झारखंड की राजनीति में हलचल: वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने लौटाई सुरक्षा और सरकारी गाड़ी, क्या है इस्तीफे के पीछे की असल सच्चाई
झारखंड की सियासत में इन दिनों गहमागहमी का माहौल है। राज्य के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर के एक के बाद एक फैसलों ने राजनीतिक गलियारों में अटकलों का बाजार गर्म कर दिया है। पहले सुरक्षाकर्मियों को हटाना और अब सरकारी गाड़ी का उपयोग बंद कर निजी वाहन में सफर करना, राज्य के सियासी दिग्गजों के लिए चर्चा का विषय बन गया है। आम लोगों और विपक्षी दलों के बीच अब एक ही सवाल तैर रहा है—क्या वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर सरकार से नाराज हैं और क्या वे जल्द ही अपने पद से इस्तीफा देने वाले हैं?
विवाद की जड़: पुलिस मुख्यालय से तनातनी
सूत्रों के मुताबिक, इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब वित्त मंत्री ने अपनी सुरक्षा में तैनात 16 जवानों के लिए अतिरिक्त संसाधनों की मांग की थी। मंत्री का तर्क था कि वर्तमान सुरक्षा व्यवस्था और सीमित वाहनों में जवानों का चलना अव्यावहारिक है। हालांकि, पुलिस मुख्यालय की ओर से उनकी मांग को अनसुना कर दिया गया और उलटे एक मौजूदा सरकारी वाहन को वापस करने का नोटिस थमा दिया गया। इस घटनाक्रम से आहत होकर वित्त मंत्री ने अपनी पूरी सुरक्षा और सभी सरकारी वाहनों को वापस करने का कठोर फैसला लिया। उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि उन्हें अपनी सुरक्षा से ज्यादा ईश्वर पर भरोसा है।
क्या इस्तीफा देने वाले हैं राधाकृष्ण किशोर?
जैसे-जैसे दिन बीत रहे हैं, वित्त मंत्री की नाराजगी की खबरें तेज होती जा रही हैं। हाल ही में उन्हें अपनी सरकारी गाड़ी छोड़कर निजी वाहन का इस्तेमाल करते हुए देखा गया, जिससे यह चर्चा और प्रबल हो गई है कि सरकार के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है। हालांकि, मंत्री ने स्वयं मीडिया के सामने आकर ऐसी खबरों को सिरे से खारिज किया है और कहा है कि वे नाराज नहीं हैं। बावजूद इसके, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकारी महकमे के साथ उनका यह व्यवहार भविष्य में किसी बड़े प्रशासनिक या राजनीतिक बदलाव का संकेत हो सकता है।
पार्टी और प्रशासन में सन्नाटा
वित्त मंत्री जैसे वरिष्ठ पद पर बैठे नेता का इस तरह से सरकारी सुविधाओं का त्याग करना हेमंत सरकार के लिए भी चुनौती बना हुआ है। पार्टी आलाकमान की ओर से अभी तक इस मामले पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन इस घटना ने प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं। फिलहाल, सभी की निगाहें मंत्री के अगले कदम पर टिकी हैं कि क्या वे इसे एक वैचारिक विरोध के रूप में जारी रखेंगे या जल्द ही सब कुछ सामान्य हो जाएगा।