एमपी की सियासत में भूचाल! दतिया से क्यों कटा कद्दावर नेता नरोत्तम मिश्रा का टिकट, पर्दे के पीछे चली गई कौन सी छिपी चाल
मध्य प्रदेश की राजनीति के गलियारों से इस समय की सबसे सनसनीखेज और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है, जिसने पूरे सूबे के सियासी समीकरणों को हिलाकर रख दिया है। बीजेपी के सबसे कद्दावर और फायरब्रांड नेताओं में शुमार पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा का दतिया विधानसभा सीट से टिकट कट गया है। इस हाई-प्रोफाइल सीट से उनका नाम गायब होने के बाद से ही न केवल दतिया बल्कि पूरे मध्य प्रदेश के राजनीतिक हलकों में सन्नाटा पसरा हुआ है। हर कोई अब सिर्फ एक ही सवाल पूछ रहा है कि आखिर आलाकमान ने इतना बड़ा फैसला क्यों लिया और पर्दे के पीछे से नरोत्तम मिश्रा को किनारे लगाने के लिए किसने यह छिपी हुई चाल चली है।
दतिया की परंपरागत सीट से नरोत्तम मिश्रा के पत्ता कटने की असली इनसाइड स्टोरी
नरोत्तम मिश्रा लंबे समय से दतिया क्षेत्र में बीजेपी का सबसे बड़ा चेहरा रहे हैं। पार्टी संगठन और सरकार में उनका दबदबा जगजाहिर रहा है। इसके बावजूद उनका टिकट कटना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि पार्टी इस बार किसी भी कीमत पर जमीनी फीडबैक और आंतरिक सर्वे की रिपोर्ट को नजरअंदाज नहीं करना चाहती थी। अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, पिछले कुछ समय से स्थानीय स्तर पर एंटी-इंकंबेंसी (सत्तारूढ़ दल के प्रति नाराजगी) और नए चेहरों को मौका देने की मांग आलाकमान तक पहुंच रही थी। पार्टी के रणनीतिकारों ने काफी सोच-समझकर स्थानीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए यह चौंकाने वाला कदम उठाया है ताकि डैमेज कंट्रोल किया जा सके।
क्या दिल्ली दरबार में रची गई पटकथा या एमपी के भीतर ही बिछा था सियासी जाल?
मध्य प्रदेश की राजनीति के दिग्गज विश्लेषकों का बड़ा दावा: "नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटना केवल एक सीट का बदलाव नहीं है, बल्कि यह मध्य प्रदेश बीजेपी के भीतर चल रही एक बड़ी ओवरहॉलिंग का हिस्सा है। पार्टी अब पुरानी पीढ़ी के कद्दावर नेताओं के बजाय नए और बेदाग चेहरों पर दांव खेल रही है। यह कहना गलत नहीं होगा कि दिल्ली से लेकर भोपाल तक के बड़े रणनीतिकारों ने मिलकर यह बिसात बिछाई थी, ताकि राज्य में एक नई लीडरशिप लाइन तैयार की जा सके। इस फैसले के दूरगामी परिणाम पूरी मध्य प्रदेश की राजनीति पर देखने को मिलेंगे।"
इस बड़े बदलाव के बाद अब दतिया और आस-पास के बुंदेलखंड अंचल में पार्टी के भीतर असंतोष को थामना और कार्यकर्ताओं को एकजुट रखना नए उम्मीदवार के लिए एक बड़ी चुनौती साबित होने वाला है।
बुंदेलखंड और ग्वालियर-चंबल अंचल के स्थानीय वोटर्स पर क्या होगा इसका असर?
स्थानीय स्तर पर दतिया, ग्वालियर, डबरा और चंबल संभाग (Geographical Base) के राजनीतिक समीकरणों की बात करें तो नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों में इस फैसले को लेकर भारी नाराजगी और अचरज का माहौल है। क्षेत्र के टियर-2 और टियर-3 शहरों के स्थानीय नेताओं के बीच गुटबाजी बढ़ने का खतरा भी मंडराने लगा है। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि मध्य प्रदेश में आने वाले दिनों में कुछ बहुत बड़ा राजनीतिक फेरबदल होने वाला है। नरोत्तम मिश्रा को संगठन में कोई बड़ी राष्ट्रीय जिम्मेदारी देकर संतुष्ट किया जाता है या फिर यह नाराजगी पार्टी के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाएगी, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। फिलहाल, इस एक फैसले ने पूरी चुनावी जंग को बेहद दिलचस्प और अनिश्चित बना दिया है।