मुहर्रम और आशूरा: कर्बला की जंग और पैगंबर के नाती की शहादत; जानें इमाम हुसैन की याद में क्यों निकाला जाता है ताजिया

मुहर्रम और आशूरा: कर्बला की जंग और पैगंबर के नाती की शहादत; जानें इमाम हुसैन की याद में क्यों निकाला जाता है ताजिया

इस्लाम धर्म में मुहर्रम का महीना बेहद पाक और पवित्र माना गया है। पूरी दुनिया के मुसलमानों के लिए इस महीने का एक खास और ऐतिहासिक महत्व है। इस्लामिक हिजरी कैलेंडर के अनुसार, मुहर्रम का महीना इस्लाम धर्म का पहला महीना होता है, जिसका सीधा मतलब यह है कि इसी पाक महीने से इस्लामिक नववर्ष (New Year) की शुरुआत होती है।

लेकिन नए साल की शुरुआत होने के बावजूद इस्लाम में मुहर्रम के शुरुआती 10 दिनों को उत्सव के रूप में नहीं, बल्कि बेहद गम, शोक और मातम के दिनों के रूप में मनाया जाता है। यह वही समय है जब सदियों पहले इराक के रेगिस्तान 'कर्बला' (Karbala) के मैदान में एक ऐतिहासिक और रोंगटे खड़े कर देने वाली जंग लड़ी गई थी। इस जंग में पैगंबर मोहम्मद के प्यारे नाती इमाम हुसैन (Imam Hussain) ने हक और इंसानियत की रक्षा के लिए अत्याचारी शासक यजीद की सेना के खिलाफ लड़ते हुए अपने परिवार और 72 साथियों के साथ अपनी जान की अजीम शहादत (कुर्बानी) दी थी।

सऊदी अरब और भारत में कब है आशूरा?

मुहर्रम के पूरे महीने में सबसे महत्वपूर्ण और खास दिन 'आशूरा' (Ashura) को माना जाता है। आशूरा मुहर्रम महीने की 10वीं तारीख को कहते हैं, जो कि शहादत का मुख्य दिन है। इस साल चांद दिखने के समय में एक दिन का अंतर होने की वजह से सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और अन्य खाड़ी देशों में आशूरा आज (25 जून, 2026) मनाया जा रहा है। वहीं, भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित उपमहाद्वीप के देशों में आशूरा कल यानी 26 जून, 2026 (शुक्रवार) को पूरी अकीदत और गमगीन माहौल के साथ मनाया जाएगा। इस दिन देश भर में बड़े पैमाने पर ताजिया के जुलूस निकाले जाएंगे।

आखिर क्या होता है 'ताजिया' (Tazia)?

मुहर्रम के शोक और मातम के दिनों में सबसे प्रमुख और पवित्र प्रतीक 'ताजिया' को माना जाता है। ताजिया महज कोई बांस-कागज का ढांचा या कलाकृति नहीं है, बल्कि यह अपने आप में इस्लामिक इतिहास, बलिदान और अटूट आस्था की एक बहुत लंबी जीवंत कहानी बयां करता है।

तकनीकी और धार्मिक रूप से, ताजिया को इराक के कर्बला शहर में स्थित हजरत इमाम हुसैन के पवित्र मकबरे (रोजा या दरगाह) का एक प्रतीकात्मक मॉडल (Replica) माना जाता है। इसे स्थानीय कारीगरों द्वारा बांस की खपच्चियों, रंग-बिरंगे चमकीले कागजों, लकड़ी, कपड़े, कीमती धातुओं और अन्य सजावटी सामानों की मदद से बेहद खूबसूरती और बारीकी से तैयार किया जाता है।

आमतौर पर अकीदतमंद लोग इन ताज़ियों को मुहर्रम का चांद दिखने के साथ ही यानी पहली तारीख को या शुरुआती दिनों में बड़े अदब के साथ अपने घरों, सार्वजनिक इमामबाड़ों और अजाखानों (शोक स्थलों) में स्थापित करते हैं। इसके बाद लगातार 9 दिनों तक इनकी देखरेख की जाती है और फिर 10वीं मुहर्रम यानी आशूरा के दिन इन्हें एक विशाल जुलूस के रूप में निकालकर स्थानीय कर्बला या तय स्थानों पर ले जाकर पूरी धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ सुपुर्द-ए-खाक (दफनाया) किया जाता है।

मुहर्रम में क्यों निकाला जाता है ताजिया? जानिए इसके पीछे की परंपरा

भारत के लखनऊ, दिल्ली, हैदराबाद और कानपुर जैसे ऐतिहासिक शहरों में मुहर्रम के दौरान ताजिया निकालने की परंपरा सदियों पुरानी है, जिसमें हर साल लाखों की संख्या में हिंदू और मुस्लिम समाज के लोग एक साथ शामिल होकर कौमी एकता की मिसाल पेश करते हैं। मुहर्रम के दौरान निभाई जाने वाली लगभग सभी प्रमुख रस्में इसी ताजिया के इर्द-गिर्द घूमती हैं:

  • मजलिस और भावुक यादें: जैसे ही इमामबाड़ों में ताजिया की स्थापना होती है, वहां रोजाना धार्मिक शोक सभाओं (मजलिस) का दौर शुरू हो जाता है। इन मजलिसों में उलेमा और मौलाना साहब कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन और उनके छोटे-छोटे बच्चों पर ढाए गए जुल्मों और उनकी प्यास का जिक्र करते हैं, जिसे सुनकर वहां मौजूद लोगों की आंखें नम हो जाती हैं।

  • मातम, नौहा और सबील: जुलूस के दौरान लोग छाती पीटकर 'या हुसैन-या हुसैन' की गूंजती सदाएं लगाते हैं और अपनी अकीदत का इजहार करते हैं। इस दौरान इमाम हुसैन के गम में दर्दभरे मरसिए और नौहे (शोक गीत) पढ़े जाते हैं। राहगीरों और जुलूस में शामिल लोगों के लिए जगह-जगह पानी और शर्बत की 'सबील' (मुफ्त प्याऊ) लगाई जाती है, जो कर्बला में भूखे-प्यासे शहीद हुए लोगों की याद दिलाती है।

  • सामूहिक भागीदारी: समाज के सभी वर्गों के लिए अलग-अलग स्थानों पर शोक कार्यक्रमों का सुचारू आयोजन किया जाता है, जहां महिलाएं और पुरुष पूरी सादगी के साथ काले कपड़े पहनकर इमाम हुसैन को अपना नजराना-ए-अकीदत (श्रद्धांजलि) पेश करते हैं।

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