तांत्रिकों के जाल में फंस रहे लोग, हैरान करने वाले आंकड़ों में सामने आया कि 51 मामलों में से सिर्फ 6 को मिली सजा
भारतीय समाज और संस्कृति सदियों से अपनी धार्मिक मान्यताओं, परंपराओं और संस्कारों के लिए जानी जाती है, लेकिन आधुनिकता और विज्ञान के इस दौर में भी देश के कई हिस्सों में अंधविश्वास, जादू-टोना और पाखंड का काला साया आज भी मजबूती के साथ पैर पसारे हुए है। खासकर राजस्थान जैसे विशाल और सांस्कृतिक राज्य से एक ऐसी चौंकाने वाली और आंखें खोल देने वाली रिपोर्ट सामने आई है जिसने पूरे प्रशासनिक और न्यायिक तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है। राजस्थान में अंधविश्वास और तांत्रिकों का यह नेटवर्क इस कदर फल-फूल रहा है कि आम और भोले-भाले लोग आसानी से इनके चंगुल में फंसकर अपनी संपत्ति, इज्जत और कई बार अपनी जान तक गंवा बैठते हैं। हाल ही में सामने आए अपराध आंकड़ों और कानूनी समीक्षा से यह बात स्पष्ट हुई है कि अंधविश्वास और तंत्र-मंत्र से जुड़े मामलों में पुलिस और अदालतों तक पहुंचे कुल 51 बड़े मामलों में से महज 6 मामलों में ही दोषियों को सजा मिल पाई है। न्याय मिलने की यह बेहद धीमी और कमजोर रफ्तार इस बात का प्रमाण है कि इस अवैध और खतरनाक कारोबार से जुड़े लोग किस प्रकार कानून की खामियों का फायदा उठाकर आसानी से बच निकलते हैं।
तांत्रिकों का बढ़ता जाल और भोले-भाले लोगों की मजबूरी
राजस्थान के विभिन्न ग्रामीण और शहरी इलाकों में सक्रिय ये तथाकथित तांत्रिक और ओझा अक्सर लोगों की मानसिक कमजोरी, पारिवारिक कलह, बीमारी या आर्थिक तंगी का फायदा उठाते हैं। समाज के एक बड़े वर्ग में आज भी यह अंधविश्वास गहराई तक समाया हुआ है कि किसी भी बीमारी, भूत-प्रेत की बाधा या दुर्भाग्य से छुटकारा पाने के लिए डॉक्टर या अस्पताल जाने के बजाय किसी बाबा या तांत्रिक के पास जाना ज्यादा असरदार होता है। तांत्रिक लोग तरह-तरह के डरावने अनुष्ठान, हवन और अमानवीय टोटके करके लोगों को अपनी जाल में फंसाते हैं और उनसे मुंहमांगी रकम वसूलते हैं। जब पीड़ित परिवारों को यह अहसास होता है कि उनके साथ बड़ा धोखा हुआ है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है और वे सर्वस्व गंवा चुके होते हैं। इस प्रकार का अंधविश्वास न केवल समाज को मानसिक रूप से कमजोर कर रहा है, बल्कि यह एक संगठित अपराध का रूप लेता जा रहा है जिस पर लगाम लगाना प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।
अदालती आंकड़ों की कड़वी सच्चाई: 51 में से सिर्फ 6 को सजा क्यों?
राजस्थान में अंधविश्वास और तंत्र-मंत्र के नाम पर होने वाले जुल्मों के खिलाफ जब कानून का शिकंजा कसने की कोशिश की जाती है, तो सिस्टम की सुस्त रफ्तार और साक्ष्यों की कमी के कारण आरोपियों के हौसले बुलंद बने रहते हैं। हालिया आंकड़ों के विश्लेषण से यह पता चला है कि इस तरह के कुल 51 मामलों में पुलिस ने जांच के बाद चार्जशीट दाखिल की, लेकिन मजबूत पैरवी और पुख्ता सबूतों के अभाव के चलते अदालतों में केवल 6 मामलों में ही सजा मुकर्रर हो पाई। बाकी के ज्यादातर मामले या तो गवाहों के मुकर जाने के कारण खारिज हो गए या फिर आपसी समझौते के नाम पर रफा-दफा कर दिए गए। कानूनी जानकारों का यह मानना है कि जब तक समाज में अंधविश्वास के खिलाफ कोई कड़ा और विशेष कानून पूरी सख्ती से लागू नहीं किया जाता और त्वरित अदालती सुनवाई नहीं होती, तब तक इन ठगों और पाखंडियों के मन से कानून का डर खत्म नहीं हो सकता।
नरबल, अंधविश्वास और महिलाओं तथा बच्चों पर बढ़ता अत्याचार
तांत्रिकों के इस काले और डरावने नेटवर्क का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि कई बार यह पाखंड नरबलि और अमानवीय प्रताड़ना जैसी जघन्य वारदातों तक पहुंच जाता है। आए दिन ऐसी खबरें सुनने को मिलती हैं जहां तांत्रिकों के बहकावे में आकर लोगों ने अपने ही परिवार के मासूम बच्चों या महिलाओं को बलि देने की कोशिश की या उन्हें डायन बताकर प्रताड़ित किया। अंधविश्वास की इन अंधी गलियों में सबसे ज्यादा शिकार महिलाएं और बच्चे बनते हैं, जिनकी आवाज को ये शातिर तांत्रिक दबा देते हैं। इस प्रकार की घटनाएं केवल राजस्थान ही नहीं बल्कि देश के अन्य राज्यों के लिए भी एक गंभीर चिंता का विषय हैं, जिन्हें रोकने के लिए केवल पुलिस कार्रवाई काफी नहीं है, बल्कि समाज के हर वर्ग को मिलकर एक बड़ी वैचारिक क्रांति लानी होगी।
सामाजिक जागरूकता और शिक्षा ही है इस कुप्रथा का एकमात्र इलाज
इस लाइलाज बीमारी जैसी अंधविश्वास की समस्या का समाधान केवल पुलिस की डंडे या अदालती फैसलों से पूरी तरह संभव नहीं है, जब तक कि समाज की सोच में बुनियादी बदलाव न लाया जाए। गांव-गांव और ढाणी-ढाणी तक शिक्षा का प्रसार करना, वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific Temperament) को बढ़ावा देना और लोगों को इन पाखंडियों के झांसे से बचाने के लिए विशेष जागरूकता अभियान चलाना बेहद जरूरी है। मीडिया, विद्यालयों, गैर-सरकारी संगठनों और स्थानीय प्रशासन को मिलकर एक ऐसा मजबूत नेटवर्क तैयार करना होगा जो लोगों को यह समझा सके कि जीवन की हर समस्या का समाधान अंधविश्वास या तांत्रिक क्रियाओं में नहीं, बल्कि मेहनत, विज्ञान और सही चिकित्सा उपचार में निहित है। राजस्थान के इस कड़वे सच को बदलने के लिए हर जागरूक नागरिक को आगे आना होगा ताकि किसी और मासूम की जिंदगी इस काले जाल में न उलझ सके।