रूस से दिल्ली तक ट्रेन का मेगा प्लान: तालिबान ने भारत के लिए खोला रास्ता, क्या सच साबित होगा यह प्रोजेक्ट
वैश्विक राजनीति में एक ऐसा बड़ा भूचाल आया है जिसकी गूंज वाशिंगटन से लेकर नई दिल्ली तक सुनाई दे रही है। मॉस्को से लेकर दिल्ली तक रेल नेटवर्क के जरिए सीधे जुड़ने की बड़ी चर्चाओं के बीच, अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज तालिबान ने भारत के लिए बड़ा और सुरक्षित गलियारा मुहैया कराने का समर्थन कर दिया है। रूस की ओर से इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट पर विचार किए जाने और तालिबान के इस रुख के बाद से यह सवाल उठने लगा है कि क्या आने वाले दिनों में रूस और भारत के बीच जमीनी ट्रेन मार्ग का सपना सच हो पाएगा?
रूस का नया दांव: समुद्री मार्गों पर निर्भरता खत्म करने की योजना
रूस ने दुनिया भर में अपने ऊपर लगे आर्थिक प्रतिबंधों और पश्चिमी देशों की रणनीतिक घेराबंदी से पार पाने के लिए एक वैकल्पिक और सुरक्षित ट्रांजिट रूट पर काम करना शुरू कर दिया है। रूस के नेतृत्व का मानना है कि पारंपरिक समुद्री रास्तों और संवेदनशील जलडमरूमध्य (जैसे स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज) पर निर्भरता कम करने के लिए जमीन आधारित रेल नेटवर्क सबसे बेहतरीन विकल्प है। इसी कड़ी में रूस से मध्य एशिया, ईरान और अफगानिस्तान के रास्ते दक्षिण एशिया यानी भारत तक माल ढुलाई के लिए रेल कॉरिडोर बिछाने के प्रस्ताव पर गंभीरता से मंथन चल रहा है।
तालिबान का बड़ा कदम: भारत और रूस के लिए समर्थन
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चौकाने वाला पहलू तालिबान का आधिकारिक बयान रहा है। तालिबान सरकार के प्रतिनिधियों ने साफ तौर पर कहा है कि वे मॉस्को और नई दिल्ली को जोड़ने वाले इस प्रोजेक्ट का पूरा समर्थन करते हैं। अफगानिस्तान के जरिए गुजरने वाले इस रूट को सबसे छोटा और किफायती व्यापारिक मार्ग माना जा रहा है। तालिबान का मानना है कि इस परियोजना से न केवल उनके देश में बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा होंगे, बल्कि वैश्विक मंच पर उसे एक नई पहचान और आर्थिक मजबूती भी मिलेगी।
भारत के लिए क्या हैं इसके मायने और चुनौतियां?
भारत और रूस के बीच यदि रेल मार्ग के जरिए सीधी कनेक्टिविटी स्थापित होती है, तो इससे व्यापार की तस्वीर पूरी तरह बदल जाएगी। वर्तमान समय में रूस से भारत आने वाले माल को समुद्री रास्तों से लंबी दूरी तय करनी पड़ती है, जिसमें काफी समय और खर्च लगता है। इस नए भू-राजनीतिक समीकरण से भारत को मध्य एशिया के बाजारों तक सीधी और आसान पहुंच मिल सकती है। हालांकि, इस प्रोजेक्ट के रास्ते में सुरक्षा के लिहाज से आतंकवाद, चुनौतीपूर्ण पहाड़ी इलाके और क्षेत्रीय देशों के बीच कूटनीतिक सहमति जैसी बड़ी व्यावहारिक चुनौतियां भी खड़ी हैं। बावजूद इसके, इस सुगबुगाहट ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में हलचल जरूर पैदा कर दी है।