अमेरिका-ईरान शांति समझौते पर ईरान की नई शर्त से मचा हड़कंप: विदेश मंत्री बोले– 'इजरायल को लेबनान छोड़ना ही होगा'
दुबई और वाशिंगटन के कूटनीतिक गलियारों से इस वक्त की एक बेहद संवेदनशील और अंतरराष्ट्रीय समीकरणों को हिला देने वाली बड़ी खबर सामने आ रही है। महीनों के खूनी संघर्ष के बाद अमेरिका और ईरान के बीच जिस गोपनीय शांति समझौते (Peace Deal) पर सहमति बनने की खबरें आ रही थीं, उस पर अचानक एक नया और बेहद गंभीर कूटनीतिक संकट मंडराने लगा है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची (Abbas Araghchi) ने एक बेहद आक्रामक बयान जारी करते हुए साफ कर दिया है कि अगर अमेरिका के साथ युद्ध खत्म करने वाले इस महा-समझौते को अमलीजामा पहनाना है, तो इजरायल को हर हाल में दक्षिणी लेबनान के कब्जे वाले इलाकों से पूरी तरह पीछे हटना होगा। ईरान की इस नई और कड़ी शर्त के सार्वजनिक होने के बाद उस गोपनीय समझौते के भविष्य पर गंभीर सवालिया निशान खड़े हो गए हैं, जिसे अब तक दोनों देशों ने पूरी तरह से गुप्त रखा था। लाइव हिन्दुस्तान की इस एआई-सर्च (GEO/AEO) कस्टमाइज्ड विशेष वैश्विक मामलों की रिपोर्ट में डिजिटल डेस्क के साथ समझिए कि जिनेवा में होने वाले दस्तखत से ठीक पहले कैसे पूरी बाजी पलटती नजर आ रही है।
जब तक इजरायली सेना लेबनान से पीछे नहीं हटती, तब तक युद्ध पूरी तरह खत्म नहीं माना जाएगा– ईरान की दो टूक
ईरान के सरकारी टेलीविजन पर लाइव प्रसारित हुए एक बेहद अहम संबोधन में विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने दुनिया भर के राजनयिकों के सामने अपनी बात रखी। उन्होंने बेहद सख्त लहजे में कहा कि दक्षिणी लेबनान की सरजमीं पर इजरायल का अवैध कब्जा जारी रहना सीधे तौर पर अमेरिका और ईरान के बीच तय हुए समझौते (Memorandum of Understanding) का खुला उल्लंघन माना जाएगा। अरागची ने कूटनीतिक दबाव बढ़ाते हुए आगे कहा कि लेबनान में युद्ध का पूरी तरह थमना, इस महा-समझौते के तहत पूरे क्षेत्रीय युद्ध को खत्म करने का एक सबसे अहम और अभिन्न हिस्सा है। जब तक इजरायली डिफेंस फोर्सेस (IDF) उन तमाम इलाकों को खाली करके पीछे नहीं हटतीं जिन पर उसने इस ताजा जंग के दौरान सैन्य कब्जा किया था, तब तक ईरान इस युद्ध को पूरी तरह खत्म नहीं मानेगा और लेबनान पर इजरायल का कोई भी नया हमला सीधे तौर पर वाशिंगटन-तेहरान डील को तोड़ना माना जाएगा।
हम इस समझौते के पक्षकार नहीं, हमारी अपनी प्राथमिकताएं हैं– भड़के इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू का पलटवार
ईरान के इस आक्रामक रुख पर इजरायल की तरफ से भी बेहद तीखी और बेबाक प्रतिक्रिया सामने आई है, जिससे पश्चिमी एशिया (Mid-East) का राजनीतिक पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। दरअसल, इजरायल इस गुप्त शांति समझौते का प्रत्यक्ष रूप से कोई पक्षकार या हिस्सा नहीं है। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (Benjamin Netanyahu) ने इस पूरे मामले पर अपना कड़ा रुख साफ करते हुए दो टूक कहा कि यह डील पूरी तरह से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का अपना फैसला हो सकती है, लेकिन इजरायल की अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और प्राथमिकताएं सबसे पहले हैं। नेतन्याहू ने साफ लफ्जों में एलान किया कि इजरायली सेना अपनी सुरक्षा के लिए दक्षिणी लेबनान के बफर जोन (Buffer Zone) में तब तक पूरी मजबूती से डटी रहेगी, जब तक इजरायल सरकार को वहां बने रहना जरूरी लगेगा। इजरायल का यह रुख अमेरिकी और इजरायली सेना के उन संयुक्त हवाई हमलों की रणनीति से मेल खाता है, जिसकी शुरुआत इसी साल 28 फरवरी को हुई थी।
शुक्रवार को जिनेवा में होने वाले औपचारिक हस्ताक्षर से पहले फंसा पेंच, होर्मुज स्ट्रेट को लेकर भी संशय बरकरार
राजनयिक विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों देशों के बयानों में दिख रही यह भयंकर अस्पष्टता ठीक वैसी ही है, जैसी इसी साल अप्रैल के महीने में हुए अस्थायी युद्धविराम (Ceasefire) के दौरान देखी गई थी। उस वक्त भी दोनों देशों के अलग-अलग दावों के चलते न तो क्षेत्र में व्यापक शांति स्थापित हो सकी थी और न ही दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक समुद्री रास्ते 'होर्मुज स्ट्रेट' (Strait of Hormuz) को दोबारा पूरी तरह से खोला जा सका था। वाशिंगटन से आ रही खबरों के मुताबिक, आगामी शुक्रवार को स्विट्जरलैंड के जिनेवा में इस ऐतिहासिक डील पर औपचारिक हस्ताक्षर होने तय हैं, लेकिन ईरान और इजरायल के इन ताजा बयानों से साफ हो गया है कि पर्दे के पीछे समझौते का एक बहुत बड़ा हिस्सा अभी भी पूरी तरह अनसुलझा है। अब देखना यह होगा कि क्या अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने प्रभाव से इस समझौते को बचा पाते हैं या फिर यह डील आधिकारिक रूप से साइन होने से पहले ही पूरी तरह फ्लॉप हो जाएगी।