बम और बंदूकों के साये में 50 नक्सलियों ने किया था हमला, मोस्ट वांटेड मिसिर बेसरा को छुड़ा ले जाने की 17 साल पुरानी खौफनाक दास्तान
भारतीय नक्सल इतिहास के पन्नों में कुछ ऐसी घटनाएं दर्ज हैं, जिनका नाम सुनते ही सुरक्षा एजेंसियों की रूह कांप जाती है। आज से ठीक 17 साल पहले झारखंड की एक अदालत में ऐसा ही दुस्साहसिक और फिल्मी अंदाज से भी ज्यादा खतरनाक कांड हुआ था, जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। बात उस समय की है जब खूंखार और मोस्ट वांटेड नक्सली कमांडर मिसिर बेसरा को पुलिस सुरक्षा के बीच कचहरी (न्यायालय) पेशी के लिए लाया गया था। किसी को इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि कोर्ट परिसर कुछ ही पलों में युद्ध का मैदान बन जाएगा। अचानक हथियारों से लैस करीब 50 नक्सलियों ने कचहरी पर धावा बोल दिया और बम-बंदूक की अंधाधुंध गोलियों के बीच अपने कमांडर को पुलिस की गिरफ्त से छुड़ाकर फरार हो गए।
फिल्मी अंदाज से भी खतरनाक था नक्सलियों का वह खूनी प्लान
यह घटना झारखड़ के उस दौर की है जब उग्रवादियों का आतंक अपने चरम पर था। पुलिस के कड़े पहरे और भारी सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद प्रतिबंधित नक्सली संगठन के हथियारबंद दस्ते ने कचहरी परिसर को चारों तरफ से घेर लिया। जैसे ही मिसिर बेसरा को पेशी के बाद ले जाया जाने लगा, नक्सलियों ने एक के बाद एक कई जोरदार बम धमाके किए। धमाकों की गूंज और गोलियों की तड़तड़ाहट से कोर्ट परिसर में अफरा-तफरी मच गई। जान बचाने के लिए लोग इधर-उधर भागने लगे, और इस खौफनाक माहोले का फायदा उठाकर नक्सली अपने कुख्यात लीडर मिसिर बेसरा को पुलिस के चंगुल से छुड़ाकर जंगलों की तरफ सुरक्षित निकालने में कामयाब हो गए थे।
सुरक्षा व्यवस्था पर उठे थे गंभीर सवाल, आज भी जेहन में ताजा है जख्म
इस सनसनीखेज घटना ने उस वक्त की प्रशासनिक व्यवस्था और पुलिसिया सुरक्षा पर देशव्यापी सवाल खड़े कर दिए थे। दिनदहाड़े कोर्ट परिसर में हुए इस हमले ने साबित कर दिया था कि नक्सली अपने किसी भी बड़े कमांडर को छुड़ाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। इस 17 साल पुरानी घटना के जख्म और उसकी दहशत आज भी पुलिस फाइलों और स्थानीय लोगों के जेहन में जिंदा हैं। हालांकि, इसके बाद देश भर की सुरक्षा एजेंसियों ने नक्सलियों के खिलाफ अपनी रणनीतियों में भारी बदलाव किया और कड़े कदम उठाए, लेकिन कचहरी पर हुए उस बड़े हमले की गूंज आज भी सुरक्षा विशेषज्ञों को हैरान कर देती है।