ट्रंप के चीन दौरे के बाद पलटा ताइवान का पासा, $250 अरब की चिप डील के बाद बदले सुर
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने ऐतिहासिक और बहुचर्चित चीन दौरे से वापस लौट आए हैं। करीब एक दशक (10 साल) के लंबे इंतजार के बाद किसी अमेरिकी राष्ट्रपति का यह पहला आधिकारिक चीन दौरा था। लेकिन इस दौरे के खत्म होते ही वैश्विक राजनीति और विशेष रूप से ताइवान जलडमरूमध्य (Taiwan Strait) में भारी खलबली मच गई है। जिस ताइवान के साथ अमेरिका ने कुछ ही समय पहले दुनिया की सबसे बड़ी 'चिप इंडस्ट्री डील' की थी, उसी ताइवान को अब राष्ट्रपति ट्रंप ने चीन के सामने दबने और 'शांत रहने' की साफ नसीहत दे डाली है। इस बदले रुख से पूरी दुनिया हैरान है। आइए सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं कि आखिर इस पूरे विवाद की इनसाइड स्टोरी क्या है।
"हमारी चिप इंडस्ट्री चुरा ली" और $250 अरब डॉलर की वो ऐतिहासिक डील
इस पूरे महा-विवाद की असली जड़ सेमीकंडक्टर (Semiconductor) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) चिप्स के इर्द-गिर्द घूमती है। डोनाल्ड ट्रंप पूर्व में कई बार सार्वजनिक मंचों से ताइवान पर यह गंभीर आरोप लगा चुके हैं कि ताइवान ने धोखे से अमेरिका का पूरा चिप बिजनेस "चुरा" लिया है। इसी बिजनेस को वापस अमेरिका लाने के लिए जनवरी 2026 में दोनों देशों के बीच 250 अरब डॉलर की एक ऐतिहासिक ट्रेड डील हुई थी।
इस डील के तहत ताइवान ने अमेरिकी टेक और चिप मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 250 अरब डॉलर के भारी-भरकम निवेश का वादा किया था, ताकि अमेरिका में सेमीकंडक्टर प्रोडक्शन को फिर से जिंदा किया जा सके। बदले में अमेरिका ने ताइवानी सामानों पर आयात शुल्क (Táriff) को 20% से घटाकर 15% कर दिया था। इस डील से अमेरिका ने अपना चिप सेक्टर तो सुरक्षित कर लिया, लेकिन चीन इस बात से बुरी तरह चिढ़ गया था।
बीजिंग में शी जिनपिंग की ट्रंप को दो टूक धमकी: "यह हमारी रेड लाइन है"
मई 2026 के इस ऐतिहासिक दौरे में जब बीजिंग के ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल में डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग आमने-सामने बैठे, तो ताइवान का मुद्दा सबसे संवेदनशील बनकर उभरा।
जिनपिंग की रेड लाइन: चीनी विदेश मंत्रालय के आधिकारिक बयान के अनुसार, शी जिनपिंग ने ट्रंप को दो टूक शब्दों में चेतावनी दी कि ताइवान का मुद्दा अमेरिका-चीन संबंधों में सबसे पहली और आखिरी 'रेड लाइन' है।
भीषण टकराव की चेतावनी: जिनपिंग ने साफ कहा कि अमेरिका ताइवान के मामले में "अतिरिक्त सावधानी" बरते। अगर इस मुद्दे को ठीक से नहीं संभाला गया, तो दोनों महाशक्तियों (अमेरिका और चीन) के बीच भयंकर "सैन्य टकराव और सीधी झड़प" हो सकती है। चीन की पूरी कोशिश है कि अमेरिका ताइवान को दिए जाने वाले 14 अरब डॉलर के प्रस्तावित हथियार पैकेज को तुरंत रद्द कर दे।
ट्रंप के बयान से मची खलबली: "हम 9500 मील दूर जाकर नहीं लड़ सकते"
चीन की इस खुली धमकी के बाद, लोकतांत्रिक देश ताइवान को उम्मीद थी कि ट्रंप अमेरिका के पुराने रुख पर कायम रहते हुए बीजिंग को कड़ा जवाब देंगे। लेकिन दौरे के समापन पर 'फॉक्स न्यूज' को दिए इंटरव्यू में ट्रंप ने जो कहा, उसने ताइवान समेत पूरी दुनिया के होश उड़ा दिए। ऐसा लगने लगा है जैसे 250 अरब डॉलर की चिप डील पूरी होते ही ट्रंप ने ताइवान को लेकर चीन के साथ कोई 'अघोषित समझौता' (Secret Deal) कर लिया हो।
ट्रंप ने इंटरव्यू में साफ कहा, "अगर आप भौगोलिक और सैन्य संभावनाओं को देखें, तो चीन एक बहुत शक्तिशाली और विशाल देश है। वहीं, ताइवान एक बहुत छोटा-सा द्वीप है। जरा सोचिए- ताइवान चीन के तट से महज 59 मील दूर है, जबकि हम (अमेरिका) वहां से 9500 मील दूर हैं। यह बेहद मुश्किल और अव्यावहारिक समस्या है।" ट्रंप ने आगे कहा, "अगर आप इतिहास देखें, तो ताइवान का विकास इसलिए हुआ क्योंकि हमारे यहां पहले ऐसे राष्ट्रपति थे जिन्हें पता ही नहीं था कि वे आखिर कर क्या रहे हैं। उन्होंने ताइवान को हमारी चिप इंडस्ट्री चुराने दी।"
"खुद को स्वतंत्र देश घोषित ना करे ताइवान, चुपचाप शांत रहे"
ट्रंप ने 'फॉक्स न्यूज' से बातचीत में यह भी संकेत दिया कि महाशक्ति चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ अच्छे संबंध बनाए रखना अमेरिका के आर्थिक हित में बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने आश्वस्त किया कि जब तक वह व्हाइट हाउस में हैं, तब तक चीन संभवतः ताइवान के खिलाफ कोई सैन्य कदम नहीं उठाएगा। ट्रंप ने कहा, ''यह ताइवान पर चीनी कब्जे का मामला नहीं है। बीजिंग सिर्फ यह नहीं चाहता कि ताइवान खुद को एक अलग और स्वतंत्र देश घोषित करे। जब तक मैं सत्ता में हूं, मुझे नहीं लगता कि चीन कुछ करेगा। लेकिन मेरे बाद वे ऐसा कर सकते हैं।''
ट्रंप ने ताइवान को सख्त लहजे में चेतावनी देते हुए कहा, ''मैं चाहता हूं कि चीन शांत रहे, हम युद्ध नहीं चाहते। अगर मौजूदा स्थिति (Status Quo) बनी रहती है, तो मुझे लगता है कि चीन भी इससे संतुष्ट रहेगा। हम ऐसा बिल्कुल नहीं चाहते कि ताइवान में कोई यह कहे कि चलो हम स्वतंत्र हो जाते हैं, क्योंकि अमेरिका हमारी पीठ पर खड़ा है। ताइवान को थोड़ा शांत रहना चाहिए।"
ताइवान का तीखा पलटवार: "हमारा भविष्य केवल हमारी जनता तय करेगी"
ट्रंप के इस हैरान करने वाले और ढुलमुल रवैये पर ताइवान के भीतर गहरी चिंता और भारी नाराजगी फैल गई है। ताइवान ने शनिवार को एक बेहद कड़ा और आधिकारिक जवाबी बयान जारी करते हुए खुद को एक "संप्रभु और स्वतंत्र लोकतांत्रिक राष्ट्र" बताया है।
जनता का सर्वोच्च अधिकार: ताइवान के डिप्टी फॉरेन मिनिस्टर ने ट्रंप के बयान पर पलटवार करते हुए स्पष्ट किया कि केवल और केवल ताइवान की जनता ही लोकतांत्रिक तरीके से अपने भविष्य का फैसला कर सकती है, दुनिया का कोई भी दूसरा देश या नेता नहीं।
राष्ट्रपति का रुख: ताइवान के राष्ट्रपति लाई चिंग-ते (जिन्हें चीन हमेशा से 'समस्या पैदा करने वाला' मानता आया है) का स्पष्ट मानना है कि ताइवान को औपचारिक रूप से नई स्वतंत्रता घोषित करने की कोई जरूरत ही नहीं है, क्योंकि वह पहले से ही अपने संविधान, सेना और सरकार के साथ एक स्वतंत्र और संप्रभु देश है।
हथियारों की बिक्री को ट्रंप ने बताया 'बार्गेनिंग चिप', असमंजस में सुरक्षा
हाल ही में ताइवान की संसद ने चीनी हमले से निपटने और अमेरिकी आधुनिक हथियार खरीदने के लिए 25 अरब डॉलर का भारी-भरकम रक्षा बजट पास किया है। लेकिन ट्रंप ने हथियारों की इस संभावित बिक्री को अमेरिका के लिए एक "बहुत अच्छा सौदेबाजी का मोहरा (Bargaining Chip)" बताकर ताइवान की रातों की नींद उड़ा दी है।
पहले जहां अमेरिका आधिकारिक तौर पर यह कहता था कि ताइवान को हथियार बेचने के मामले में वह चीन से कोई सलाह या अनुमति नहीं लेगा, वहीं अब ट्रंप का कहना है कि वे चीन के साथ इस सौदे पर जल्द ही कोई बीच का रास्ता निकालेंगे।
क्या कहते हैं अंतरराष्ट्रीय मामलों के एक्सपर्ट्स?
राजनीतिक और कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का यह 'बिजनेसमैन अप्रोच' ताइवान के अस्तित्व के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है:
चीन को खुश करने की कोशिश: 'नेशनल चेंगची यूनिवर्सिटी' के प्रोफेसर त्सेंग वेई-फेंग का मानना है कि ट्रंप प्रशासन बीजिंग के साथ अपने बड़े व्यापारिक रिश्ते सुधारने के लिए ताइवान को दिए जाने वाले हथियारों के पैकेज में बड़ी कटौती या बदलाव कर सकता है, ताकि शी जिनपिंग को खुश रखा जा सके।
सुरक्षा गारंटियों से पीछे हटा अमेरिका: 'नेशनल ताइवान यूनिवर्सिटी' के प्रोफेसर लेव नचमैन के मुताबिक, ताइवान के लिए सबसे डरावनी बात यह है कि अमेरिका उसकी सुरक्षा और हथियारों को एक 'व्यापारिक मोहरे' की तरह इस्तेमाल कर रहा है। ट्रंप के इस रुख से साफ है कि अमेरिका अपनी पुरानी सुरक्षा गारंटियों से धीरे-धीरे पीछे हट रहा है और ताइवान से $250 अरब का निवेश लेने के बाद अब उसे चीन के भरोसे छोड़ रहा है।