स्कूल के क्लासरूम से लेकर टॉयलेट तक खुद साफ करते हैं जापानी बच्चे! होश उड़ा देंगी जापान के बच्चों की ये 7 अद्भुत आदतें

स्कूल के क्लासरूम से लेकर टॉयलेट तक खुद साफ करते हैं जापानी बच्चे! होश उड़ा देंगी जापान के बच्चों की ये 7 अद्भुत आदतें

बदलते दौर में जहां पूरी दुनिया के पैरेंट्स अपने बच्चों को हर सुख-सुविधा देने की होड़ में लगे हैं, वहीं एशिया का एक देश ऐसा भी है जो अपने बच्चों को शुरू से ही आत्मनिर्भर और अनुशासित बनाने पर सबसे ज्यादा ध्यान देता है। हम बात कर रहे हैं टेक्नोलॉजी के बादशाह 'जापान' की। जापानी स्कूलों में पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों को जो जीवन मूल्य और संस्कार सिखाए जाते हैं, वे वाकई हैरान करने वाले हैं। वहां के स्कूलों में क्लासरूम की सफाई करने के लिए कोई अलग से कर्मचारी नहीं होता, बल्कि बच्चे खुद अपने हाथों से झाड़ू-पोछा लगाते हैं। आइए जानते हैं जापानी बच्चों की उन 7 बेमिसाल आदतों के बारे में, जो उन्हें पूरी दुनिया से अलग और बेहद जिम्मेदार नागरिक बनाती हैं।

खुद करते हैं क्लासरूम और स्कूल परिसर की सफाई

जापानी स्कूलों में 'ओसॉजी' (Osoji) नाम की एक बेहद खास परंपरा है, जिसके तहत स्कूल की छुट्टी होने से पहले हर दिन बच्चे मिलकर अपने क्लासरूम, गलियारों और यहां तक कि स्कूल के टॉयलेट की भी सफाई खुद करते हैं। इस काम में छोटे बच्चों से लेकर बड़े छात्र तक सभी बराबर योगदान देते हैं। जापानी शिक्षा व्यवस्था का मानना है कि इस आदत से बच्चों के भीतर अहंकार पूरी तरह खत्म हो जाता है और वे सार्वजनिक संपत्ति का सम्मान करना सीखते हैं। यह आदत उन्हें यह भी सिखाती है कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता है।

लंच टाइम में खुद परोसते हैं खाना और सीखते हैं टीम वर्क

जापान के स्कूलों में मिड-डे मील या लंच के समय कोई कैंटीन स्टाफ खाना नहीं परोसता। क्लास के बच्चे ही बारी-बारी से एप्रन, कैप और मास्क पहनकर अपने सहपाठियों को खाना परोसते हैं। खाना खाने के बाद सभी बच्चे अपनी प्लेट्स को खुद साफ करते हैं और कचरे को रीसाइक्लिंग के नियमों के अनुसार अलग-अलग डिब्बों में डालते हैं। इस पूरी प्रक्रिया से बच्चों में गजब का टीम वर्क, लीडरशिप क्वालिटी और जिम्मेदारी का अहसास पैदा होता है, जो आगे चलकर उनके करियर में बेहद मददगार साबित होता है।

तीसरी कक्षा तक नहीं होती कोई बड़ी परीक्षा, केवल संस्कारों पर जोर

जापान की शिक्षा प्रणाली की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वहां बच्चों के शुरुआती तीन सालों तक यानी तीसरी कक्षा (लगभग 10 साल की उम्र) तक कोई कठिन लिखित परीक्षा नहीं ली जाती। इन शुरुआती सालों में बच्चों के रिपोर्ट कार्ड या नंबरों पर ध्यान देने के बजाय उनके चरित्र निर्माण, अच्छे व्यवहार, पशु-पक्षियों के प्रति प्रेम, उदारता और बड़ों का सम्मान करने जैसे नैतिक मूल्यों को विकसित करने पर पूरा जोर दिया जाता है। यही वजह है कि जापानी समाज पूरी दुनिया में अपनी शालीनता के लिए जाना जाता है।

खुद अकेले स्कूल जाते हैं छोटे बच्चे, आत्मनिर्भरता की बेहतरीन मिसाल

जापान के स्थानीय शहरों और कस्बों में आपको बहुत छोटे-छोटे बच्चे भी अकेले या अपने दोस्तों के ग्रुप के साथ पैदल स्कूल जाते हुए दिख जाएंगे। वहां पैरेंट्स बच्चों को स्कूल छोड़ने या लेने नहीं जाते और न ही कोई लग्जरी गाड़ियां इस्तेमाल होती हैं। पूरा जापानी समाज बच्चों की सुरक्षा को लेकर बेहद सतर्क रहता है, जिससे बच्चे बहुत कम उम्र से ही आत्मनिर्भर, साहसी और स्वतंत्र बनना सीख जाते हैं। वे रास्ते के ट्रैफिक नियमों का भी पूरी कड़ाई से पालन करते हैं।

समय के पाबंद और पब्लिक ट्रांसपोर्ट का सम्मान

जापान में समय की पाबंदी को भगवान की तरह पूजा जाता है और यह आदत बच्चों को बचपन से ही लग जाती है। स्कूल की बस हो, लोकल ट्रेन हो या क्लासरूम की घंटी— जापानी बच्चे कभी लेट नहीं होते। इसके साथ ही, पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करते समय वे बेहद शांत रहते हैं। मेट्रो या बस में सफर के दौरान जापानी बच्चे कभी शोर-शराबा नहीं करते और न ही दूसरों को परेशान करते हैं, बल्कि वे चुपचाप किताबें पढ़ना या अनुशासन में बैठना पसंद करते हैं।

कचरा प्रबंधन और पर्यावरण के प्रति गजब की जागरूकता

जापानी बच्चों को स्कूल के पहले दिन से ही पर्यावरण को बचाने और कचरे को सही तरीके से डिस्पोज करने की ट्रेनिंग दी जाती है। वे कभी भी सड़कों या पार्कों में रैपर्स या खाली बोतलें नहीं फेंकते। अगर आसपास कोई डस्टबिन न हो, तो वे उस कचरे को अपने बैग में रख लेते हैं और घर जाकर ही उसे डस्टबिन में डालते हैं। प्रकृति के प्रति उनका यह जुड़ाव और जागरूकता ही जापान को दुनिया के सबसे साफ-सुथरे देशों की लिस्ट में शुमार करती है।

कृतज्ञता की भावना और 'अरिगातो' कहना कभी नहीं भूलते

जापानी बच्चों की डिक्शनरी में धन्यवाद (अरिगातो गोजाईमासु) और माफी (सुमिमासेन) जैसे शब्द सबसे ऊपर होते हैं। वे अपने शिक्षकों, स्कूल के बस ड्राइवरों, खाना बनाने वालों और प्रकृति के प्रति हर पल कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। भोजन शुरू करने से पहले वे 'इतादाकिमासु' कहते हैं, जिसका अर्थ है कि वे इस भोजन को देने वाले सभी लोगों का आभार मानते हैं। यह विनम्रता और कृतज्ञता की आदत उन्हें एक बेहतरीन और संवेदनशील इंसान बनाती है, जिससे वे वैश्विक स्तर पर अपनी अलग पहचान बनाते हैं।

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