दर्द जब शब्दों में कोई पिरो नहीं पाता, तो वह आंखों से बह निकलता है': सीएम हेमंत सोरेन की संवेदनशीलता के विरोधी भी हुए कायल
झारखंड की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में अक्सर तीखे बयानों, राजनीतिक हमलों और सत्ता पक्ष तथा विपक्ष के बीच जुबानी जंग की खबरें ही सुर्खियां बटोरती हैं, लेकिन कई बार कुछ ऐसी तस्वीरें और प्रसंग सामने आ जाते हैं जो तमाम राजनीतिक दूरियों और मतभेदों को दरकिनार कर इंसानियत की एक ऐसी अमिट मिसाल पेश करते हैं जो सीधे आम जनता के दिलों को छू लेती है। हाल ही में राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का एक ऐसा ही बेहद संवेदनशील और भावुक रूप देखने को मिला है, जिसने न केवल उनके समर्थकों बल्कि उनके धुर राजनीतिक विरोधियों को भी अंदर से झकझोर कर रख दिया है। यह वाकया उस समय का है जब मुख्यमंत्री राज्य के किसी दौरे या जनसंवाद कार्यक्रम के दौरान एक ऐसे पीड़ित परिवार या जरूरतमंद व्यक्ति से मिले, जिसके दुखों को देखकर उनके चेहरे के भाव और आंखों की नमी यह बयां कर रही थी कि एक शीर्ष पद पर बैठा व्यक्ति भी जनता के दर्द को कितनी गहराई से महसूस कर सकता है। इस घटना के बाद से झारखंड के राजनीतिक हलकों में यह चर्चा जोर पकड़ चुकी है कि एक राजनेता के रूप में उनकी कार्यशैली चाहे जो हो, लेकिन एक इंसान के रूप में उनकी यह संवेदनशीलता उन्हें पारंपरिक राजनेताओं की भीड़ से बिल्कुल अलग खड़ा करती है।
जब सियासत के मंच पर इंसानी जज्बात और आंसू बने सबसे बड़ी ताकत
भारतीय राजनीति में नेताओं को आमतौर पर एक सख्त, कड़े तेवर वाले और राजनीतिक नफा-नुकसान का हिसाब लगाने वाले शख्स के रूप में देखा जाता है, जो जनता के बीच अपनी एक मजबूत और अजेय छवि बनाए रखना चाहते हैं। लेकिन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का यह भावुक अंदाज यह साबित करता है कि जनता की समस्याओं के प्रति संवेदनशीलता और उनके आंसुओं से जुड़ पाना किसी भी सच्चे जननेता की सबसे बड़ी पूंजी होती है। जब कोई पीड़ित व्यक्ति अपनी फरियाद लेकर मुख्यमंत्री के सामने पहुंचता है और अपनी आपबीती सुनाता है, तो उस दर्द को सुनकर यदि देश या राज्य का मुखिया भी भावुक हो जाए, तो यह उस तंत्र के मानवीय होने का सबसे बड़ा प्रमाण माना जाता है। राजनीति के गलियारों में जहां लोग हर बात को चुनावी चश्मे से देखने के आदी हो चुके हैं, वहां इस तरह की घटनाएं लोगों को यह अहसास कराती हैं कि सत्ता के सिंहासन पर बैठने वाले लोग भी अंततः मांस-पोष के इंसान ही हैं, जिनका दिल जनता की पीड़ा को देखकर पसीज जाता है।
राजनीतिक विरोधियों द्वारा भी मुख्यमंत्री के इस मानवीय पक्ष की सराहना
झारखंड की राजनीति में विपक्ष हमेशा सरकार की नीतियों, विकास कार्यों और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर तीखे हमले करने का कोई मौका नहीं छोड़ता है, और यह लोकतंत्र का एक स्वाभाविक हिस्सा भी है। लेकिन जब बात किसी की व्यक्तिगत पीड़ा, संवेदना या मानवीयता की आती है, तो कई बार विरोधी खेमे के नेता भी इस बात को स्वीकार करने से पीछे नहीं हटते कि मुख्यमंत्री का यह रुख उनकी सहृदयता को दर्शाता है। राजनीति से ऊपर उठकर इंसानी रिश्तों और भावनाओं का सम्मान करना भारतीय संस्कृति की पुरानी परंपरा रही है, और जब कोई जननेता इस परंपरा को मंच पर जीवंत कर देता है, तो वह विरोधियों के दिलों में भी अपनी एक अलग जगह बना लेता है। इस पूरी घटना के बाद सोशल मीडिया से लेकर आम चौपालों तक यही चर्चा है कि राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन एक मुख्यमंत्री के रूप में जनता के दुख में सहभागी बनना और उनके आंसुओं को पोछने की कोशिश करना एक सराहनीय कदम है।
झारखंड की जनता और सरकार के बीच संवाद का एक नया और संवेदनशील सेतु
एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता और सरकार के बीच की दूरी को पाटने के लिए केवल योजनाएं या सरकारी फाइलें ही काफी नहीं होतीं, बल्कि उसके लिए एक भावनात्मक जुड़ाव की भी उतनी ही जरूरत होती है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का यह संवेदनशील व्यवहार इस बात का प्रतीक है कि वे आम जनता की नब्ज़ को कितनी अच्छी तरह समझते हैं और राज्य के दूरदराज इलाकों से आने वाले गरीबों के दर्द से खुद को कितना जुड़ा हुआ पाते हैं। जब जनता देखती है कि उनका मुखिया उनकी तकलीफों पर केवल भाषण नहीं देता बल्कि उनके साथ सचमुच संवेदनशील नजर आता है, तो सरकार के प्रति उनका भरोसा और अधिक मजबूत हो जाता है। इस प्रकार की घटनाएं प्रशासन और जनता के बीच के अविश्वास की दीवार को गिराकर एक ऐसा मजबूत और मानवीय सेतु तैयार करती हैं, जो राज्य के विकास और सामाजिक समरसता दोनों के लिए बेहद आवश्यक माना जाता है।
संवेदनशीलता से भरी यह राजनीति आने वाले समय के लिए एक सकारात्मक संदेश
आज के इस दौर में जहां राजनीति का स्तर लगातार गिरता जा रहा है और व्यक्तिगत छींटाकशी तथा बयानबाजी को मुख्यधारा मान लिया गया है, वहां इस तरह की मानवीय घटनाएं उम्मीद की एक नई किरण जगाती हैं। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का यह रूप इस बात की याद दिलाता है कि सत्ता और कुर्सी का असली महत्व तभी है जब उसका उपयोग समाज के सबसे आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति के आंसू पोछने और उसके जीवन में उजाला लाने के लिए किया जाए। राजनीति में विरोध और समर्थन का दौर तो हमेशा चलता रहेगा, लेकिन किसी राजनेता का संवेदनशील होना और जनता के दर्द को अपना दर्द समझना ही उसे इतिहास के पन्नों में अमर बनाता है। यह घटना न केवल झारखंड की राजनीति के लिए बल्कि देश भर के अन्य जनप्रतिनिधियों के लिए भी एक बड़ा सबक है कि जनता केवल वादे नहीं बल्कि एक ऐसा सच्चा और संवेदनशील दिल चाहती है जो उनकी हर खुशी और गम में उनके साथ खड़ा रह सके।