पुतिन को बड़ा झटका: 18 महीने की मेहनत हुई फेल, सीरिया ने छीने रूस के सभी मिलिट्री बेस
वैश्विक कूटनीति के मोर्चे पर रूस और उसके राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के लिए एक बहुत बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आई है, जिसने अंतरराष्ट्रीय गलियारों में हलचल मचा दी है। सीरिया के राजनीतिक और सैन्य समीकरणों में आए भारी बदलाव के बाद देश में रूसी प्रभाव को करारा झटका लगा है और मॉस्को को अपने रणनीतिक मिलिट्री बेस से हाथ धोना पड़ा है। कभी मध्य पूर्व में रूस के दबदबे का सबसे बड़ा केंद्र माने जाने वाले सीरियाई ठिकानों से रूसी सेना की बेदखली को पुतिन की एक बड़ी कूटनीतिक और सामरिक हार के रूप में देखा जा रहा है, जिसने पिछले डेढ़ साल की पूरी मेहनत पर पानी फेर दिया है।
18 महीने की रणनीतिक मेहनत और रूसी पकड़ का कमजोर होना
रूस ने पिछले 18 महीनों के दौरान सीरिया में अपनी सैन्य स्थिति को मजबूत बनाए रखने और भूमध्य सागर पर अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था। सीरियाई संकट के दौर में बशर अल-असद की सरकार को बचाने के लिए रूस ने भारी सैन्य साजो-सामान और सैनिकों की तैनाती की थी, ताकि वाशिंगटन और पश्चिमी देशों के प्रभाव को काउंटर किया जा सके। हालांकि, सीरिया के अंदरूनी सत्ता समीकरणों में अचानक आए बड़े उलटफेर और नए राजनीतिक नेतृत्व के उभार ने पूरे खेल को ही बदल दिया, जिसके चलते रूस को अपने दशकों पुराने और बेहद महत्वपूर्ण सैन्य अड्डों को खाली करने का कड़ा फैसला लेना पड़ा है।
मध्य पूर्व में रूस के प्रभुत्व पर असर और वैश्विक भू-राजनीतिक समीकरण
सीरिया द्वारा रूस के मिलिट्री बेस छीने जाने की इस घटना ने ग्लोबल पॉलिटिक्स में एक नया भूचाल ला दिया है। मध्य पूर्व के देशों में रूस की यह पीछे हटने की स्थिति दर्शाती है कि युद्ध के मैदान में बदलती परिस्थितियों के आगे महाशक्तियों के समीकरण भी कितनी जल्दी बिखर सकते हैं। भूमध्य सागर से लेकर खाड़ी देशों तक फैले इस सामरिक क्षेत्र में रूस की घटती ताकत का सीधा फायदा अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगियों को मिल सकता है। अब पूरी दुनिया के रक्षा विशेषज्ञ इस बात का आकलन कर रहे हैं कि पुतिन इस करारे झटके के बाद अपनी विदेश और सैन्य नीति में क्या नया कदम उठाएंगे और मॉस्को का यह नुकसान अंतरराष्ट्रीय राजनीति को किस दिशा में ले जाएगा।