इजरायल का 'किलिंग मिशन' फेल: ईरान के बड़े नेताओं पर मंडराया था खतरा, अमेरिका ने कैसे पलटी बाजी
मध्य-पूर्व में तनाव का पारा एक बार फिर तब आसमान छू गया जब ईरान के दो बड़े चेहरों, विदेश मंत्री अब्बास अराघची और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बागेर गालिबाफ की जान पर बन आई। खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, इजरायल ने इन दोनों हस्तियों को निशाना बनाने के लिए अपने फाइटर जेट्स को पूरी तरह तैयार कर लिया था और ऑपरेशन के लिए 'ग्रीन सिग्नल' का इंतजार किया जा रहा था। हालांकि, ठीक वक्त पर अमेरिका की सक्रियता ने इस संभावित कत्लेआम को रोक लिया और एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध की चिंगारी को बुझा दिया। इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि तेहरान और वाशिंगटन के बीच पर्दे के पीछे का खेल कितना जटिल और खतरनाक है।
इजरायल का प्लान और अमेरिका का 'सेफगार्ड'
सूत्रों के मुताबिक, इजरायल का खुफिया तंत्र इन दोनों ईरानी नेताओं की गतिविधियों पर पैनी नजर रखे हुए था। जैसे ही वे एक संवेदनशील मिशन पर निकले, इजरायली वायुसेना के फाइटर जेट्स ने उड़ान भर ली थी। बताया जा रहा है कि इजरायल ने इस हमले को अंजाम देने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी, लेकिन अमेरिका को इसकी भनक लग गई। बाइडन प्रशासन, जो पहले से ही क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने के लिए दबाव में है, ने इस संभावित हमले को रोकने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। अमेरिका ने न केवल अपने खुफिया चैनलों का इस्तेमाल किया, बल्कि इजरायल पर सीधा कूटनीतिक दबाव भी बनाया ताकि स्थिति नियंत्रण से बाहर न हो जाए।
पर्दे के पीछे की कूटनीति और भविष्य का खतरा
अमेरिका का ईरान के इन नेताओं को बचाना महज एक मानवीय फैसला नहीं था, बल्कि इसके पीछे गहरा भू-राजनीतिक स्वार्थ भी छिपा है। वाशिंगटन को डर था कि अगर इजरायल इन हाई-प्रोफाइल नेताओं को मार गिराता है, तो ईरान का जवाब इतना भीषण होगा कि पूरा खाड़ी क्षेत्र युद्ध की आग में जल उठेगा, जिससे दुनिया भर में तेल की आपूर्ति और वैश्विक शांति खतरे में पड़ सकती थी। हालांकि यह संकट अभी टल गया है, लेकिन इजरायल और ईरान के बीच बढ़ती यह दुश्मनी किसी भी वक्त एक बड़े धमाके का रूप ले सकती है। तेहरान की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन इस घटना ने मध्य-पूर्व की सुरक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से हिलाकर रख दिया है।