20 साल से ऊपर हैं तो हर 6 महीने कराएं किडनी की जांच: स्वास्थ्य समिति ने क्यों दी यह बड़ी सलाह?
भारत में क्रोनिक किडनी डिसीज (CKD) के बढ़ते मामलों को देखते हुए स्वास्थ्य विशेषज्ञों और मेडिकल सुधार समिति ने एक बेहद महत्वपूर्ण और चौंकाने वाली सिफारिश जारी की है। समिति ने सुझाव दिया है कि 20 वर्ष से अधिक उम्र के हर व्यक्ति को वर्ष में दो बार यानी हर 6 महीने में अपनी किडनी (गुर्दे) की बुनियादी जांच जरूर करानी चाहिए। अब तक किडनी की बीमारियों को 50 या 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की समस्या माना जाता था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में 20 से 40 वर्ष के युवाओं में किडनी डैमेज के मामलों में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
20 की उम्र के बाद क्यों जरूरी है नियमित किडनी जांच? समिति के फैसले की मुख्य वजहें
स्वास्थ्य समिति के अनुसार, आधुनिक जीवनशैली, खान-पान में आए बदलाव और तनाव के कारण युवाओं में हाई ब्लड प्रेशर (Hypertension) और टाइप-2 डायबिटीज की समस्या बहुत कम उम्र में शुरू हो रही है। डायबिटीज और उच्च रक्तचाप किडनी खराब होने के दो सबसे बड़े कारण हैं। जब शरीर में शर्करा का स्तर बढ़ा रहता है या खून का दबाव अधिक होता है, तो यह किडनी की सूक्ष्म रक्त वाहिकाओं (Glomeruli) को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचाता है।
इसके अतिरिक्त, युवाओं में बिना डॉक्टरी सलाह के पेनकिलर (दर्द निवारक दवाएं) खाने की आदत, अत्यधिक सप्लीमेंट्स का सेवन, पैकेज्ड फूड में सोडियम की अधिकता और पानी कम पीने की आदतें गुर्दों पर अतिरिक्त दबाव डाल रही हैं। समिति का मानना है कि यदि 20 साल की उम्र से ही नियमित जांच शुरू कर दी जाए, तो किडनी की बीमारी को शुरुआती चरण में ही पकड़कर पूर्ण डैमेज से बचाया जा सकता है।
'साइलेंट किलर' है किडनी की बीमारी: 80-90% फंक्शन बिगड़ने तक नहीं दिखते स्पष्ट लक्षण
गुर्दे की बीमारी को 'साइलेंट किलर' (घास में छुपा सांप) कहा जाता है। मानव शरीर में दो किडनी होती हैं, जो काफी हद तक डैमेज होने के बावजूद अपने काम को संभालती रहती हैं। जब तक दोनों किडनियां 70 से 80 प्रतिशत तक खराब नहीं हो जातीं, तब तक इंसान को कोई गंभीर शारीरिक लक्षण या दर्द महसूस नहीं होता।
जब मरीज को उल्टी, पैरों में सूजन, सांस फूलना या कम भूख लगने जैसे स्पष्ट लक्षण दिखने शुरू होते हैं, तब तक बीमारी अंतिम चरणों (Stage 4 या Stage 5) में पहुंच चुकी होती है, जहां मरीज के पास केवल डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट (गुर्दा प्रत्यारोपण) ही विकल्प बचता है। हर 6 महीने में जांच कराने से इस घातक स्थिति से आसानी से बचा जा सकता है।
युवाओं में तेजी से क्यों बढ़ रहा है किडनी डैमेज का खतरा?
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पेनकिलर्स (NSAIDs) और एंटासिड का अत्यधिक सेवन: सिरदर्द, बदन दर्द या हल्का बुखार होने पर बिना सोचे-समझे काउंटर से पेनकिलर्स खरीदकर खाना किडनी के लिए जहर के समान साबित हो रहा है।
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गलत खान-पान और पैकेज्ड फूड: प्रोसेस्ड फूड, जंक फूड और कोल्ड ड्रिंक्स में मौजूद अतिरिक्त नमक, प्रिजर्वेटिव्स और प्यूरीन गुर्दों पर टॉक्सिक असर डालते हैं।
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जिम सप्लीमेंट्स और हाई प्रोटीन डाइट: विशेषज्ञों का मार्गदर्शन लिए बिना बाजार में मिलने वाले घटिया प्रोटीन पाउडर और स्टेरॉयड का सेवन युवाओं के गुर्दों को समय से पहले फेल कर रहा है।
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डिहाइड्रेशन और पानी की कमी: दिन भर में पर्याप्त पानी न पीने से किडनी शरीर के विषाक्त पदार्थों (Toxins) को बाहर नहीं निकाल पाती, जिससे पथरी और संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।
हर 6 महीने में कौन-कौन से टेस्ट कराने का दिया गया है सुझाव?
समिति ने यह स्पष्ट किया है कि हर 6 महीने में बहुत महंगे या जटिल टेस्ट कराने की आवश्यकता नहीं है। केवल दो से तीन बहुत सस्ते और आसान टेस्ट के माध्यम से किडनी की सेहत का पूरा रिपोर्ट कार्ड सामने आ जाता है:
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सीरम क्रिएटिनिन (Serum Creatinine Test): यह एक साधारण ब्लड टेस्ट है। क्रिएटिनिन शरीर का एक वेस्ट प्रोडक्ट है। यदि रक्त में इसका स्तर बढ़ता है, तो इसका सीधा मतलब है कि किडनी इसे सही ढंग से फ़िल्टर नहीं कर पा रही है।
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इस्टीमेटेड जीएफआर (eGFR): सीरम क्रिएटिनिन के आधार पर eGFR की गणना की जाती है, जिससे यह पता चलता है कि आपकी किडनी कितने प्रतिशत क्षमता से काम कर रही है।
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यूरीन एल्ब्यूमिन / प्रोटीन टेस्ट (Urine Albumin Test): स्वस्थ किडनी पेशाब के रास्ते प्रोटीन (एल्ब्यूमिन) को बाहर नहीं जाने देती। यदि पेशाब की जांच में प्रोटीन लीक होता मिलता है, तो यह किडनी डैमेज का सबसे पहला शुरुआती संकेत होता है।
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ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर की जांच: नियमित रूप से बीपी और शुगर की निगरानी करना बेहद जरूरी है।
शुरुआती संकेत जिन्हें भूलकर भी न करें नजरअंदाज
यद्यपि शुरुआती दौर में लक्षण कम दिखते हैं, फिर भी शरीर कुछ छोटे-छोटे संकेत अवश्य देता है:
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सुबह उठने पर आंखों के नीचे या चेहरे पर सूजन आना।
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पैरों, टखनों या हाथों में शाम के समय सूजन (Edema) दिखाई देना।
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पेशाब में बहुत अधिक झाग बनना या पेशाब का रंग गहरा होना।
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रात में बार-बार पेशाब करने जाना।
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बिना किसी कारण के लगातार थकान, कमजोरी और भूख में कमी महसूस होना।
स्वस्थ किडनी के लिए जीवनशैली में करें ये जरूरी बदलाव
समिति ने जांच के साथ-साथ बचाव के लिए कुछ बुनियादी आदतों को अपनाने की सलाह दी है:
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दिन में कम से कम 2.5 से 3 लीटर पानी अवश्य पीएं।
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भोजन में ऊपर से नमक डालने से बचें और सोडियम की मात्रा सीमित रखें।
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बिना डॉक्टर की पर्ची के किसी भी प्रकार की दर्द निवारक दवा का सेवन न करें।
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प्रतिदिन कम से कम 30 मिनट का व्यायाम या पैदल चलना दिनचर्या में शामिल करें।
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यदि परिवार में किसी को डायबिटीज या किडनी रोग का इतिहास रहा है, तो जांच के प्रति और अधिक सतर्क रहें।
स्वास्थ्य समिति का मानना है कि हर 6 महीने में एक बार कराया गया मामूली सा टेस्ट किसी भी युवा को भविष्य की बड़ी और खर्चीली मेडिकल इमरजेंसी से सुरक्षित रख सकता है।