'सैनिक कभी अकेला नहीं होता': कारगिल विजय दिवस पर वीर जवानों के रोंगटे खड़े कर देने वाले अनकहे संस्मरण
कारगिल विजय दिवस केवल भारत की सैन्य ताकत और ऐतिहासिक जीत का जश्न मनाने का दिन नहीं है, बल्कि यह उन अनगिनत वीर सपूतों के अदम्य साहस, बलिदान और अनकहे संस्मरणों को याद करने का पवित्र अवसर है जिन्होंने देश की खातिर अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। सरहद की रक्षा केवल युद्ध के मैदानों तक सीमित नहीं होती, बल्कि राष्ट्र की सुरक्षा का यह महान दायित्व साल के हर एक दिन और हर पल निभाया जाता है। कारगिल विजय दिवस के इस खास मौके पर सेना के उन जांबाज दिग्गजों और बलिदानियों की कहानियाँ रोंगटे खड़े कर देती हैं, जिन्होंने अपनी जवानी देश के नाम कर दी।
'सैनिक मातृभूमि की त्वचा की तरह है', कारगिल सेनानी प्रमोद त्रिपाठी की जुबानी
कारगिल संघर्ष के दौरान भारतीय सेना की इलेक्ट्रिकल एंड मैकेनिकल इंजीनियर्स (EME) शाखा में अपनी सेवाएं देने वाले प्रमोद त्रिपाठी याद करते हैं कि युद्ध के दौरान उनकी मुख्य जिम्मेदारी अग्रिम मोर्चे पर डटे सैनिकों तक तकनीकी सहायता और साजो-सामान पहुँचाना थी। उन्होंने सांबा सेक्टर, चक दयाला, डेरा बाबा नानक, नागौर और जोधपुर जैसे तमाम क्षेत्रों में कड़ाके की ठंड और विषम परिस्थितियों में काम किया। उनका मानना है कि सेना में कोई जाति या भाषा का भेद नहीं होता, यहाँ सिर्फ एक ही पहचान होती है और वह है 'भारत माता का सैनिक'।
पंजाब के डेरा बाबा नानक सेक्टर का एक संस्मरण साझा करते हुए वे भावुक हो जाते हैं। वे बताते हैं कि सरसों के खेतों के बीच जब उनकी दस सदस्यीय टीम ने तंबू लगाया था, तब एक बुजुर्ग माताजी उनके लिए घी लगी गरम-गरम रोटियां, दाल और सब्जी लेकर पहुँची थीं। उस भोजन में केवल स्वाद नहीं, बल्कि पूरे देश का असीम स्नेह और अटूट विश्वास समाया था। उस पल उन्हें एहसास हुआ कि जिस देश की माताएं और बहनें सैनिकों को अपने बेटे की तरह मानती हैं, उस देश का सैनिक कभी भी अकेला महसूस नहीं कर सकता। उन्होंने यह भी बताया कि एक बार रेल यात्रा के दौरान जब आम जनता को पता चला कि डिब्बे में खड़ा यात्री देश का सैनिक है, तो उन्होंने टीटीई पर दबाव डालकर उनके बैठने की विशेष व्यवस्था कराई। यह वाकया सिखाता है कि देशवासियों का यह प्यार ही सैनिकों की असली ताकत है, बशर्ते सैनिकों का सम्मान केवल युद्ध या संकट के समय ही नहीं, बल्कि सामान्य दिनों में भी इसी तरह बना रहे।
'26 साल बाद भी लगता है जैसे कल की बात हो', सूबेदार राज बहादुर सिंह के अनुभव
कारगिल युद्ध के वक्त जम्मू में 63 इंजीनियर रेजिमेंट एलआरडब्ल्यू में तैनात रहे सूबेदार राज बहादुर सिंह उस समय महज 21 वर्ष के युवा थे। जब उनकी यूनिट को सीधे पाकिस्तान की सीमा से सटे संवेदनशील आरएस पुरा सेक्टर में जाने का आदेश मिला, तो उनके भीतर देश के लिए कुछ कर गुजरने का भारी उत्साह था। एक इंजीनियर रेजिमेंट के रूप में उनका काम सीमावर्ती इलाकों में बारूदी सुरंगे (माइंस) लगाना, सड़कें तैयार करना, बंकरों की मरम्मत करना और पुल बनाना था ताकि अन्य सैनिकों की आवाजाही सुगम हो सके।
वे याद करते हैं कि आरएस पुरा के कोरली गांव में जब वे रात के समय पहुंचे और बंकरों में रुके, तब स्थानीय ग्रामीणों ने आधी रात को भी उनके खाने-पीने और हरसंभव मदद में कोई कमी नहीं छोड़ी। वहां के लोगों द्वारा पिलाई गई लस्सी और उनका सेना के प्रति अथाह प्रेम आज भी उनके जेहन में तरोताजा है। आपरेशन विजय के बाद जब आपरेशन पराक्रम शुरू हुआ, तब वे सालों तक बंकरों में रहे, लेकिन देश की आम जनता का यह बेइंतहा प्यार और सहयोग ही था जिसने उन्हें 30 सालों तक सेना में देश सेवा करने के लिए प्रेरित किया। आज घटना के 26 साल बीत जाने के बाद भी उन्हें ऐसा महसूस होता है जैसे यह कल की ही बात हो।
गुमला के वीर सपूत हवलदार बिरसा उरांव की अमर गाथा
कारगिल विजय दिवस पर झारखंड के गुमला जिले के सिसई प्रखंड स्थित बर्री जतराटोली गांव के बलिदानी हवलदार बिरसा उरांव की देशभक्ति की मिसाल हर युवा के दिल में जोश भर देती है। बुदू उरांव के घर जन्मे बिरसा उरांव बचपन से ही भारतीय सेना की प्रतिष्ठित वर्दी पहनने का सपना देखा करते थे। साल 1983 में पढ़ाई के दौरान फुटबॉल खेलते हुए उनका चयन बिहार रेजिमेंट में हो गया था। उन्होंने बिना परिवार को बताए दानापुर जाकर कड़ा प्रशिक्षण लिया और छह महीने बाद जब घर लौटे, तब परिजनों को उनके सैनिक बनने की खबर मिली।
अपनी उत्कृष्ट कर्तव्यनिष्ठा और साहस के बल पर वे साधारण सैनिक से प्रमोट होकर नायक और फिर हवलदार के पद पर पहुंचे। नगालैंड, पंजाब, असम और संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन (दक्षिण अफ्रीका) में शानदार सेवाएं देने के बाद, उन्होंने वर्ष 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान दुर्गम और बर्फीली चोटियों पर दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिए और मातृभूमि की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया। उनकी वीरता और अदम्य पराक्रमी सेवाओं के लिए उन्हें जनरल सर्विस मेडल, 9 ईयर लॉन्ग सर्विस मेडल, आर्मी सर्विस मेडल, यूएन ओवरसीज मेडल और मरणोपरांत विशिष्ट सेवा मेडल जैसे कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया। आज उनकी शहादत पर पूरा देश गर्व महसूस करता है और उनकी स्मृतियों को चिरस्थायी बनाए रखने के लिए उनके पैतृक गांव में उनके नाम से सड़क और तोरण द्वार बनाने की मांग की जा रही है ताकि आने वाली पीढ़ियां इस महान वीर सपूत की गाथा से प्रेरणा ले सकें।