Kanpur Protest : एक FIR से कानपुर की सियासत में उबाल, अपनी ही सरकार के खिलाफ धरने पर बैठ सकते हैं मंत्री?

Post

News India Live, Digital Desk:  Kanpur Protest :  उत्तर प्रदेश के कानपुर में इन दिनों राजनीतिक पारा चढ़ा हुआ है। मामला इतना गरमा गया है कि एक पूर्व सांसद ने अपनी ही पार्टी की सरकार के खिलाफ आंदोलन का ऐलान कर दिया है, और अब दबाव में आकर राज्य सरकार के एक मंत्री भी उसी राह पर चलने की तैयारी में दिख रहे हैं। यह पूरा सियासी ड्रामा एक FIR को लेकर शुरू हुआ है, जिसने भारतीय जनता पार्टी (BJP) के दो बड़े नेताओं को आमने-सामने ला खड़ा किया है।

कहां से शुरू हुआ यह विवाद?

कहानी शुरू होती है कुछ दिन पहले घाटमपुर इलाके में हुई एक मारपीट की घटना से। इस घटना में एक पक्ष राज्य मंत्री राकेश सचान के एक रिश्तेदार का था, तो दूसरा पक्ष पूर्व सांसद और बीजेपी नेता बाबूराम निषाद के समर्थकों का। मारपीट के बाद पुलिस ने मंत्री के रिश्तेदार की तहरीर पर पूर्व सांसद के समर्थकों के खिलाफ FIR दर्ज कर ली।

बस यहीं से सारा विवाद खड़ा हो गया। पूर्व सांसद बाबूराम निषाद और उनके समर्थक इस बात से नाराज हो गए कि पुलिस ने एकतरफा कार्रवाई की और उनके पक्ष की बात नहीं सुनी।

जब पूर्व सांसद ने किया आंदोलन का ऐलान

बाबूराम निषाद ने पुलिस की कार्रवाई को "दबाव में लिया गया फैसला" बताते हुए खुली बगावत का बिगुल फूंक दिया। उन्होंने ऐलान कर दिया कि अगर उनके समर्थकों के खिलाफ दर्ज FIR की निष्पक्ष जांच नहीं हुई और दूसरे पक्ष पर कार्रवाई नहीं की गई, तो वह अपने हजारों समर्थकों के साथ आंदोलन करेंगे और धरने पर बैठेंगे। उनके इस ऐलान के बाद से ही घाटमपुर समेत पूरे कानपुर की सियासत में भूचाल आ गया है।

अब मंत्री जी क्यों हैं असमंजस में?

कहानी में असली ट्विस्ट तो अब आया है। पूर्व सांसद के ऐलान के बाद, अब मंत्री राकेश सचान पर उनके अपने समर्थकों का दबाव बढ़ गया है। एक तरफ जहां वह सरकार का हिस्सा हैं, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय राजनीति में अपनी पकड़ बनाए रखना भी उनकी मजबूरी है। अगर पूर्व सांसद धरना देते हैं, तो यह सीधे तौर पर मंत्री के अपने क्षेत्र में उनकी कमजोरी के तौर पर देखा जाएगा।

इसी राजनीतिक दबाव के चलते अब ऐसी खबरें आ रही हैं कि मंत्री राकेश सचान भी अपने समर्थकों के साथ जवाबी धरने पर बैठ सकते हैं, ताकि वह यह दिखा सकें कि वह भी अपने लोगों के साथ मजबूती से खड़े हैं।

यह स्थिति बीजेपी के लिए "सांप-छछूंदर" वाली हो गई है। एक ही पार्टी के दो बड़े नेता एक-दूसरे के खिलाफ खुलकर मैदान में उतरने को तैयार हैं, जिससे पार्टी की अंदरूनी कलह सतह पर आ गई है। अब देखना यह है कि क्या पार्टी हाईकमान इस मामले में दखल देकर दोनों नेताओं के बीच सुलह करा पाता है, या कानपुर की सड़कें अपनी ही पार्टी के नेताओं के धरने और प्रदर्शनों की गवाह बनेंगी।