'ओम शांति ओम' और 'मधुमती' का चौंकाने वाला कनेक्शन: 67 साल पुरानी फिल्म से फराह खान ने चुराई थी 'पीक डिटेलिंग'

'ओम शांति ओम' और 'मधुमती' का चौंकाने वाला कनेक्शन: 67 साल पुरानी फिल्म से फराह खान ने चुराई थी 'पीक डिटेलिंग'

हिंदी सिनेमा में 'पुनर्जन्म' (Reincarnation) के विषय पर कई फिल्में बनी हैं, लेकिन जब बात कल्ट क्लासिक्स की आती है, तो दो फिल्मों के नाम सबसे पहले जुड़ते हैं—1958 की 'मधुमती' और 2007 की ब्लॉकबस्टर 'ओम शांति ओम'। क्या आप जानते हैं कि शाहरुख खान और दीपिका पादुकोण की इस फिल्म में दिखाई गई हर छोटी डिटेल, जिसे आजकल की भाषा में 'पीक डिटेलिंग' कहा जाता है, वास्तव में बिमल रॉय की 'मधुमती' से प्रेरित है? आज हम आपको बताएंगे कि कैसे इन दोनों फिल्मों के सीन्स और कहानी के बीच का अंतर सिर्फ कुछ दशकों का है।

मधुमती: वो कल्ट फिल्म जिसने सेट किए बेंचमार्क

साल 1958 में आई बिमल रॉय की 'मधुमती' ने उस दौर में सिनेमा को एक नई परिभाषा दी थी। दिलीप कुमार और वैजयंती माला की इस फिल्म में ग्रामीण भारत की पृष्ठभूमि पर एक प्रेम कहानी बुनी गई थी, जो अंत में एक डरावने और चौंकाने वाले क्लाइमैक्स में बदल जाती है। फिल्म के गाने, जैसे 'आजा परदेसी' और 'सुहाना सफर', आज भी लोगों की जुबान पर हैं। रित्विक घटक द्वारा रचित यह फिल्म पुनर्जन्म पर आधारित थी और इसमें प्राण के खलनायक अवतार ने दर्शकों के दिलों में खौफ भर दिया था।

ओम शांति ओम में 'मधुमती' का जादुई साया

फराह खान द्वारा निर्देशित शाहरुख खान की 'ओम शांति ओम' में दीपिका पादुकोण का डेब्यू था। लेकिन क्या आपको याद है फिल्म का वो प्रसिद्ध झूमर वाला सीन, विलेन का डर, या सीढ़ियों वाला क्लाइमैक्स? फिल्म के जानकारों का मानना है कि 'ओम शांति ओम' का हर दूसरा फ्रेम 'मधुमती' की याद दिलाता है। चाहे वह पुनर्जन्म की कहानी हो, बिछड़े हुए प्रेमी-प्रेमिका का ट्रैक हो, या विलेन को सजा दिलाने का सिलसिला—फराह खान ने 'मधुमती' की बारीकियों को आधुनिक सिनेमा के हिसाब से शानदार तरीके से पेश किया।

हुबहू सीन और खौफनाक क्लाइमैक्स

दोनों फिल्मों में समानताएं हैरान कर देने वाली हैं। फिल्म की शुरुआत एक हादसे से होती है, प्रेमी-प्रेमिका बिछड़ते हैं, हीरो की मौत होती है, पुनर्जन्म होता है, और फिर पुराने विलेन का सामना होता है। फराह खान ने 'ओम शांति ओम' में जो 'पीक डिटेलिंग' की, उसमें 'मधुमती' के कई दृश्यों को ट्रिब्यूट (श्रद्धांजलि) की तरह इस्तेमाल किया। फिल्म के कुछ सीन्स इतने सटीक हैं कि दर्शक आज भी इनमें समानताएं ढूंढते हुए नहीं थकते। यह महज इत्तेफाक नहीं, बल्कि फराह खान का अपनी पसंदीदा कल्ट क्लासिक के प्रति लगाव था, जिसने 'ओम शांति ओम' को एक एपिक रिवेंज ड्रामा बना दिया।

 

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