झारखंड नियुक्ति घोटाला: बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी का सीआईडी की जांच पर बड़ा हमला

झारखंड नियुक्ति घोटाला: बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी का सीआईडी की जांच पर बड़ा हमला

झारखंड के राजनीतिक गलियारों में उस वक्त भारी भूचाल आ गया जब राज्य के सबसे चर्चित और बहुचर्चित नियुक्ति घोटाले की जांच को लेकर प्रशासनिक मशीनरी की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े होने लगे। राज्य में युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले घोटालों की गूंज लंबे समय से विधानसभा से लेकर सड़क तक सुनाई देती रही है, लेकिन अब इस मामले में जांच एजेंसी यानी सीआईडी (CID) की भूमिका को लेकर सीधे तौर पर संदेह की सुई घूम गई है। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने इस पूरे घटनाक्रम पर बेहद तीखी प्रतिक्रिया देते हुए राज्य की वर्तमान सरकार और जांच एजेंसियों पर सीधा हमला बोला है। उनका यह बयान ऐसे समय में सामने आया है जब झारखंड के लाखों युवा अपनी मेहनत का हक पाने के लिए लगातार सरकारी तंत्र की निष्पक्षता का इंतजार कर रहे हैं। इस खुलासे के बाद से राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था और पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया है, और राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या वाकई में भ्रष्टाचार के इन बड़े मामलों में पर्दा डालने की कोई सुनियोजित साजिश रची जा रही है।

किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब कोई बड़ा घोटाला सामने आता है, तो जनता और विपक्ष की निगाहें सबसे पहले स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच एजेंसियों पर टिक जाती हैं ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके। झारखंड में पिछले कुछ वर्षों के दौरान विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं और सरकारी नौकरियों की बहाली में जिस बड़े पैमाने पर अनियमितताएं और धांधलियां सामने आई हैं, उसने पूरी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है। इन मामलों की तह तक जाने के लिए और असली गुनहगारों को बेनकाब करने के लिए सीआईडी को जांच की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। लेकिन जैसे-जैसे जांच का दायरा आगे बढ़ा, वैसे-वैसे इसकी पारदर्शिता और कार्यशैली को लेकर संदेह के बादल गहराने लगे। जानकारों और विपक्षी दलों का यह मानना है कि यदि जांच एजेंसी ही सुस्त पड़ जाए या फिर राजनीतिक दबाव के आगे झुकने लगे, तो पीड़ितों को न्याय मिलने की उम्मीद खत्म हो जाती है। सीआईडी की सुस्त और संदेहास्पद कार्यप्रणाली को लेकर अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या यह जांच सचमुच आरोपियों को सजा दिलाने के लिए हो रही है या फिर फाइलों को फाइलों में ही दबाने का एक ढोंग मात्र बनकर रह गई है।

झारखंड की राजनीति में अपनी बेबाक बयानों के लिए जाने जाने वाले बीजेपी के दिग्गज नेता बाबूलाल मरांडी ने सीआईडी की इस कथित संदेहास्पद भूमिका पर खुलकर मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस और अपने बयानों के माध्यम से यह गंभीर आरोप लगाया है कि झारखंड सरकार के इशारे पर सीआईडी इस पूरे नियुक्ति घोटाले की लीपापोती करने में जुटी हुई है। मरांडी का स्पष्ट कहना है कि इस बड़े भ्रष्टाचार के तार केवल निचले स्तर के कर्मचारियों या दलालों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसके असली मास्टरमाइंड राज्य के बड़े-बड़े राजनीतिक दिग्गज और भ्रष्ट अधिकारी हैं। उनका आरोप है कि चूंकि इस घपले में सत्ता के गलियारों में बैठे रसूखदार लोगों की सीधी संलिप्तता है, इसलिए सीआईडी के जरिए उन तमाम चेहरों को बचाने का एक सुरक्षित रास्ता तैयार किया जा रहा है। बाबूलाल मरांडी ने दो टूक शब्दों में कहा कि जिस प्रकार से जांच की दिशा को मोड़ा जा रहा है और सबूतों के साथ खिलवाड़ करने की आशंका जताई जा रही है, वह इस बात का पुख्ता सबूत है कि राज्य सरकार अपराधियों के संरक्षण में काम कर रही है और युवाओं के भविष्य के साथ खुला खिलवाड़ किया जा रहा है।

इस पूरे मामले का सबसे दुखद पहलू यह है कि इन नियुक्तियों और परीक्षाओं के भरोसे अपना भविष्य संवारने का सपना देखने वाले राज्य के लाखों बेरोजगार युवा आज ठगा सा महसूस कर रहे हैं। झारखंड का युवा वर्ग लंबे समय से रोजगार, पारदर्शिता और ईमानदारी से आयोजित होने वाली परीक्षाओं की मांग को लेकर संघर्ष करता रहा है, लेकिन हर बार उन्हें प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार के दलदल में धकेल दिया जाता है। जब नियुक्ति घोटालों की परतें एक-एक करके खुलती हैं, तो युवाओं के मन में यह उम्मीद जागती है कि अब तो कम से कम दोषियों को सजा मिलेगी और उन्हें उनका हक मिलेगा। लेकिन जब ऐसी खबरें सामने आती हैं कि जांच एजेंसियों पर भी राजनीतिक दबाव है और बड़े अधिकारियों को क्लीन चिट देने की तैयारी चल रही है, तो युवाओं का बचा-कुचा भरोसा भी पूरी तरह से टूट जाता है। राज्य के विभिन्न छात्र संगठनों और युवाओं के बीच इस बात को लेकर भारी आक्रोश पनप रहा है, और वे यह चेतावनी दे रहे हैं कि यदि इस घोटाले की निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच नहीं कराई गई, तो वे एक बार फिर से सड़कों पर उतरकर बड़ा आंदोलन करने के लिए मजबूर होंगे।

झारखंड नियुक्ति घोटाले में सीआईडी की भूमिका पर उठे इन तमाम सवालों ने राज्य की राजनीति का पारा सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है। आगामी राजनीतिक और चुनावी समीकरणों के लिहाज से यह मुद्दा वर्तमान सरकार के गले की फांस बनता जा रहा है, क्योंकि विपक्ष इसे एक बड़ा हथियार बनाकर सरकार की कार्यशैली पर लगातार सवालिया निशान लगा रहा है। जनता के बीच भी यह संदेश साफ जा रहा है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस का दावा करने वाली सरकारें असल में अंदरखाने किस तरह से काम कर रही हैं। मांग यह जोर पकड़ती जा रही है कि इस पूरे मामले की जांच राज्य स्तर की पुलिस या सीआईडी के हाथों से लेकर किसी पूरी तरह से स्वतंत्र केंद्रीय एजेंसी को सौंपी जाए, ताकि किसी भी प्रकार के राजनीतिक हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश ही न बचे। जब तक इस पूरे रैकेट के असली सूत्रधार—चाहे वे नेता हों या ऊंचे ओहदे वाले अफसर—कानून के शिकंजे में नहीं आते और उन्हें कठोर सजा नहीं मिलती, तब तक झारखंड के युवाओं के साथ हुआ अन्याय और इस घोटाले का काला सच पूरी तरह से देश के सामने उजागर नहीं हो पाएगा।