RBI की फॉरेक्स स्वैप स्कीम ने तोड़े सारे रिकॉर्ड: FCNR(B) में रिकॉर्डतोड़ डॉलर जमा होने के बाद महीने भर पहले ही बंद हो रही विशेष विंडो
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा देश के विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूती देने और डॉलर के मुकाबले रुपये को स्थिरता प्रदान करने के लिए शुरू की गई विशेष फॉरेक्स स्वैप और FCNR(B) (फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट - बैंक) डिपॉजिट विंडो ने सफलता के सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। प्रवासी भारतीयों (NRIs) और वैश्विक निवेशकों से मिले भारी-भरकम डॉलर इनफ्लो के कारण तय लक्ष्य समय से काफी पहले ही हासिल हो गया है। नतीजतन, केंद्रीय बैंक ने इस विशेष विंडो को अपनी पूर्व-निर्धारित समय-सीमा से करीब एक महीने पहले ही बंद करने का फैसला किया है।
क्या थी यह विशेष योजना और बैंकों को क्या मिली थीं छूटें?
वैश्विक वित्तीय अनिश्चितताओं और डॉलर इंडेक्स में उतार-चढ़ाव के बीच देश में मजबूत विदेशी मुद्रा प्रवाह सुनिश्चित करने के लिए आरबीआई ने बैंकों को FCNR(B) डिपॉजिट जुटाने के लिए विशेष प्रोत्साहन दिए थे:
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ब्याज दर की सीमा में ढील: बैंकों को विदेशी मुद्रा डिपॉजिट पर सामान्य ओवरनाइट वैकल्पिक संदर्भ दरों (ARR) से ऊपर अधिक आकर्षक ब्याज देने की खुली छूट दी गई थी।
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CRR और SLR से मुक्ति: इस योजना के तहत जुटाए गए नए FCNR(B) और NRE डिपॉजिट्स को बैंकों के लिए अनिवार्य 'कैश रिजर्व रेशियो' (CRR) और 'स्टैच्यूटरी लिक्विडिटी रेशियो' (SLR) की शर्तों से पूरी तरह छूट दी गई थी, जिससे बैंकों के लिए यह फंड जुटाना बेहद सस्ता और लाभदायक हो गया।
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आकर्षक फॉरेक्स स्वैप विंडो: आरबीआई ने बैंकों के साथ रियायती दरों पर डॉलर-रुपया स्वैप (Buy/Sell Swap) विंडो खोली, जिससे बैंकों का फॉरेक्स हेजिंग रिस्क पूरी तरह खत्म हो गया।
उम्मीद से अधिक मिला इनफ्लो: टूटे सभी रिकॉर्ड
आरबीआई और वाणिज्यिक बैंकों के शुरुआती अनुमानों के मुकाबले एनआरआई समुदाय की ओर से अभूतपूर्व प्रतिक्रिया देखने को मिली:
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खाड़ी और पश्चिमी देशों से भारी आवक: अमेरिका, यूके, संयुक्त अरब अमीरात और सिंगापुर में रहने वाले अनिवासी भारतीयों ने भारत में मिलने वाले उच्च रिटर्न और पूर्ण सुरक्षा को देखते हुए भारी मात्रा में यूएस डॉलर, पाउंड और यूरो फिक्स्ड डिपॉजिट में निवेश किया।
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विदेशी मुद्रा भंडार को मिला बूस्ट: इस योजना के जरिए बैंकों ने अनुमानित लक्ष्य से लगभग डेढ़ गुना अधिक विदेशी मुद्रा आकर्षित की, जिससे देश का कुल विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) अपने ऐतिहासिक उच्च स्तर के करीब पहुंच गया।
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रुपये को मिला मजबूत सुरक्षा कवच: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बावजूद भारतीय रुपये को डॉलर के मुकाबले मजबूत सपोर्ट मिला और वोलेटिलिटी पूरी तरह नियंत्रण में रही।
समय से एक महीने पहले क्यों बंद की जा रही है विंडो?
बैंकिंग विशेषज्ञों के अनुसार, केंद्रीय बैंक द्वारा इस विंडो को समय से पहले समाप्त करने के पीछे तीन मुख्य कारण हैं:
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पर्याप्त डॉलर लिक्विडिटी: बैंकिंग सिस्टम और केंद्रीय बैंक के पास तय आवश्यकता से अधिक विदेशी मुद्रा का बफर तैयार हो चुका है।
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लागत नियंत्रण (Cost of Hedging): जरूरत से ज्यादा फॉरेक्स स्वैप चालू रखने से भविष्य में केंद्रीय बैंक और बैंकिंग सिस्टम पर मैच्योरिटी के समय हेजिंग और ब्याज का अतिरिक्त वित्तीय भार बढ़ सकता है।
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घरेलू तरलता का संतुलन: सिस्टम में डॉलर की आमद से रुपये की लिक्विडिटी में भी भारी इजाफा हुआ है, जिसे संतुलित रखना मुद्रास्फीति (महंगाई) प्रबंधन के लिए जरूरी है।
केंद्रीय बैंक के इस कदम से स्पष्ट संकेत मिलता है कि भारत का बाह्य वित्तीय खाता (External Sector) और विदेशी मुद्रा भंडार बेहद मजबूत स्थिति में है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था किसी भी वैश्विक वित्तीय झटके का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार है।