राष्ट्रपति भवन में गूंजी छत्तीसगढ़ की मांदर की थाप, सरईटोला के कलाकारों ने अपनी लोक संस्कृति के जादू से मोहा सबका मन
छत्तीसगढ़ की माटी की खुशबू और यहाँ की समृद्ध आदिवासी संस्कृति ने एक बार फिर देश की राजधानी दिल्ली में इतिहास रच दिया है। छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के छोटे से गाँव सरईटोला से ताल्लुक रखने वाले पारंपरिक लोक कलाकारों के एक दल ने देश के सर्वोच्च संवैधानिक केंद्र यानी राष्ट्रपति भवन के प्रांगण में अपनी कला का ऐसा अद्भुत और जादुई प्रदर्शन किया कि वहाँ मौजूद हर शख्स मंत्रमुग्ध हो गया। जैसे ही पारंपरिक मांदर की थाप और ढोल-मंजीरों की गूंज राष्ट्रपति भवन के गलियारों में गूंजी, पूरा माहौल छत्तीसगढ़ी लोक रंग में रंग गया। दूरदराज के आदिवासी अंचल से निकलकर सीधे देश के राष्ट्रपति भवन तक पहुँचने वाले इन कलाकारों ने अपने लोकनृत्यों के जरिए छत्तीसगढ़ की प्राचीन संस्कृति, रीति-रिवाजों और कला प्रेम का परचम पूरे देश में लहरा दिया है। इस गौरवशाली क्षण से न केवल धमतरी जिले बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ राज्य का मस्तक गर्व से ऊंचा हो गया है। आइए इस विस्तृत और प्रेरणादायक लेख में जानते हैं कि सरईटोला के इन कलाकारों ने राष्ट्रपति भवन तक का यह सफर कैसे तय किया और वहाँ उनके इस सांस्कृतिक प्रदर्शन की क्या-क्या खास बातें रहीं।
धमतरी के सरईटोला गाँव से राष्ट्रपति भवन तक का ऐतिहासिक सफर
छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले का सरईटोला एक ऐसा ग्रामीण इलाका है, जहाँ की जीवनशैली आज भी अपनी जड़ों और परंपराओं से गहराई से जुड़ी हुई है। यहाँ के स्थानीय कलाकारों ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि जिस पारंपरिक नृत्य और मांदर की थाप को वे अपने गाँव के मेलों, त्योहारों और शादियों में बजाते हैं, उसे एक दिन देश के महामहिम राष्ट्रपति के सामने प्रस्तुत करने का सौभाग्य प्राप्त होगा। जब इन लोक कलाकारों को राष्ट्रपति भवन में अपनी कला का प्रदर्शन करने का आधिकारिक निमंत्रण मिला, तो पूरे गाँव में जश्न का माहौल बन गया। गाँव के लोगों ने अपने इन कलाकारों को ऐतिहासिक विदाई दी और यह साबित कर दिया कि यदि प्रतिभा सच्ची हो और कला के प्रति समर्पण हो, तो छोटे से गाँव का कोई भी इंसान आसमान की बुलंदियों को छू सकता है। दिल्ली पहुँचने के बाद इन कलाकारों ने अपनी तैयारियों में कोई कसर नहीं छोड़ी और अपनी सांस्कृतिक प्रस्तुति से राष्ट्रीय मंच पर एक अलग ही अमिट छाप छोड़ी।
मांदर की थाप और कर्मा नृत्य ने मोहा सबका मन
राष्ट्रपति भवन में आयोजित इस भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान जब धमतरी के कलाकारों ने पारंपरिक छत्तीसगढ़ी वेशभूषा में प्रवेश किया, तो उनकी सादगी ने सबका ध्यान खींच लिया। जैसे ही कार्यक्रम की शुरुआत हुई और मांदर, ढोल और नगाड़ों की थाप गूंजनी शुरू हुई, वहाँ बैठे देश के तमाम गणमान्य अतिथि और अधिकारी झूमने को मजबूर हो गए। कलाकारों ने छत्तीसगढ़ के पारंपरिक 'कर्मा नृत्य' और 'सुआ नृत्य' की ऐसी मनमोहक प्रस्तुतियां दीं, जिसमें प्रकृति के प्रति प्रेम, आदिवासी जीवन की सरलता और खेतों-खलिहानों की महक साफ झलक रही थी। पारंपरिक परिधानों में सजे-धजे युवक-युवतियों ने जब लयबद्ध ताल के साथ नृत्य करना शुरू किया, तो राष्ट्रपति भवन का पूरा दरबार हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। इस प्रस्तुति ने यह दिखा दिया कि छत्तीसगढ़ की संस्कृति कितनी समृद्ध, रंगीन और जीवंत है।
राष्ट्रपति और विशिष्ट अतिथियों ने की कलाकारों की भूरी-भूरी प्रशंसा
इस शानदार सांस्कृतिक कार्यक्रम के समापन पर देश के सर्वोच्च पद पर आसीन महामहिम राष्ट्रपति ने धमतरी से आए इन सभी लोक कलाकारों से व्यक्तिगत रूप से मुलाकात की और उनकी हौसलाअफजाई की। राष्ट्रपति ने कलाकारों की पीठ थपथपाते हुए कहा कि भारत की असली ताकत उसकी विविध संस्कृति और ग्रामीण अंचलों में बसने वाली कलाओं में ही निहित है। इसके अलावा वहाँ मौजूद अन्य केंद्रीय मंत्रियों, बड़े प्रशासनिक अधिकारियों और देश-विदेश के मेहमानों ने भी छत्तीसगढ़ की इस लोक कला की जमकर सराहना की। कलाकारों ने राष्ट्रपति को छत्तीसगढ़ की पारंपरिक कलाकृतियाँ और स्मृति चिन्ह भेंट किए, जिसे देखकर राष्ट्रपति ने भी प्रसन्नता व्यक्त की। कलाकारों के लिए यह पल किसी सपने के सच होने जैसा था, क्योंकि उनकी कला को राष्ट्रीय स्तर पर जो सम्मान मिला है, वह उनके पूरे जीवन की सबसे बड़ी पूंजी बन गया है।
छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को मिला वैश्विक और राष्ट्रीय मंच
छत्तीसगढ़ बनने के बाद से ही राज्य की लोक संस्कृति और आदिवासी परंपराओं को देश और दुनिया के सामने लाने के लिए लगातार प्रयास किए जाते रहे हैं। धमतरी के सरईटोला के कलाकारों का राष्ट्रपति भवन में प्रदर्शन इस बात का प्रमाण है कि अब छत्तीसगढ़ की कला केवल स्थानीय मेलों तक सीमित नहीं रही है, बल्कि वह देश के सबसे बड़े मंचों पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रही है। इस प्रकार के आयोजनों से न केवल स्थानीय कलाकारों का मनोबल बढ़ता है, बल्कि नई पीढ़ी के युवाओं को भी अपनी पारंपरिक कला और संस्कृति को सहेजने और आगे बढ़ाने की प्रेरणा मिलती है। जब देश की राजधानी में छत्तीसगढ़ की मांदर की थाप गूंजती है, तो हर छत्तीसगढ़वासी का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है और यह इस बात का प्रतीक है कि हमारी संस्कृति की जड़ें कितनी गहरी और मजबूत हैं।
गाँव लौटने पर कलाकारों का होगा भव्य और ऐतिहासिक स्वागत
दिल्ली में अपनी कला का परचम लहराकर वापस अपने गृह जिले धमतरी और सरईटोला लौटने वाले इन लोक कलाकारों के स्वागत के लिए पूरा जिला प्रशासन और ग्रामीण तैयारी में जुट गए हैं। गाँव के लोगों का कहना है कि वे अपने इन कलाकारों का स्वागत किसी विजय उत्सव की तरह करेंगे, क्योंकि उन्होंने पूरे देश में उनके गाँव का नाम रोशन कर दिया है। जिला प्रशासन के अधिकारियों ने भी यह घोषणा की है कि इन कलाकारों की इस उपलब्धि को पूरे जिले के लिए एक प्रेरणा के रूप में देखा जा रहा है और इनके सम्मान में विशेष कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा। सरईटोला की यह कहानी आने वाले कई वर्षों तक लोगों को याद रहेगी और यह सिखाएगी कि सच्ची लगन और मेहनत से इंसान फर्श से अर्श तक का सफर तय कर सकता है।