क्या ईरान को घेरने की ट्रंप की जिद में भारत को भी चुकानी पड़ेगी बड़ी कीमत?
वैश्विक कूटनीति के मंच पर एक बार फिर बड़ा भूचाल आता नजर आ रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को घुटनों पर लाने के लिए इस बार सैन्य मिसाइलों के बजाय 'टैरिफ' को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाने का संकेत दिया है। सीधे तौर पर सेना भेजने या हवाई हमलों के बजाय ट्रंप प्रशासन का ध्यान अब ईरान की आर्थिक कमर तोड़ने पर केंद्रित है। लेकिन इस कड़े फैसले की गूंज सिर्फ तेहरान तक सीमित नहीं रहने वाली है, बल्कि इसका सीधा और गहरा असर भारत और चीन जैसे बड़े एशियाई देशों पर पड़ता दिख रहा है।
मिसाइल की जगह 'टैरिफ वार' का पैंतरा
सैन्य संघर्ष में होने वाले भारी नुकसान से बचने के लिए अमेरिका अब 'सेकेंडरी प्रतिबंधों' और भारी आयात शुल्क (टैरिफ) की रणनीति पर काम कर रहा है। रणनीति बेहद साफ है: जो भी देश या विदेशी कंपनियां ईरान के साथ व्यापार करेंगी या वहां से कच्चा तेल खरीदेंगी, अमेरिका उन पर भारी पेनल्टी और टैरिफ लगाएगा। इसका मकसद ईरान को अंतरराष्ट्रीय बाजर से पूरी तरह से अलग-थलग करना है, ताकि उसकी अर्थव्यवस्था को मिलने वाला रेवेन्यू रुक जाए।
निशाने पर भारत और चीन क्यों?
ट्रंप की इस सख्त नीति के केंद्र में सीधे तौर पर चीन और भारत आते हैं। चीन वर्तमान में ईरान के कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार है और दोनों देशों के बीच अरबों डॉलर का व्यापारिक लेनदेन होता है। अगर अमेरिका ईरान से व्यापार करने वाले देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाता है, तो अमेरिकी बाजार में चीनी सामान और महंगा हो जाएगा, जिससे बीजिंग की अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लगेगा।
दूसरी तरफ भारत के लिए भी यह स्थिति बेहद संवेदनशील है। भारत भले ही अमेरिकी दबाव के बाद ईरान से तेल का आयात कम कर चुका हो, लेकिन चाबहार पोर्ट जैसी सामरिक परियोजनाओं और मध्य एशिया तक पहुंच के लिए ईरान के साथ भारत के रिश्ते बेहद अहम हैं। यदि अमेरिका ईरान के साथ हर तरह के आर्थिक संबंधों पर सख्ती बरतता है, तो भारत को अपने कूटनीतिक संतुलन और व्यापारिक हितों की रक्षा के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर क्या होगा असर?
अगर यह आर्थिक युद्ध इसी दिशा में आगे बढ़ता है, तो पूरी दुनिया में कच्चे तेल की कीमतों में बड़ा उछाल आ सकता है। तेल महंगा होने से वैश्विक स्तर पर महंगाई बढ़ेगी, जिसका सीधा असर आम जनता की जेब पर पड़ेगा। अब देखना यह होगा कि ट्रंप के इस कड़े फैसले के सामने भारत और चीन अपनी-अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को बचाते हुए किस तरह का कूटनीतिक रुख अपनाते हैं।