झारखंड विधानसभा : 2008 के परिसीमन को आधार बनाने पर क्यों मचा है सियासी बवाल, जानिए अंदर की पूरी सच्चाई

झारखंड विधानसभा : 2008 के परिसीमन को आधार बनाने पर क्यों मचा है सियासी बवाल, जानिए अंदर की पूरी सच्चाई

झारखंड के राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में इन दिनों सुगबुगाहट तेज हो गई है और एक ऐसा बड़ा मुद्दा तूल पकड़ रहा है जो राज्य के मूलवासियों, आदिवासियों और अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग के राजनीतिक भविष्य पर सीधा असर डाल सकता है. राज्य में आने वाले समय में होने वाले विधानसभा परिसीमन और सीटों के गणित को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं, और मुख्य विवाद इस बात पर है कि क्या आगामी परिसीमन के लिए साल 2008 की उस पुरानी रिपोर्ट या आंकड़ों को आधार बनाया जाएगा जो लंबे समय से ठंडे बस्ते में पड़ी थी. झारखंड के आदिवासी संगठनों, राजनीतिक दलों और सामाजिक चिंतकों के बीच इस बात को लेकर गहरी चिंता और नाराजगी देखने को मिल रही है कि यदि पुराने पैमानों और जनसांख्यिकीय बदलावों को नजरअंदाज करके नए सिरे से सीटों का निर्धारण किया गया, तो विधानसभा में अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या में भारी कमी आ सकती है. राज्य की राजनीति में जनजातीय सीटों का समीकरण हमेशा से सत्ता की चाबी साबित होता आया है, और ऐसे में आरक्षित सीटों के घटने की आहट मात्र से ही पूरा राजनीतिक माहौल गर्म हो गया है. विपक्षी दलों से लेकर सत्ता पक्ष के भीतर भी इस बात पर मंथन शुरू हो गया है कि यदि इस पुरानी रिपोर्ट को लागू किया गया, तो इसके परिणाम झारखंड के मूल निवासियों के अधिकारों के लिए कितने नुकसानदेह साबित हो सकते हैं.

साल 2008 की परिसीमन रिपोर्ट और उसके प्रावधानों को लेकर क्यों भड़का है विरोध

वर्ष 2008 के दौरान देश के कई हिस्सों और खासकर नए राज्यों में परिसीमन की प्रक्रिया को लेकर जो आयोग और समितियां गठित की गई थीं, उनकी रिपोर्टों और सिफारिशों में कई ऐसे तकनीकी बिंदु थे जिन्हें लेकर स्थानीय स्तर पर हमेशा से असंतोष बना रहा है. जानकारों का कहना है कि उस दौर की रिपोर्ट में झारखंड के विभिन्न जिलों की जनसँख्या, भौगोलिक स्थिति और भौगोलिक विकास के जो मानक तय किए गए थे, वे आज की तारीख में पूरी तरह से प्रासंगिक नहीं रह गए हैं, क्योंकि पिछले डेढ़ दशक में राज्य की डेमोग्राफी में बहुत बड़ा बदलाव आ चुका है. आदिवासियों के हितों की रक्षा करने वाले संगठनों का तर्क है कि यदि उस पुरानी और अधूरी रिपोर्ट को वर्तमान परिसीमन का आधार बनाया जाता है, तो कई ऐसे पारंपरिक आदिवासी बहुल इलाके आरक्षित श्रेणी से बाहर हो सकते हैं, जिससे विधानसभा में उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व सीधे तौर पर कमजोर हो जाएगा. झारखंड एक ऐसा राज्य है जिसका गठन ही मुख्य रूप से जल, जंगल, जमीन और आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा के लिए हुआ था, और ऐसे में यदि उनकी आरक्षित सीटों पर कैंची चलती है, तो यह सीधे तौर पर उनकी राजनीतिक ताकत को कम करने का एक सुनियोजित प्रयास माना जाएगा. यही कारण है कि विभिन्न आदिवासी फोरम और सामाजिक नेता सड़क से लेकर सदन तक इस बात का पुरजोर विरोध कर रहे हैं कि किसी भी कीमत पर 2008 के पुराने और अवैज्ञानिक आंकड़ों को नया आधार न बनाया जाए.

झारखंड की राजनीति और आदिवासी सीटों के समीकरण पर इसका क्या होगा दूरगामी असर

भारतीय लोकतंत्र में निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन (Delimitation) किसी भी राज्य के सत्ता समीकरण को पूरी तरह से उलट-पलट देने की क्षमता रखता है, और झारखंड के संदर्भ में तो यह मामला और भी ज्यादा संवेदनशील बन जाता है. झारखंड विधानसभा की कुल 81 सीटों में से एक बड़ा हिस्सा अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित है, और इसी आरक्षित कोटे की सीटों पर जीत हासिल करने वाली पार्टी ही तय करती है कि राज्य की गद्दी पर कौन बैठेगा. यदि परिसीमन के नए नियमों के तहत ST सीटों की संख्या में कमी आती है, तो इससे न केवल जनजातीय समाज का विधायी प्रभाव कम होगा, बल्कि नीति-निर्धारण के स्तर पर उनकी आवाज भी कमजोर पड़ जाएगी. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज्य के कई जिलों में पिछले कुछ वर्षों में आंतरिक प्रवासन (Internal Migration) और शहरीकरण के कारण जनसंख्या के आंकड़े बदले हैं, जिन्हें वैज्ञानिक तरीके से सर्वे कराकर ही नए परिसीमन में शामिल किया जाना चाहिए. पुरानी रिपोर्ट को आँख मूंदकर लागू करने से न केवल सामाजिक असंतोष बढ़ेगा, बल्कि राज्य की शांति और स्थिरता पर भी इसका विपरीत प्रभाव पड़ सकता है. यही वजह है कि झारखंड के तमाम राजनीतिक दल अब इस संवेदनशील मुद्दे पर खुलकर सामने आने लगे हैं और केंद्र तथा चुनाव आयोग से यह मांग कर रहे हैं कि परिसीमन का आधार पूरी तरह से पारदर्शी, आधुनिक और वर्तमान वास्तविकताओं पर आधारित होना चाहिए.

आदिवासी संगठनों और विपक्षी दलों की चेतावनी, सरकार से निष्पक्ष और नए सर्वे की मांग

इस पूरे विवाद के तूल पकड़ने के बाद झारखंड के प्रमुख आदिवासी संगठनों और विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि वे अपने अधिकारों पर किसी भी प्रकार का डाका नहीं डालने देंगे. संगठनों का कहना है कि यदि सरकार ने जल्दबाजी में या किसी राजनीतिक लाभ के तहत 2008 की रिपोर्ट को आधार बनाकर परिसीमन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया, तो वे राज्यव्यापी आंदोलन छेड़ने के लिए मजबूर होंगे. उनकी मुख्य मांग यह है कि सबसे पहले राज्य में एक नया और व्यापक जनसांख्यिकीय सर्वेक्षण (Demographic Survey) कराया जाए, जिसमें यह स्पष्ट हो सके कि आज की तारीख में किस क्षेत्र में किस वर्ग की वास्तविक आबादी कितनी है. लोकतंत्र की खूबसूरती इसी बात में है कि हर वर्ग को उसकी आबादी और अधिकारों के अनुपात में उचित प्रतिनिधित्व मिले, और यदि उसी बुनियादी हक के साथ खिलवाड़ किया जाएगा, तो जनता का व्यवस्था से विश्वास उठ जाएगा. इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर से इस बात को साबित कर दिया है कि झारखंड की सियासत में आदिवासी अस्मिता और उनके राजनीतिक अधिकार कितने महत्वपूर्ण हैं, और आने वाले दिनों में यह मुद्दा राज्य की राजनीति का सबसे बड़ा केंद्र बिंदु बनने वाला है.

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