शेख हसीना के करीबी पूर्व मंत्री हसनुल हक इनु को 10 साल की सजा: छात्रों के दमन और हिंसा के लिए ठहराए गए दोषी
बांग्लादेश की सियासत में एक बड़े घटनाक्रम के तहत, पूर्व सूचना मंत्री और 1971 मुक्ति संग्राम के अनुभवी सेनानी हसनुल हक इनु को 10 साल की जेल की सजा सुनाई गई है। इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल ने इनु को अगस्त 2024 के सरकार विरोधी छात्र आंदोलनों के दौरान पुलिस को घातक बल प्रयोग के लिए उकसाने और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दमनकारी नीति अपनाने का दोषी पाया है। यह फैसला शेख हसीना के कार्यकाल के दौरान हुई हिंसा को लेकर गठित विशेष न्यायाधिकरणों की एक और कड़ी कार्रवाई है।
211 पन्नों का ऐतिहासिक फैसला और आरोप
ट्रिब्यूनल ने 211 पन्नों के अपने विस्तृत फैसले में इनु को जुलाई 2024 के विद्रोह के दौरान कुश्तिया जिले में छह प्रदर्शनकारियों की हत्या से संबंधित अपराधों के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार माना है। अभियोजन पक्ष ने साक्ष्य पेश किए कि 19 जुलाई 2024 को प्रधानमंत्री आवास पर हुई 14-दलीय गठबंधन की उच्च-स्तरीय बैठक में इनु मौजूद थे, जहां सेना की तैनाती और प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने का विवादित निर्णय लिया गया था। इसके अलावा, उन पर पुलिस को प्रदर्शनकारियों की सूची बनाकर उन पर कार्रवाई करने और टीवी इंटरव्यू के जरिए आंदोलनकारियों को 'आतंकवादी' कहकर बदनाम करने का आरोप भी साबित हुआ है।
'अग्निपरीक्षा' करार देकर नकारा फैसला
सजा सुनाए जाने के बाद इनु ने इस पूरी कानूनी कार्यवाही को महज एक 'नाटक' करार दिया है। अदालत कक्ष से बाहर निकलते हुए उन्होंने संवाददाताओं से कहा कि यह एक फर्जी मुकदमा है और वे इस 'अग्निपरीक्षा' से गुजर रहे हैं। उनकी पत्नी अफरोजा हक रीना ने भी इस फैसले पर कड़ी नाराजगी जाहिर की है और संकेत दिया है कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और अधिवक्ताओं से सलाह लेने के बाद परिवार ऊपरी अदालत में अपील दायर करने पर विचार करेगा।
शेख हसीना के शासन में इनु का रसूख
हसनुल हक इनु ने 2012 से 2018 तक सूचना मंत्री के रूप में बांग्लादेश की कैबिनेट में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। हालांकि, 2024 की अशांति के दौरान उनका राजनीतिक प्रभाव पहले के मुकाबले कम हो गया था, लेकिन अभियोजन पक्ष ने अदालत को यह समझाने में सफलता हासिल की कि हसीना सरकार के गिरने के अंतिम क्षणों तक इनु फैसले लेने वाली कोर टीम का हिस्सा थे। यह सजा इस बात का संकेत है कि अंतरिम सरकार के बाद गठित न्यायाधिकरण, पिछली सरकार के उन मंत्रियों और सलाहकारों के खिलाफ शिकंजा कसने के लिए प्रतिबद्ध हैं, जिनकी भूमिका छात्र आंदोलन को कुचलने में रही थी।