भारत को अक्सर दुनिया के सबसे बड़े उपभोक्ता बाजारों में से एक माना जाता है, लेकिन हालिया रिपोर्टें इस धारणा को चुनौती दे रही हैं। भले ही भारत की आबादी 1.4 अरब से अधिक है, लेकिन इसका वास्तविक उपभोक्ता वर्ग अपेक्षाकृत छोटा है।
छोटा होता उपभोक्ता वर्ग
ब्लूम वेंचर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में केवल 13-14 करोड़ लोग ऐसे हैं, जिनके पास अनिवार्य खर्चों से अलग अन्य जरूरतों के लिए भी पर्याप्त धन है। इसके अलावा, लगभग 30 करोड़ लोग उभरते उपभोक्ता वर्ग में आते हैं, लेकिन उनकी क्रय शक्ति सीमित है।
परफियोस और पीडब्ल्यूसी इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय उपभोक्ता अपनी कुल आय का 39% अनिवार्य खर्चों पर और 32% आवश्यक खर्चों पर लगाते हैं। केवल 29% राशि ही गैर-जरूरी खर्चों के लिए बचती है।
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बढ़ती आय असमानता
भारत में आर्थिक वृद्धि मुख्य रूप से उच्च-आय वाले वर्ग तक सीमित रह गई है। ब्लूम वेंचर्स की रिपोर्ट बताती है कि भारत में महंगे घरों और प्रीमियम स्मार्टफोन्स की बिक्री बढ़ रही है, जबकि किफायती घरों की हिस्सेदारी 40% से घटकर 18% रह गई है।
आर्थिक असमानता को दर्शाने वाले आंकड़े चौंकाने वाले हैं:
- 1990 में भारत के शीर्ष 10% लोगों की कुल आय का हिस्सा 34% था, जो अब बढ़कर 57.7% हो गया है।
- वहीं, निचले 50% लोगों की आय का हिस्सा 22.2% से घटकर 15% रह गया है।
घटती बचत और बढ़ता कर्ज
मार्सेलस इन्वेस्टमेंट मैनेजर्स की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के मध्य वर्ग की वास्तविक आय पिछले एक दशक में आधी हो गई है, जिससे उनकी बचत दर में भी भारी गिरावट आई है।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की रिपोर्ट के मुताबिक, घरेलू शुद्ध वित्तीय बचत 50 वर्षों में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। आर्थिक दबाव के चलते कई उपभोक्ताओं ने बिना गारंटी वाले लोन लेकर खर्च जारी रखा, लेकिन अब RBI ने आसान क्रेडिट पर सख्ती कर दी है, जिससे उपभोग पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
मिडल-इनकम ट्रैप का खतरा
विश्व बैंक की ‘वर्ल्ड डेवलपमेंट रिपोर्ट 2024’ में चेतावनी दी गई है कि भारत मिडल-इनकम ट्रैप में फंस सकता है। यह स्थिति तब आती है जब एक देश आर्थिक विकास की एक निश्चित सीमा तक पहुंचकर उच्च-आय वाली अर्थव्यवस्था में परिवर्तित नहीं हो पाता।
भारत की अर्थव्यवस्था छोटे और मध्यम व्यवसायों पर निर्भर है, लेकिन इनकी वृद्धि की संभावनाएं सीमित हैं। 90% भारतीय कंपनियों में पांच से कम कर्मचारी हैं, और नियामक बाधाओं के कारण ये बड़े व्यवसायों में तब्दील नहीं हो पा रहे हैं।
आर्थिक सुधारों की जरूरत
भारत को आर्थिक ठहराव से बचने और समावेशी विकास को बढ़ावा देने के लिए बड़े सुधारों की आवश्यकता है। विश्व बैंक के अनुसार, भारत को:
- छोटे और मध्यम उद्यमों के लिए नियमों को सरल बनाना चाहिए।
- क्रेडिट की उपलब्धता बढ़ानी चाहिए।
- नवाचार और कौशल विकास को प्रोत्साहित करना चाहिए।
अगर इन सुधारों को लागू नहीं किया गया, तो भारत उन देशों की सूची में शामिल हो सकता है, जो मध्यम-आय के स्तर पर अटक गए और उच्च-आय वाली अर्थव्यवस्था नहीं बन सके।