राजस्थान : आदिवासी अधिकारों की जंग अब सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे पर, सांसद रोत ने केंद्र सरकार को घेरा और MESA कानून पर उठाए सवाल

राजस्थान : आदिवासी अधिकारों की जंग अब सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे पर, सांसद रोत ने केंद्र सरकार को घेरा और MESA कानून पर उठाए सवाल

राजस्थान के आदिवासी बहुल क्षेत्रों और राजनीतिक गलियारों से इस वक्त की सबसे बड़ी और गरमागरम खबर सामने आ रही है। बांसवाड़ा से सांसद और भारत आदिवासी पार्टी (BAP) के राष्ट्रीय नेता राजकुमार रोत ने आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए अपनी मुहिम को अब देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा दिया है। दिल्ली और राजस्थान की राजनीति में अपनी मुखर आवाज के लिए पहचाने जाने वाले सांसद राजकुमार रोत ने सीधे तौर पर केंद्र सरकार को घेरते हुए विवादास्पद 'मीसा' (MESA) और अन्य स्थानीय कानूनों को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उनका आरोप है कि आदिवासी क्षेत्रों में बिना स्थानीय सहमति के थोपे जा रहे कानून और नीतियां संविधान की पांचवीं अनुसूची (Fifth Schedule) और आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन के पारंपरिक अधिकारों पर सीधा कुठाराघात हैं। इस बड़े कानूनी कदम के बाद से राष्ट्रीय राजधानी से लेकर जयपुर तक राजनीतिक सरगर्मी काफी तेज हो गई है।

सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर आदिवासी हितों की उठाई जोरदार मांग

सांसद राजकुमार रोत द्वारा उठाए गए इस कदम के तहत सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर आदिवासियों के अधिकारों, स्वायत्तता और उनकी संस्कृति की रक्षा के लिए ठोस दिशा-निर्देश तय करने की मांग की गई है। उनका कहना है कि दशकों बीत जाने के बाद भी आदिवासी इलाकों में पंचायती राज (विस्तार) अधिनियम यानी पेसा (PESA) कानून को पूरी ईमानदारी और उसकी मूल भावना के साथ धरातल पर लागू नहीं किया गया है। इसके विपरीत, ऐसे कड़े और दमनकारी कानून लाए जा रहे हैं जो आदिवासी समाज की स्वायत्तता को कुचलने का काम करते हैं। अदालत के समक्ष रखे गए इन तर्कों से यह साफ हो गया है कि आने वाले दिनों में यह कानूनी लड़ाई केंद्र सरकार और आदिवासी नुमाइंदों के बीच एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनने वाली है।

MESA कानून और केंद्र सरकार की नीतियों पर तीखे सवाल

सांसद रोत ने मीडिया और जन मंचों के माध्यम से केंद्र सरकार की नीतियों की आलोचना करते हुए कहा कि आदिवासी अंचलों में विकास के नाम पर हो रही मनमानी को अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने MESA कानून के प्रावधानों को लेकर तीखे सवाल पूछे हैं और कहा है कि इस तरह के कानूनों के जरिए आदिवासियों को उनके ही घरों और जंगलों से बेदखल करने की साजिश रची जा रही है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि उनकी यह कानूनी लड़ाई सिर्फ एक राजनीतिक बयानबाजी नहीं है, बल्कि देश भर के करोड़ों आदिवासियों के अस्तित्व, अस्मिता और उनके संवैधानिक हकों की रक्षा के लिए एक निर्णायक संघर्ष है।

आदिवासी संगठनों का मिला समर्थन, राष्ट्रीय स्तर पर गरमाई सियासत

सुप्रीम कोर्ट में इस मामले के पहुंचने के बाद राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ समेत देश के कई राज्यों के आदिवासी संगठनों और छात्र यूनियनों ने राजकुमार रोत के इस कदम का खुला समर्थन करना शुरू कर दिया है। जानकारों का मानना है कि यदि उच्चतम न्यायालय इस मामले में कोई कड़ी टिप्पणी या निर्देश जारी करता है, तो इसका असर देश की राष्ट्रीय राजनीति और आगामी चुनावों पर पड़ना तय है। आदिवासी वोट बैंक और उनके अधिकारों से जुड़े इस संवेदनशील मुद्दे पर अब सभी राजनीतिक दलों की निगाहें सुप्रीम कोर्ट की अगली कार्रवाई पर टिकी हुई हैं।

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