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बिना अस्त्र-शस्त्र और चेहरे पर घनी मूंछें! भारत का वह अनोखा मंदिर जहां अलग रूप में दिखते हैं श्रीकृष्ण

हिंदू धर्म में भगवान श्रीकृष्ण के बाल रूप से लेकर उनके सुदर्शन चक्र धारी चतुर्भुज रूप तक के दर्शन आपने कई मंदिरों में किए होंगे. लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में एक ऐसा ऐतिहासिक और रहस्यमयी मंदिर भी है, जहां भगवान श्रीकृष्ण अपनी पारंपरिक छवि से बिल्कुल अलग, चेहरे पर घनी मूंछों के साथ विराजमान हैं. इतना ही नहीं, महाभारत के युद्ध का गवाह होने के बावजूद इस मंदिर में भगवान के हाथों में कोई भी अस्त्र-शस्त्र मौजूद नहीं है. वैष्णव संप्रदाय के बेहद पवित्र 108 दिव्य देशम (108 Divya Deshams) में शामिल यह मंदिर वास्तुकला और आस्था का एक अद्भुत केंद्र माना जाता है.

महाभारत काल से जुड़ा है मूंछों वाले कान्हा का यह गहरा नाता

यह चमत्कारी और अनोखा मंदिर दक्षिण भारत के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में गिना जाता है, जिसे 'पार्थसारथी मंदिर' (Parthasarathy Temple) के नाम से जाना जाता है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत के युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के सारथी (पार्थ के सारथी) की भूमिका निभाई थी. युद्ध के नियमों के तहत उन्होंने प्रतिज्ञा ली थी कि वे पूरे युद्ध के दौरान कोई भी हथियार नहीं उठाएंगे. यही कारण है कि इस मंदिर की गर्भगृह में स्थापित श्रीकृष्ण की मूर्ति के हाथों में कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं है. चेहरे पर मौजूद घनी मूंछें उनके सारथी रूप और उस काल के पुरुषों के शौर्य को दर्शाती हैं, जो भक्तों को मंत्रमुग्ध कर देती हैं.

तीरों से घायल चेहरे के निशान आज भी मूर्ति पर हैं मौजूद

इस पावन धाम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां स्थापित भगवान श्रीकृष्ण की उत्सव मूर्ति (जुलूस के लिए इस्तेमाल होने वाली प्रतिमा) के चेहरे पर तीरों के छोटे-छोटे निशान दिखाई देते हैं. लोक कथाओं के अनुसार, जब भीष्म पितामह और कौरव सेना के महारथी अर्जुन पर बाणों की वर्षा कर रहे थे, तब सारथी बने भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन की रक्षा के लिए उन तीरों को अपने चेहरे और शरीर पर झेल लिया था. उन्हीं तीरों के घाव के प्रतीक आज भी इस दिव्य प्रतिमा पर साफ देखे जा सकते हैं, जो भगवान के अपने भक्तों के प्रति असीम प्रेम को दर्शाते हैं.

दर्शन मात्र से दूर होते हैं जीवन के सारे कष्ट

चेन्नई (तमिलनाडु) के त्रिप्लिकेन में स्थित इस ऐतिहासिक पल्लवकालीन मंदिर का इतिहास सदियों पुराना है. 108 दिव्य देशम में स्थान पाने के कारण देश-विदेश से श्रद्धालु यहां मूंछों वाले पार्थसारथी रूप के दर्शन करने आते हैं. ऐसी मान्यता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से भगवान के इस शांत और शस्त्रविहीन रूप के दर्शन करता है, उसके जीवन के सभी पारिवारिक और मानसिक क्लेश हमेशा के लिए समाप्त हो जाते हैं. मंदिर की अनूठी नक्काशी, शांत वातावरण और भगवान का यह दुर्लभ रूप हर सनातनी और इतिहास प्रेमी को अपनी ओर आकर्षित करता है.

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