JPSC-JSSC परीक्षा रद्द करने के हेमंत सरकार के फैसले पर हाई कोर्ट की रोक, नियुक्त अभ्यर्थियों को बड़ी राहत
झारखंड की राजनीति और प्रशासनिक हलकों में उस वक्त बड़ा भूचाल आ गया जब झारखंड उच्च न्यायालय ने हेमंत सोरेन सरकार के उस बड़े फैसले पर अंतरिम रोक (Stay) लगा दी, जिसके तहत जेपीएससी और जेएसएससी की दर्जनों भर्ती परीक्षाओं और उनसे हुई नियुक्तियों को एक झटके में रद्द कर दिया गया था। जस्टिस दीपक रोशन की एकल पीठ ने 11वीं से 13वीं संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा और फूड सेफ्टी ऑफिसर समेत अन्य भर्ती प्रक्रियाओं के तहत बहाल हो चुके अभ्यर्थियों की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि सरकार का यह कदम प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों (Principles of Natural Justice) का उल्लंघन प्रतीत होता है। हाई कोर्ट के इस आदेश से उन सैकड़ों-हजारों नवनियुक्त अधिकारियों और सफल अभ्यर्थियों ने राहत की सांस ली है, जिनकी नौकरियां सरकार के फैसले के बाद खतरे में पड़ गई थीं।
हाई कोर्ट का अंतरिम आदेश और सरकार से जवाब तलब
अदालत में दायर याचिकाओं में दलील दी गई थी कि सरकार ने बिना किसी ठोस जांच रिपोर्ट या व्यक्तिगत संलिप्तता के साक्ष्य के सभी सफल अभ्यर्थियों की नियुक्तियों को एकतरफा तरीके से रद्द कर दिया। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि जिन अभ्यर्थियों ने अपनी योग्यता और कड़ी मेहनत से परीक्षा पास की और जो पिछले कई महीनों से अपने पदों पर विधिवत सेवाएं दे रहे हैं या प्रशिक्षण ले रहे हैं, उन्हें बिना पक्ष सुने बर्खास्तगी के कगार पर धकेलना असंवैधानिक है। हाई कोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार करते हुए रद्द करने से संबंधित सरकारी अधिसूचनाओं के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी और राज्य सरकार को 15 सितंबर 2026 तक अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
हेमंत सरकार ने क्यों रद्द की थीं 40 से अधिक परीक्षाएं?
झारखंड में पिछले कुछ हफ्तों से छात्र और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवा सड़कों पर आंदोलन कर रहे थे। विवाद की मुख्य वजह 14वीं सिविल सेवा पीटी परीक्षा के नतीजों में विसंगतियों, सोशल मीडिया पर वायरल ओएमआर शीट और परीक्षा संचालन एजेंसी टीएसआर डाटा प्रोसेसिंग प्राइवेट लिमिटेड (TDPL) की भूमिका को लेकर उपजा आक्रोश था। युवाओं के 26 दिनों तक चले व्यापक आंदोलन और भूख हड़ताल के दबाव में आकर राज्य सरकार के कार्मिक व प्रशासनिक सुधार विभाग ने 22 से अधिक भर्ती परीक्षाओं और प्रक्रियाओं को रद्द करने, कई अन्य को स्थगित करने तथा 17 पुरानी परीक्षाओं की सीआईडी जांच कराने का फैसला किया था। सरकार ने 2014 के बाद से टीडीपीएल द्वारा कराई गई सभी चयन प्रक्रियाओं और परिणामों को निरस्त करने का ऐलान किया था।
नवनियुक्त कर्मचारियों का विरोध और कोर्ट का दरवाजा खटखटाना
सरकार के इस कठोर फैसले का सबसे बड़ा झटका उन युवाओं को लगा था जो जेपीएससी 11वीं-13वीं के तहत डिप्टी कलेक्टर, डीएसपी, स्टेट टैक्स ऑफिसर या जेएसएससी-सीजीएल व अन्य तकनीकी संवर्गों में चयनित होकर सरकारी सेवा में आ चुके थे। अचानक सेवाएं रद्द होने के विरोध में लगभग 2,700 नवनियुक्त कर्मियों ने प्रोजेक्ट भवन (सचिवालय) के बाहर जोरदार प्रदर्शन किया था। उनका कहना था कि अगर किसी एजेंसी या कुछ व्यक्तियों ने गड़बड़ी की है, तो जांच कर दोषियों को सजा दी जानी चाहिए, न कि पूरी चयन प्रक्रिया और निष्पक्ष रूप से चयनित सभी कर्मचारियों की आजीविका को खत्म कर दिया जाए। इसी आधार पर सफल अभ्यर्थियों ने The Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार हाई कोर्ट की शरण ली, जहां से उन्हें तात्कालिक कानूनी संरक्षण प्राप्त हुआ।
अब आगे क्या होगा: कानूनी प्रक्रिया और अभ्यर्थियों का भविष्य
झारखंड उच्च न्यायालय के स्टे के बाद अब स्थिति काफी दिलचस्प और कानूनी रूप से जटिल हो गई है:
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पदों पर बने रहेंगे नियुक्त कर्मी: हाई कोर्ट के आदेश के बाद जिन अधिकारियों और कर्मचारियों की नियुक्तियों को रद्द करने का आदेश दिया गया था, वे फिलहाल अपने पदों पर बने रहेंगे और उनकी नौकरी पर आया तात्कालिक खतरा टल गया है।
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15 सितंबर को अगली अहम सुनवाई: राज्य सरकार को अब हाई कोर्ट में यह साबित करना होगा कि उसने पूरी परीक्षा और नियुक्तियों को रद्द करने का फैसला किन ठोस आधारों और जांच रिपोर्टों के मद्देनजर लिया था। सरकार की ओर से पेश जवाब पर अदालत आगे की दिशा तय करेगी।
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आंदोलनकारी छात्रों का रुख: दूसरी तरफ, परीक्षा में धांधली का आरोप लगाकर परीक्षा रद्द करने की मांग कर रहे छात्र गुटों और विपक्षी दलों ने सीआईडी के बजाय सीबीआई जांच की मांग दोहराई है।
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सरकार के सामने कानूनी व प्रशासनिक दुविधा: राज्य सरकार के सामने अब एक तरफ सड़क पर प्रदर्शन कर रहे लाखों छात्रों का भरोसा जीतने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ बिना ठोस सुबूत के चयनित कर्मचारियों को हटाने पर अदालती कार्रवाई का सामना करने का दबाव है।