हेमंत सरकार का बड़ा संकट: एक आंदोलन थामने के चक्कर में क्या निर्दोष युवाओं के भविष्य पर चला दिया बुलडोजर
झारखंड की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक बहुत बड़ा भूचाल आया हुआ है। राज्य सरकार ने पिछले कई हफ्तों से चल रहे छात्र आंदोलन और विरोध प्रदर्शनों को शांत करने के लिए एक ऐसा कठोर कदम उठाया है, जिसने अब एक नए और गंभीर संकट को जन्म दे दिया है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सरकार ने साल 2014 से लेकर अब तक विवादित एजेंसी 'टीडीपीएल' के जरिए आयोजित की गई तमाम प्रतियोगी परीक्षाओं और उनके परिणामों को सामूहिक रूप से रद्द करने का बड़ा फैसला लिया है। सरकार को उम्मीद थी कि इस फैसले से नाराज छात्र शांत हो जाएंगे और सड़कों पर चल रहा बवाल थम जाएगा, लेकिन ऐसा होने के बजाय मामला और अधिक उलझ गया है। इस ताबड़तोड़ फैसले के बाद अब वे युवा सड़कों पर उतर आए हैं जो पूरी मेहनत और कानूनी प्रक्रिया के तहत परीक्षाएं पास करके विभिन्न विभागों में अपनी सेवाएं दे रहे थे। दोषी और निर्दोष अभ्यर्थियों को एक ही तराजू में तौलने के इस फैसले ने राज्य के युवाओं के भविष्य पर एक बड़ा और काला प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। आइए इस विस्तृत लेख में जानते हैं कि इस पूरे घटनाक्रम के पीछे की असल सच्चाई क्या है और इससे झारखंड की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था पर क्या गंभीर प्रभाव पड़ने वाले हैं।
छात्रों का लंबा आंदोलन और सरकार पर बढ़ता दबाव
राजधानी रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम और शहर के प्रमुख इलाकों में पिछले कई हफ्तों से हजारों की संख्या में प्रतियोगी छात्र परीक्षा प्रणाली में धांधली, पेपर लीक और भ्रष्टाचार के खिलाफ आर-पार की लड़ाई लड़ रहे थे। छात्रों का मुख्य आरोप था कि राज्य में परीक्षाएं आयोजित करने वाली कुछ एजेंसियां और अधिकारी भ्रष्ट तंत्र का हिस्सा बन चुके हैं, जिसके कारण योग्य और मेधावी युवाओं का हक मारा जा रहा है। इन प्रदर्शनों ने धीरे-धीरे एक बड़े राजनीतिक आंदोलन का रूप ले लिया था, जिससे सरकार और प्रशासन की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही थीं। विपक्ष भी इस मुद्दे को लेकर लगातार सरकार को घेरने में जुटा हुआ था। ऐसे में बढ़ते दबाव और राज्य में शांति व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर सरकार ने बिना किसी लंबे विचार-विमर्श के वर्ष 2014 से लेकर अब तक की परीक्षाओं को ही पूरी तरह से निरस्त करने का एकतरफा और कड़ा निर्णय ले लिया, जो अब सरकार के लिए ही जी का जंजाल बनता जा रहा है।
दोषी और निर्दोष को एक तराजू में तौलने का गंभीर खतरा
हेमंत सरकार के इस फैसले की सबसे बड़ी आलोचना इस बात को लेकर हो रही है कि इसमें दोषी और पूरी तरह से बेकसूर व ईमानदार उम्मीदवारों के बीच का फर्क पूरी तरह मिटा दिया गया है। सरकार की यह सामूहिक कार्रवाई ऐसी है जैसे किसी एक व्यक्ति की गलती की सजा पूरे गांव को दे दी जाए। जिन युवाओं ने सालों-साल दिन-रात एक करके कड़ी मेहनत के बाद इन परीक्षाओं को पास किया था और अपनी योग्यता के दम पर नौकरी हासिल की थी, उनका कहना है कि वे इस भ्रष्टाचार का शिकार नहीं बल्कि इसके पीड़ित हैं। यदि सिस्टम में या किसी एजेंसी के स्तर पर कोई गड़बड़ी पाई गई थी, तो सरकार को विशेष जांच टीम (SIT) बनाकर केवल संदिग्ध या दोषी लोगों की पहचान करके उन पर व्यक्तिगत रूप से कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए थी। लेकिन पूरी चयन प्रक्रिया को ही रद्द कर देना हजारों निर्दोष परिवारों के सपनों को एक झटके में चकनाचूर करने जैसा है, जिससे युवाओं के भीतर सरकार के प्रति भारी आक्रोश पैदा हो गया है।
चयनित अभ्यर्थियों का फूटा गुस्सा और प्रोजेक्ट भवन पर प्रदर्शन
सरकार के इस फैसले के सामने आते ही उन युवाओं के पैरों तले जमीन खिसक गई जो नौकरी पा चुके थे। रातों-रात अपनी नौकरी जाने के डर और भविष्य के संकट को भांपते हुए सैकड़ों सफल अभ्यर्थियों ने रांची के मुख्य सचिवालय 'प्रोजेक्ट भवन' के बाहर पहुंचकर जोरदार प्रदर्शन किया और सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। कई अभ्यर्थियों ने मीडिया के सामने अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि इस सरकारी नौकरी को पाने के लिए उन्होंने अपने पहले से चल रहे अच्छे-खासे प्राइवेट और अन्य सुरक्षित पदों को छोड़ दिया था। उनका कहना है कि उन्होंने यह मुकाम किसी सिफारिश या बेईमानी से नहीं, बल्कि लंबी कानूनी लड़ाइयों और न्यायालय के आदेशों के बाद हासिल किया था। अचानक नौकरी छिन जाने से इन युवाओं के सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा हो गया है, जिसके चलते वे अब इस फैसले को कोर्ट में चुनौती देने और आर-पार की कानूनी लड़ाई लड़ने की तैयारी कर रहे हैं।
प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल और भविष्य की बड़ी चुनौतियां
इस पूरे घटनाक्रम ने झारखंड की प्रशासनिक व्यवस्था और निर्णय लेने की क्षमता पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है। जब राज्य के सरकारी विभागों से अचानक बड़े पैमाने पर अनुभवी और चयनित युवा बाहर होंगे, तो निश्चित रूप से प्रशासनिक कामकाज की गति और कार्यकुशलता पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। एक तरफ सरकार यह दावा कर रही है कि वह युवाओं को पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था देना चाहती है, तो वहीं दूसरी तरफ इस तरह के फैसलों से शासन की नीति और नीयत दोनों पर संदेह जताया जा रहा है। आने वाले दिनों में यह संकट सरकार के लिए और अधिक चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है, क्योंकि एक तरफ न्याय की मांग कर रहे आंदोलनकारी छात्र हैं और दूसरी तरफ अपने हक और भविष्य की रक्षा के लिए सड़क पर उतरे नौकरीपेशा युवा हैं। सरकार के सामने अब इस जटिल स्थिति से निपटने के लिए कोई ठोस और न्यायसंगत रास्ता निकालने की बहुत बड़ी चुनौती आन खड़ी हुई है।