मां को अयोग्य साबित किए बिना बच्चे को पिता नहीं रख सकता अलग, पांच साल के मासूम को तुरंत मां को सौंपने का आदेश

मां को अयोग्य साबित किए बिना बच्चे को पिता नहीं रख सकता अलग, पांच साल के मासूम को तुरंत मां को सौंपने का आदेश

भारतीय न्यायपालिका और पारिवारिक अदालतों के फैसलों में अक्सर बच्चों की कस्टडी को लेकर माता-पिता के बीच लंबी कानूनी लड़ाइयां देखने को मिलती हैं। इसी कड़ी में देश के एक उच्च न्यायालय ने बच्चों की कस्टडी और मां के अधिकारों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण, संवेदनशील और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने अपने एक कड़े और स्पष्ट आदेश में कहा है कि कानून की नजर में जब तक किसी मां को अदालत या कानूनी रूप से बच्चे की देखभाल करने के लिए पूरी तरह अयोग्य या अनुपयुक्त साबित नहीं कर दिया जाता, तब तक किसी भी पिता या अन्य परिजनों को वैध कानूनी प्रक्रिया के बिना मासूम बच्चे को उसकी मां से अलग रखने का कोई अधिकार नहीं है। इस ऐतिहासिक फैसले के साथ ही हाईकोर्ट ने पांच साल के एक मासूम बच्चे को उसके पिता के कब्जे से मुक्त कराकर उसकी मां को सौंपने का कड़ा निर्देश जारी किया है। यह फैसला उन तमाम पारिवारिक मामलों में एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगा जहां पति-पत्नी के विवाद के बीच मासूम बच्चों की कस्टडी को लेकर खींचतान मची रहती है। आइए इस विस्तृत लेख में जानते हैं कि इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि क्या थी, अदालत ने अपने फैसले में किन-किन कानूनी पहलुओं और सिद्धांतों का हवाला दिया है और बाल संरक्षण के लिहाज से इसके क्या बड़े मायने हैं।

क्या है पूरा मामला और क्यों पहुंचा कोर्ट तक विवाद

यह पूरा मामला पति और पत्नी के बीच उपजे आपसी मतभेदों, विवाद और पारिवारिक कलह से जुड़ा हुआ है। शादी के कुछ वर्षों बाद आपसी अनबन बढ़ने के कारण महिला अपने पति से अलग रहने लगी थी, लेकिन उस दौरान उनका पांच साल का मासूम बेटा अपने पिता के पास ही रह गया था। महिला ने जब अपने बच्चे से मिलने की कोशिश की या उसे अपने साथ रखने की मांग की, तो पिता और उसके परिवारवालों ने साफ इनकार कर दिया और बच्चे को मिलने तक नहीं दिया। मजबूर होकर दुखी मां ने कानून का दरवाजा खटखटाया और बच्चे की कस्टडी हासिल करने के लिए संबंधित अदालत में 'हेबियस कॉर्पस' (बंदी प्रत्यक्षीकरण) यानी बच्चे को पेश करने की गुहार लगाते हुए याचिका दायर की। निचली अदालतों से होते हुए यह मामला आखिरकार उच्च न्यायालय के समक्ष पहुंचा, जहां न्यायाधीशों ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कानून और ममता के तराजू पर मामले को तौलते हुए यह ऐतिहासिक और न्यायसंगत फैसला सुनाया।

अदालत की सख्त टिप्पणी: मां के आंचल से बच्चे को अलग करना गैरकानूनी

सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई कि कैसे एक पिता बिना किसी सक्षम अदालत के औपचारिक आदेश के, केवल अपने अधिकार का हवाला देकर एक छोटे बच्चे को उसकी अपनी मां से अलग रख सकता है। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत यह कहता है कि पांच साल तक की उम्र के छोटे बच्चों के पालन-पोषण और भावनात्मक विकास के लिए मां का सान्निध्य सबसे ज्यादा जरूरी और प्राकृतिक होता है। जब तक पिता किसी भी ठोस, पुख्ता और कानूनी सबूत के आधार पर यह साबित नहीं कर देता कि मां बच्चे की देखभाल करने, उसका लालन-पालन करने या उसकी सुरक्षा के लिहाज से मानसिक, शारीरिक या नैतिक रूप से पूरी तरह अयोग्य है, तब तक बच्चे को मां से दूर रखना कानून की नजर में बिल्कुल भी जायज नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि पारिवारिक विवादों की लड़ाई में बच्चों को एक मोहरा या हथियार की तरह इस्तेमाल करना बेहद निंदनीय है, जिससे मासूम बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर पड़ता है।

बच्चे के सर्वोत्तम हित (Best Interest of the Child) का सिद्धांत

पारिवारिक कानूनों और बाल अधिकारों के मामलों में न्यायपालिका हमेशा से 'बच्चे के सर्वोत्तम हित' (Best Interest of the Child) के सिद्धांत को सबसे ऊपर रखती है। इस मामले में भी हाईकोर्ट ने इसी मूल मंत्र को आधार बनाते हुए अपना फैसला सुरक्षित रखा और सुनाया। अदालत ने माना कि पांच साल के एक मासूम बच्चे को अपनी मां के लाड़-प्यार, ममता और देखभाल की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। पिता चाहे कितनी भी अच्छी सुविधाएं या आर्थिक संपन्नता क्यों न दे दे, लेकिन एक मां की जगह कोई दूसरा नहीं ले सकता। यदि कोई पारिवारिक विवाद चल भी रहा है, तो उसका असर बच्चे के प्राकृतिक अधिकारों पर नहीं पड़ना चाहिए। अदालत ने आदेश दिया कि बच्चे के समग्र विकास, मानसिक शांति और खुशहाल भविष्य के लिए यह अति आवश्यक है कि उसे तुरंत उसकी मां के संरक्षण में वापस भेजा जाए, ताकि बच्चा किसी भी प्रकार के मानसिक तनाव या आघात से बच सके।

पुलिस सुरक्षा के साथ बच्चे को मां को सौंपने का निर्देश

उच्च न्यायालय ने केवल मौखिक टिप्पणी करने के बजाय अपने आदेश का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने के लिए प्रशासन और पुलिस विभाग को भी स्पष्ट निर्देश जारी किए। अदालत ने आदेश दिया कि स्थानीय पुलिस प्रशासन की मौजूदगी और निगरानी में पांच साल के उस मासूम बच्चे को उसके पिता के घर से सुरक्षित निकालकर उसकी मां को सौंपा जाए, ताकि आदेश के पालन में किसी भी प्रकार की आनाकानी या व्यवधान उत्पन्न न हो सके। इसके साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि यदि भविष्य में पिता को बच्चे से मिलने या उससे जुड़ी कोई अन्य कानूनी मांग करनी है, तो वह उचित पारिवारिक न्यायालय (Family Court) में नियमानुसार अपनी अर्जी दाखिल कर सकता है, लेकिन इस तरह बलपूर्वक या गैरकानूनी तरीके से बच्चे को मां से अलग रखने की अनुमति किसी भी परिस्थिति में नहीं दी जाएगी।

इस ऐतिहासिक फैसले के सामाजिक और कानूनी मायने

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हाईकोर्ट का यह फैसला देश भर के उन हजारों माता-पिता के लिए एक बहुत बड़ा संदेश है जो आपसी झगड़ों के बाद बच्चों की कस्टडी को लेकर गैरकानूनी हथकंडे अपनाते हैं। अक्सर समाज में यह देखने को मिलता है कि पुरुषवादी सोच या आर्थिक ताकत के दम पर पिता या उसके परिजन जबरन बच्चों को अपनी कस्टडी में रख लेते हैं और मां को रोने के लिए विवश कर देते हैं। इस फैसले के बाद अब माताओं को अपने बच्चों के कानूनी अधिकार और कस्टडी पाने के लिए एक मजबूत वैधानिक आधार मिल गया है। यह निर्णय यह साबित करता है कि भारतीय न्यायपालिका बच्चों के प्रति मां के नैसर्गिक अधिकारों और ममता का पूरा सम्मान करती है, और कानून के दायरे में रहकर हर उस मां को न्याय दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है जो अपनों के बीच ही अन्याय का शिकार हो रही है।

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