नेपोटिज्म...VVIP कनेक्शन और 186 पद! लखनऊ की इस कंपनी पर क्यों गरमाई झारखंड की सियासत

नेपोटिज्म...VVIP कनेक्शन और 186 पद! लखनऊ की इस कंपनी पर क्यों गरमाई झारखंड की सियासत

झारखंड की राजनीतिक गलियारों में इस समय भर्ती परीक्षाओं और उससे जुड़ी एजेंसियों को लेकर भूचाल आया हुआ है। हाल ही में झारखंड में सरकारी चयन परीक्षाओं को रद्द करने के प्रशासनिक फैसलों के बाद उपजे विवाद के केंद्र में उत्तर प्रदेश के लखनऊ की एक निजी कंपनी टीडीपीएल (TDPL) आ गई है। इस पूरे प्रकरण ने विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच बयानबाजी को तेज कर दिया है, जिसमें भाई-भतीजावाद (नेपोटिज्म), वीवीआईपी कनेक्शन और पूर्व की परीक्षाओं में हुई गड़बड़ियों के गंभीर आरोप लग रहे हैं। परीक्षा रद्द होने के बाद सड़कों पर उतरे युवाओं और अभ्यर्थियों के प्रदर्शन ने इस मुद्दे को राज्य का सबसे बड़ा राजनीतिक और सामाजिक प्रसंग बना दिया है।

लखनऊ की कंपनी टीडीपीएल पर क्यों केंद्रित हुई जांच की आंच

भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की जांच कर रही झारखंड पुलिस की सीआईडी टीम ने जब गहराई सेड़ताल की, तो इसकी सुई उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ तक जा पहुंची। जांच एजेंसियों के अनुसार, यह वही कंपनी है जिसका पुराना रिकॉर्ड प्रशासनिक परीक्षाओं और भर्तियों के संचालन में संदिग्ध रहा है। कुछ साल पहले उत्तर प्रदेश में विधानसभा और विधान परिषद सचिवालयों में प्रशासनिक पदों की 186 रिक्तियों के लिए परीक्षा आयोजित करने में भी इस फर्म की भूमिका सामने आई थी। झारखंड में जब प्रतियोगी परीक्षाओं की सूचियों और पारदर्शिता पर सवाल उठे, तो इस बाहरी एजेंसी की संलिप्तता ने राजनीतिक दलों को सरकार को घेरने का पूरा मौका दे दिया है।

वीवीआईपी कनेक्शन और भाई-भतीजावाद के गंभीर आरोप

राजनीतिक हलकों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि कैसे रसूखदार लोगों के करीबी और वीवीआईपी कनेक्शन वाले लोग ऐसी कंपनियों को टूल बनाकर टेंडर हासिल करते हैं। झारखंड की सियासत में आरोप लगाए जा रहे हैं कि किस प्रकार से पारदर्शिता को ताक पर रखकर चहेती एजेंसियों को युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने की खुली छूट दी जाती है। कंपनी के संस्थापकों और प्रमुख लोगों के पुराने मामलों का हवाला देते हुए विपक्षी दल सरकार पर हमलावर हैं। उनका कहना है कि जिन कंपनियों की साख पहले से ही सवालों के घेरे में रही हो, उन्हें संवेदनशील परीक्षाओं का जिम्मा सौंपना सीधे तौर पर युवाओं के साथ कुठाराघात है।

186 पदों के विवाद से लेकर झारखंड तक फैला नेटवर्क

यह पूरा विवाद तब और गहरा गया जब उत्तर प्रदेश के पिछले घोटालों और कार्यप्रणालियों के तार झारखंड की चयन प्रक्रियाओं से जुड़ते नजर आए। जानकारों का मानना है कि वर्ष 2021-22 के दौरान विधान परिषद और विधानसभा की 186 सीटों के लिए हुई परीक्षाओं में जिस तरह की अपारदर्शिता की शिकायतें उठी थीं, वैसी ही सुगबुगाहट झारखंड के परीक्षा तंत्र में भी देखने को मिली। जब झारखंड पुलिस की टीम ने लखनऊ स्थित इस कंपनी के कार्यालय पर छापा मारा और उसे सील किया, तब जाकर इस पूरे सिंडिकेट का दायरा आम जनता और मीडिया के सामने खुलकर आया। 

युवाओं का दर्द और सड़कों पर उबाल

इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे बड़ा नुकसान राज्य के उन लाखों मेधावी युवाओं का हो रहा है जो सालों-साल कड़ी मेहनत कर परीक्षा पास करते हैं और बाद में पेपर लीक या धांधली के कारण परीक्षा रद्द होने का दर्द झेलते हैं। झारखंड सचिवालय के बाहर और राजधानी रांची की सड़कों पर अभ्यर्थियों का फूटा गुस्सा इस बात की गवाही देता है कि युवा अब व्यवस्था की इस लचर प्रणाली से तंग आ चुके हैं। राजनीतिक दलों के लिए यह मुद्दा चुनावी और नैतिक रूप से बेहद संवेदनशील बन चुका है, क्योंकि आने वाले दिनों में यह युवाओं की नाराजगी का बड़ा कारण साबित हो सकता है।

 

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