छत्तीसगढ़ में स्मार्ट एजुकेशन का सच: बिना बिजली और पंखे के अंधेरे में भविष्य पढ़ने को मजबूर 867 मासूम

छत्तीसगढ़ में स्मार्ट एजुकेशन का सच: बिना बिजली और पंखे के अंधेरे में भविष्य पढ़ने को मजबूर 867 मासूम

देश और राज्यों में डिजिटल शिक्षा और स्मार्ट क्लासरूम के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत इन दावों की पोल खोलने के लिए काफी है। छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh News) के एक सरकारी स्कूल से सामने आई ताजा तस्वीर ने प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहाँ शिक्षा के मंदिर कहे जाने वाले परिसरों में बुनियादी सुविधाओं का ऐसा अभाव है कि लगभग 867 मासूम छात्र बिना बिजली और पंखे के चिलचिलाती गर्मी और घुटन भरे माहौल में पढ़ने को मजबूर हैं। गनीमत यह रही कि जब इस गंभीर लापरवाही की खबर प्रमुखता से मीडिया में आई, तब जाकर सोई हुई अफसरशाही की नींद टूटी और जिम्मेदारों ने सुध लेना शुरू किया है।

बुनियादी सुविधाओं से कोसों दूर स्कूल, छात्रों का हाल बेहाल

प्राप्त जानकारी के अनुसार, स्कूल में पढ़ने वाले इन सैकड़ों बच्चों को पिछले काफी समय से बुनियादी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। कक्षाओं में बिजली कनेक्शन न होने या तकनीकी खराबी के चलते पंखे तक नहीं चलते हैं, जिससे उमस भरे मौसम में बच्चों का क्लास में बैठना भी मुहाल हो जाता है। पढ़ाई के दौरान बच्चे पसीने से तरबतर नजर आते हैं, जिससे उनकी पढ़ाई और स्वास्थ्य दोनों पर बुरा असर पड़ रहा है। अभिभावकों का कहना है कि कई बार स्थानीय अधिकारियों और शिक्षा विभाग के सामने गुहार लगाई गई, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिला।

मीडिया रिपोर्ट्स का असर: एक्शन में आए जिम्मेदार अधिकारी

जैसे ही इस बदहाली और बच्चों की परेशानी की खबरें मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्म्स के जरिए प्रशासनिक अधिकारियों तक पहुँची, महकमे में हड़कंप मच गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग के बड़े अधिकारियों ने तुरंत संज्ञान लिया और संबंधित स्कूल की स्थिति की जांच के आदेश दे दिए। लापरवाह अधिकारियों और कर्मचारियों की कार्यशैली पर सवाल उठने लगे हैं, और अब युद्धस्तर पर स्कूल में बिजली आपूर्ति व पंखों की व्यवस्था दुरुस्त करने की बात कही जा रही है।

डिजिटल दावों और ज़मीनी हकीकत के बीच की खाई

यह मामला केवल एक स्कूल का नहीं, बल्कि कई ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में प्रशासनिक उदासीनता का जीता-जागता उदाहरण है। एक तरफ सरकारें स्मार्ट एजुकेशन, टैबलेट और डिजिटल बोर्ड के जरिए शिक्षा का स्तर सुधारने के दावे कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ बुनियादी सुविधाओं जैसे बिजली, पानी और पंखे के लिए बच्चों का संघर्ष यह सोचने पर मजबूर करता है कि सिस्टम की प्राथमिकताएं असल में कहां हैं। मीडिया के दखल के बाद अब उम्मीद जताई जा रही है कि इन 867 मासूमों को जल्द ही राहत मिलेगी और उनकी कक्षाएं बेहतर माहौल में संचालित हो सकेंगी।

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