नक्सलियों के गढ़ में पहली बार शान से लहराया तिरंगा; लाल आतंक की छाया से छत्तीसगढ़ के इस खूंखार इलाके को आखिरकार मिल गई आजादी
भारतीय इतिहास के पन्नों में आज का दिन और छत्तीसगढ़ के भूगोल में कुछ विशेष इलाके हमेशा-हमेशा के लिए अमर हो गए हैं। देश जब स्वतंत्रता दिवस की 80वीं वर्षगांठ का जश्न मना रहा है, ठीक उसी समय देश के सबसे संवेदनशील, दुर्गम और खूंखार समझे जाने वाले नक्सल प्रभावित इलाकों से एक ऐसी अद्भुत और ऐतिहासिक तस्वीर सामने आई है जिसे देखकर हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो जाएगा। दशकों तक जहां गोलियों की गूंज, बारूदी सुरंगों का खौफ और लाल आतंक का साया मंडराता था, आज उसी माड़ के जंगलों और सुदूर अंचलों में पहली बार मुख्य धारा का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा पूरी शान के साथ आसमान में लहरा रहा है। कभी इस जगह को नक्सलियों का अजेय गढ़ माना जाता था जहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता था, लेकिन हमारे वीर सुरक्षाबलों के अदम्य साहस और पक्के इरादों ने इस इलाके को लाल आतंक से पूरी तरह आजाद करा लिया है। आइए विस्तार से जानते हैं कि किस प्रकार असंभव लगने वाले इस मिशन को अंजाम दिया गया और कैसे इस दुर्गम इलाके में आजादी की पहली सुबह का सूरज उगा है।
दशकों तक लाल आतंक का गढ़ रहा वह इलाका जहां पुलिस का जाना था नामुमकिन
छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के अंतर्गत आने वाले कई ऐसे सुदूर और अंदरूनी इलाके थे जिन्हें देश के सुरक्षा तंत्र और प्रशासन के लिए एक 'नो-गो जोन' (No-Go Zone) माना जाता था। इन इलाकों में पिछले कई दशकों से नक्सलियों का एकछत्र राज चलता था। नक्सलियों ने अपनी समानांतर सरकार जैसी व्यवस्था बना रखी थी, जहां वे स्थानीय आदिवासियों को डर के साये में रखते थे और देश के संविधान तथा कानून को पूरी तरह से नकार देते थे। इन जंगलों में कदम रखते ही सुरक्षा बलों पर घात लगाकर हमले किए जाते थे, जिसके कारण सरकार के लिए वहां तक विकास पहुंचाना या स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व मनाना एक असंभव चुनौती बना हुआ था। तिरंगा फहराने का मतलब सीधे तौर पर मौत को दावत देना समझा जाता था, लेकिन देश के वीर जवानों ने अपनी जान की बाजी लगाकर इस खौफ के साम्राज्य को हमेशा के लिए नेस्तनाबूद करने का संकल्प लिया।
सुरक्षाबलों का अदम्य शौर्य और माड़ बचाओ अभियान की ऐतिहासिक सफलता
इस नामुमकिन को मुमकिन बनाने के पीछे छत्तीसगढ़ पुलिस, जिला रिजर्व गार्ड (DRG), सीआरपीएफ (CRPF) और कोबरा बटालियन के जवानों की कई महीनों की कड़ी मेहनत, रणनीति और अदम्य साहस की कहानी जुड़ी हुई है। सरकार और सुरक्षा एजेंसियों ने आपसी तालमेल के जरिए एक सुनियोजित रणनीति के तहत नक्सलियों के इस कोर एरिया में लगातार नए फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस (FOB) यानी सुरक्षा कैंप स्थापित करने शुरू किए। जैसे-जैसे सुरक्षाबल नक्सलियों के गढ़ के भीतर घुसते गए, वैसे-वैसे लाल आतंक का दायरा सिमटता चला गया। खूंखार नक्सलियों के साथ हुई कई मुठभेड़ों में सुरक्षाबलों ने उनके बड़े कमांडरों को ढेर कर दिया या उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। इन सुरक्षा कैंपों के खुलने से न सिर्फ नक्सलियों की सप्लाई लाइन कटी, बल्कि स्थानीय आदिवासियों का शासन और प्रशासन पर भरोसा भी तेजी से बहाल हुआ।
पहली बार जब आदिवासियों और जवानों ने मिलकर फहराया तिरंगा
आज स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर उस ऐतिहासिक और दुर्गम इलाके में जो दृश्य देखने को मिला, उसने इतिहास की धारा ही बदल दी। जिस जमीन पर कभी देश विरोधी नारे लिखे जाते थे और तिरंगे को अपमानित किया जाता था, आज उसी धरती पर सुरक्षाबलों के जवानों ने स्थानीय आदिवासी भाई-बहनों, बुजुर्गों और स्कूली बच्चों के साथ मिलकर गर्व से राष्ट्रीय ध्वज फहराया। ध्वजारोहण के बाद जब राष्ट्रगान की गूंज उन घने जंगलों और पहाड़ों के बीच गूंजी, तो वहां मौजूद कई आदिवासियों की आंखें खुशी और गर्व के आंसुओं से नम हो गईं। यह पल केवल एक झंडा फहराने भर का नहीं था, बल्कि यह इस बात का प्रमाण था कि लोकतंत्र की ताकत और देश के जवानों का शौर्य हर तरह के आतंकवाद और हिंसा पर भारी पड़ता है। बच्चों के हाथों में तिरंगा देखकर ऐसा लग रहा था मानो उन्हें एक नई जिंदगी और एक सुरक्षित भविष्य मिल गया हो।
लाल आतंक के खात्मे के बाद अब विकास और शांति की नई बयार
नक्सलियों के इस अजेय गढ़ के ढह जाने और वहां तिरंगा फहराए जाने के साथ ही अब इस पूरे इलाके में विकास के नए द्वार खुल चुके हैं। छत्तीसगढ़ सरकार और स्थानीय प्रशासन ने युद्ध स्तर पर इन क्षेत्रों में पक्की सड़कों, पुल-पुलियों, बिजली, मोबाइल टावर, बैंक शाखाओं और आधुनिक स्वास्थ्य केंद्रों का निर्माण शुरू कर दिया है। जिन आदिवासी युवाओं को कभी जबरन या बहला-फुसलाकर नक्सली संगठनों में शामिल कराया जाता था, वे अब शिक्षा और रोजगार के माध्यम से मुख्यधारा से जुड़ रहे हैं। सरकार की आत्मसमर्पण नीति का असर यह हुआ है कि कई भटके हुए युवा हथियार छोड़कर सामान्य जीवन जीने के लिए आगे आ रहे हैं। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर सामने आई यह खबर इस बात का प्रतीक है कि भारत की संप्रभुता और एकता को चुनौती देने वाली हर एक ताकत को आखिरकार घुटने टेकने ही पड़ते हैं।