शी जिनपिंग का बड़ा दांव: चीन में लागू हुआ 'यूनिफॉर्म सिविल कोड', अल्पसंख्यकों की संस्कृति पर मंडराया संकट

शी जिनपिंग का बड़ा दांव: चीन में लागू हुआ 'यूनिफॉर्म सिविल कोड', अल्पसंख्यकों की संस्कृति पर मंडराया संकट

भारत में समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर चल रही बहसों के बीच पड़ोसी देश चीन ने एक ऐसा कदम उठाया है जिसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हलचल मचा दी है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की सरकार ने देश में चुपचाप 'यूनिफॉर्म सिविल कोड' जैसा एक विवादास्पद कानून लागू कर दिया है, जिसे आधिकारिक तौर पर 'एथनिक यूनिटी कानून' (Ethnic Unity Law) का नाम दिया गया है। मानवाधिकार संगठनों की कड़ी आलोचनाओं और वैश्विक विरोध को दरकिनार करते हुए बीजिंग ने इस कानून के जरिए देश की विविधता को एक सांचे में ढालने की कवायद तेज कर दी है।

क्या है चीन का नया 'एथनिक यूनिटी' कानून

चीनी संसद द्वारा इसी साल पारित किए गए इस कानून का मुख्य उद्देश्य देश के 55 मान्यता प्राप्त अल्पसंख्यक समुदायों को 'हान' बहुसंख्यक संस्कृति में विलय करना माना जा रहा है। सरकार का तर्क है कि यह कानून सामाजिक एकता को मजबूत करने और कट्टरपंथ को रोकने के लिए लाया गया है। इस नए नियम के तहत हिंसक आतंकवादी गतिविधियों, धार्मिक कट्टरपंथ और जातीय अलगाववाद को गंभीर अपराध की श्रेणी में रखा गया है। चीन के करीब 12.5 करोड़ अल्पसंख्यक, जो कुल आबादी का लगभग 8.9 फीसदी हैं, अब सीधे तौर पर इस कानून के दायरे में आ गए हैं।

भाषा पर प्रहार: मंदारिन अनिवार्य, बाकी बोलियां हाशिए पर

इस कानून का सबसे विवादास्पद पहलू शैक्षणिक संस्थानों में भाषा को लेकर है। नए नियमों के अनुसार, अब चीन के सभी स्कूलों और शिक्षण संस्थानों में पढ़ाई का मुख्य माध्यम अनिवार्य रूप से 'मंदारिन' भाषा होगी। छात्रों के लिए कोर्स पूरा करने के लिए मंदारिन में निपुण होना अब एक अनिवार्य शर्त है। हालांकि कानून में किसी विशेष अल्पसंख्यक भाषा का उल्लेख नहीं है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इसका सीधा असर तिब्बती, मंगोलियन और उइगर समुदायों की अपनी मातृभाषाओं पर पड़ेगा। लंबे समय से चीन पर आरोप लगते रहे हैं कि वह तिब्बत और इनर मंगोलिया जैसे इलाकों में स्थानीय संस्कृति को मिटाकर उसे हान संस्कृति में बदलने की कोशिश कर रहा है।

वैश्विक विरोध के बावजूद अडिग बीजिंग

चीन का यह कदम सामाजिक एकता के नाम पर सांस्कृतिक एकीकरण की एक बड़ी कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। सरकार का कहना है कि चीन एक बड़े सामाजिक बदलाव के दौर से गुजर रहा है, इसलिए देश में एकजुटता अनिवार्य है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार समूहों ने इसे सांस्कृतिक नरसंहार (Cultural Genocide) की संज्ञा दी है। आलोचकों का कहना है कि यह कानून विविधता को खत्म कर उन अल्पसंख्यक समूहों की पहचान मिटाने का एक जरिया है जो सदियों से अपनी विशिष्ट भाषाओं और परंपराओं के साथ रहते आए हैं। शी जिनपिंग का यह 'गेम प्लान' अब वैश्विक कूटनीतिक मंचों पर चीन की छवि को और अधिक विवादास्पद बना रहा है।

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