाना जरूरी बताया जा रहा है, जबकि यदि किसी को वास्तव में अपनी बात रखनी है तो वह कमेटी के आधिकारिक सेक्रेट्री के माध्यम से अपनी बात रख सकता है। इसी बीच, वरिष्ठ वकील हरिहरन ने एक रचनात्मक सुझाव देते हुए कहा कि यदि यह कमेटी अपनी शिकायतों के निवारण के लिए एक समर्पित ऑनलाइन पोर्टल शुरू कर दे, तो देश के किसी भी कोने से आम लोगों और पीड़ितों के लिए अपनी बात सीधे कमेटी तक पहुँचाना बेहद आसान और पारदर्शी हो जाएगा।

14 साल की बच्ची को धमकाने का गंभीर मामला और उत्तर प्रदेश-दिल्ली पुलिस को नोटिस

सुनवाई के दौरान सबसे संवेदनशील और चिंताजनक मुद्दा 14 साल की एक नाबालिग लड़की को लगातार मिल रही धमकियों का उठा। वकील ने अदालत को बताया कि उस 14 साल की लड़की को गंभीर परिणाम भुगतने की धमकियां दी जा रही हैं, और तो और, जब उस बच्ची और उसके परिवार ने न्याय पाने के लिए कानूनी कदम उठाया और थाने में एफआईआर दर्ज कराई, तो उसके जवाब में दबंगों द्वारा उस बच्ची और उसके परिजनों के खिलाफ ही कई झूठी काउंटर एफआईआर दर्ज करवा दी गईं। वकील ने आरोप लगाया कि लड़की को खुलेआम डराने-धमकाने वाले लोग आज भी बेखौफ होकर बाहर घूम रहे हैं। इस गंभीर जानकारी को सुनते ही सुप्रीम कोर्ट का पारा चढ़ गया और अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि यह बिल्कुल भी स्वीकार नहीं किया जा सकता कि अपने लोकतांत्रिक अधिकारों और न्याय के लिए गुहार लगा रही एक छोटी बच्ची को इस तरह प्रताड़ित किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने कड़े निर्देश देते हुए कहा कि यदि आवश्यकता हो, तो उस बच्ची और उसके पूरे परिवार को तत्काल प्रभाव से पुलिस सुरक्षा मुहैया कराई जानी चाहिए। साथ ही, अदालत ने इस पूरे मामले पर उत्तर प्रदेश सरकार और दिल्ली पुलिस प्रशासन से विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट तलब की है, जिससे यह साफ हो गया है कि न्यायपालिका बच्चों की सुरक्षा और उनके अधिकारों के हनन पर किसी भी प्रकार की ढिलाई बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।

प्रदर्शन के दौरान मेट्रो स्टेशन बंद करने के खिलाफ याचिका पर नोटिस जारी

छात्र प्रदर्शन मामले से जुड़ी इस मैराथन सुनवाई के अंत में एक अन्य वकील ने एक और अहम कानूनी और प्रशासनिक मुद्दा कोर्ट के सामने उठाया। वकील ने दलील दी कि जब छात्र जंतर-मंतर या अन्य स्थानों पर प्रदर्शन कर रहे थे, उस दौरान प्रशासन द्वारा शहर के कई प्रमुख मेट्रो स्टेशनों को अचानक और बिना किसी ठोस कारण के बंद कर दिया गया था, जिससे आम नागरिकों, कामकाजी लोगों और छात्रों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ा था। वकील ने मेट्रो स्टेशनों को इस प्रकार बंद किए जाने की कार्रवाई को पूरी तरह से गैरकानूनी और नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन करार देते हुए इस मुद्दे पर एक अलग और स्वतंत्र याचिका के तहत सुनवाई किए जाने की मांग की। अदालत ने इस गंभीर प्रशासनिक मुद्दे पर संज्ञान लेते हुए संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर दिया है, जिससे आने वाले दिनों में प्रशासनिक फैसलों और जन-आंदोलनों के दौरान बरती जाने वाली पाबंदियों को लेकर भी कानूनी दायरे में एक बड़ी बहस छिड़ने की पूरी संभावना बन गई है।