झारखंड के ग्रामीण इलाकों में बच्चों की शिक्षा के रास्ते में कौन-सी जानलेवा भौगोलिक चुनौतियां खड़ी

झारखंड के ग्रामीण इलाकों में बच्चों की शिक्षा के रास्ते में कौन-सी जानलेवा भौगोलिक चुनौतियां खड़ी

देश के एक तरफ जहां डिजिटल शिक्षा और स्मार्ट क्लासरूम की बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं, वहीं दूसरी तरफ हमारे देश के कई दूरदराज और ग्रामीण इलाकों में आज भी मासूम बच्चे बुनियादी सुविधाओं के लिए किस कदर जूझ रहे हैं, इसकी एक बेहद दर्दनाक और डरावनी तस्वीर झारखंड से सामने आई है। झारखंड के एक सुदूर ग्रामीण इलाके में स्थित सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले लगभग 629 बच्चे रोज अपनी जान हथेली पर रखकर स्कूल जाने को मजबूर हैं, क्योंकि उनके रास्ते में कोई सुरक्षित पुल या पक्की सड़क मौजूद नहीं है। मानसून के इस मौसम में जब बारिश के कारण इलाके के स्थानीय नाले और नदियां उफान पर होती हैं, तो इन नौनिहालों को अपने छोटे-छोटे बस्ते कंधे पर लादकर और जान जोखिम में डालकर तेज धार वाले पानी को पार करना पड़ता है। स्थानीय ग्रामीणों और अभिभावकों का कहना है कि उन्होंने कई बार जनप्रतिनिधियों और जिला प्रशासन से गुहार लगाई है कि कम से कम बच्चों के आने-जाने के लिए एक सुरक्षित पुल का निर्माण कराया जाए, लेकिन हर बार उन्हें केवल झूठे आश्वासन के अलावा कुछ हासिल नहीं हुआ है। बच्चों की सुरक्षा को लेकर माता-पिता हर पल दहशत में रहते हैं कि न जाने कब कोई बड़ा हादसा इन मासूमों की जिंदगी पर भारी पड़ जाए।

स्कूल जाने वाले 629 बच्चों की इस दैनिक मुश्किल यात्रा के दौरान किन भयानक जोखिमों का सामना करना पड़ता है?
जब सुबह के वक्त ये 629 छात्र अपने घरों से शिक्षा ग्रहण करने के लिए निकलते हैं, तो उनके परिजनों की सांसें तब तक अटकी रहती हैं जब तक वे वापस सुरक्षित घर नहीं लौट आते हैं। स्कूल पहुँचने के लिए इन बच्चों के पास या तो घुटनों से ऊपर बहते गंदे पानी और तेज बहाव वाले नाले को पार करने का विकल्प होता है या फिर पढ़ाई छोड़ने का, और ये मासूम भविष्य संवारने की जिद में हर रोज इस मौत के खेल को खेलने के लिए विवश हैं। कई बार बारिश इतनी तेज होती है कि पानी का स्तर इतना बढ़ जाता है कि छोटे बच्चे उसमें बहने से बाल-बाल बचते हैं, जिन्हें बड़े बच्चे या ग्रामीण मिलकर किसी तरह संभालते हैं। स्कूल के शिक्षकों का भी यह कहना है कि इस प्रकार की खतरनाक परिस्थितियों के कारण बच्चों की उपस्थिति (Attendance) पर बहुत बुरा असर पड़ता है, और बारिश के दिनों में कई बच्चे स्कूल ही नहीं आ पाते हैं। शिक्षा का अधिकार (RTE) और बच्चों की सुरक्षा के तमाम बड़े-बड़े सरकारी दावे इस उफनते नाले के सामने पूरी तरह से दम तोड़ते नजर आते हैं, जो हमारी प्रशासनिक व्यवस्था की संवेदनहीनता का एक जीता-जाता प्रमाण है।

स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की इस गंभीर समस्या पर चुप्पी से ग्रामीणों में क्यों भड़का हुआ है भारी गुस्सा?
लंबे समय से चली आ रही इस अमानवीय और खतरनाक समस्या को लेकर स्थानीय ग्रामीणों और अभिभावकों का सब्र अब पूरी तरह से जवाब दे चुका है, जिसके चलते प्रशासन के खिलाफ भारी आक्रोश देखने को मिल रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि चुनाव के समय बड़े-बड़े नेता वोट मांगने के लिए इन दुर्गम रास्तों पर आ जाते हैं और पक्का पुल बनवाने का वादा करके चले जाते हैं, लेकिन चुनाव जीतने के बाद कोई भी सुधि लेने नहीं आता है। जब मीडिया के माध्यम से इन मासूम बच्चों की जानलेवा यात्रा की तस्वीरें और वीडियो सामने आए, तब जाकर स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों की नींद टूटी है और वे मामले की जांच कराने की रटी-रटाई बात कह रहे हैं। जनता का सवाल यह है कि क्या प्रशासन किसी बड़े और अनहोनी हादसे का इंतजार कर रहा है, जिसके बाद ही उनकी आंखें खुलेगी और यहाँ पुल का निर्माण कराया जाएगा। लोकतंत्र के इस दौर में जहाँ देश विकास की ऊंची उड़ान भर रहा है, वहीं झारखंड के इन 629 बच्चों का इस तरह से जान जोखिम में डालकर पढ़ना हमारे सिस्टम के माथे पर एक बहुत बड़ा कलंक है।

इस गंभीर संकट का स्थायी समाधान निकालने के लिए सरकार और शिक्षा विभाग को तुरंत क्या कदम उठाने चाहिए?
झारखंड के इस सुदूर इलाके में सामने आई इस दर्दनाक तस्वीर ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया है कि कागजी विकास और जमीनी हकीकत के बीच अभी भी बहुत बड़ी खाई मौजूद है जिसे पाटना बेहद जरूरी है। राज्य सरकार, जिला प्रशासन और ग्रामीण विकास विभाग को बिना किसी देरी के युद्ध स्तर पर इस नाले या नदी पर एक मजबूत और सुरक्षित पुल के निर्माण का प्रस्ताव पास करना चाहिए ताकि इन बच्चों की जान को हमेशा के लिए सुरक्षित किया जा सके। जब तक स्थायी पुल बनकर तैयार नहीं होता, तब तक बच्चों की आवाजाही के लिए वैकल्पिक और सुरक्षित नाव या अस्थायी पुल की व्यवस्था प्रशासन की जिम्मेदारी होनी चाहिए ताकि शिक्षा का यह सफर मौत का सफर न बने। देश के भविष्य कहे जाने वाले इन 629 मासूमों को उनकी पढ़ाई के अधिकार के साथ-साथ सुरक्षित जीवन जीने का हक मिलना ही चाहिए, और इसके लिए स्थानीय प्रशासन को अपनी जिम्मेदारी का ईमानदारी से निर्वहन करना होगा।