त्योहारी सीजन से पहले आम जनता को बड़ी राहत: चीनी पर 100% इंपोर्ट ड्यूटी घटा सकती है सरकार, रिकॉर्ड कीमतों पर लगाम लगाने की बड़ी तैयारी
आगामी त्योहारी सीजन से ठीक पहले घरेलू बाजार में चीनी की आसमान छूती कीमतों ने आम उपभोक्ताओं और केंद्र सरकार दोनों की चिंता बढ़ा दी है। रक्षाबंधन, गणेश चतुर्थी, नवरात्रि, दिवाली और शादियों के सीजन के दौरान पारंपरिक मिठाइयों, पेय पदार्थों और पैकेज्ड फूड की खपत अपने चरम पर पहुंच जाती है। ऐसे महत्वपूर्ण समय में बाजार में पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने और खुदरा महंगाई पर लगाम कसने के लिए केंद्र सरकार आयात शुल्क में भारी कटौती करने के विकल्प पर गंभीरता से विचार कर रही है। वर्तमान में चीनी के आयात पर 100 प्रतिशत का भारी-भरकम सीमा शुल्क (Customs Duty) लागू है, जिसे घटाने या पूरी तरह समाप्त करने के प्रस्तावों पर अंतर-मंत्रालयी स्तर पर मंथन जारी है। सरकार का प्राथमिक लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि त्योहारों के उल्लास के बीच आम आदमी की जेब पर मिठास का अतिरिक्त बोझ न पड़े।
रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंची चीनी की थोक और खुदरा कीमतें
हाल के हफ्तों में घरेलू मंडियों में चीनी की दरों में अप्रत्याशित उछाल देखा गया है। देश के प्रमुख गन्ना और चीनी उत्पादक राज्य महाराष्ट्र में एक्स-मिल (Ex-mill) कीमतें लगभग ₹46 प्रति किलोग्राम के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गई हैं। वहीं कोल्हापुर और उत्तर भारत की प्रमुख थोक मंडियों में थोक भाव ₹5,300 से ₹5,500 प्रति क्विंटल के पार निकल चुके हैं। थोक बाजार में आई इस तेजी का सीधा असर खुदरा दुकानों पर दिखाई दे रहा है, जहां कई शहरों में चीनी ₹50 से ₹55 प्रति किलोग्राम तक बिक रही है। इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) के आंकड़ों के मुताबिक, कीमतों का यह स्तर पिछले कई वर्षों का रिकॉर्ड तोड़ रहा है।
100% आयात शुल्क हटाने या घटाने का क्या होगा असर?
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक और सबसे बड़ा उपभोक्ता देश है। ऐतिहासिक रूप से भारत घरेलू जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर चीनी आयात पर निर्भर नहीं रहा है और आखिरी बार वर्ष 2017-18 में उल्लेखनीय मात्रा में आयात किया गया था। 100 प्रतिशत आयात शुल्क का मुख्य उद्देश्य घरेलू मिलों और स्थानीय गन्ना किसानों को सस्ते विदेशी माल के अनुचित डंपिंग से बचाना रहा है। हालांकि, मौजूदा आपूर्ति दबाव को देखते हुए यदि सरकार सीमित मात्रा में शुल्क-मुक्त (Duty-Free) या कम शुल्क पर कच्ची और रिफाइंड चीनी के आयात की अनुमति देती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार से अतिरिक्त स्टॉक तुरंत घरेलू बंदरगाहों पर पहुंच जाएगा। इससे स्थानीय सट्टेबाजी और कृत्रिम कमी पर तत्काल रोक लगेगी और मिलों पर एक्स-मिल कीमतें घटाने का स्वाभाविक दबाव बनेगा।
मानसून की चाल और गन्ना उत्पादन से जुड़ी चुनौतियां
घरेलू बाजार में आपूर्ति पर दबाव का एक बड़ा कारण मौसम की अनिश्चितता रही है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों के अनुसार, इस सीजन में मानसून की बारिश कई गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में लंबी अवधि के औसत से लगभग 13 प्रतिशत तक कम रही है। जून के शुरुआती चरण में बारिश की कमी 40 प्रतिशत से अधिक थी, जिससे कुछ इलाकों में बुआई और फसल के विकास की गति धीमी रही। कृषि मंत्रालय की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, देश में गन्ने का रकबा लगभग 5.83 मिलियन हेक्टेयर दर्ज किया गया है, जो पिछले साल के मुकाबले थोड़ा कम है। मौसम के इस उतार-चढ़ाव और वैश्विक स्तर पर अल-नीनो के प्रभाव के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार (जैसे न्यूयॉर्क शुगर फ्यूचर्स) में भी कीमतों में मजबूती देखी गई है, जिसका मनोवैज्ञानिक असर घरेलू व्यापार पर पड़ा है।
जमाखोरी पर लगाम और गन्ने की अगेती पेराई की रणनीति
सिर्फ आयात शुल्क कटौती ही नहीं, बल्कि सरकार घरेलू स्तर पर आपूर्ति बढ़ाने के लिए बहुआयामी रणनीति पर काम कर रही है। खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने थोक व्यापारियों, रिफाइनरों और बड़े खुदरा विक्रेताओं पर सख्त स्टॉक लिमिट (Stockholding Limits) लागू कर दी है ताकि कोई भी व्यापारी बाजार में कृत्रिम कमी पैदा करने के लिए चीनी की जमाखोरी न कर सके। इसके साथ ही, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र की चीनी मिलों से बातचीत के बाद नए पेराई सत्र को सामान्य समय (नवंबर के पहले सप्ताह) से करीब 10 से 15 दिन पहले, यानी अक्टूबर के मध्य से ही शुरू करने की योजना बनाई गई है। इससे त्योहारी सीजन के चरम पर नई चीनी का ताजा स्टॉक बाजार में उतर जाएगा और आपूर्ति का संकट पूरी तरह टल जाएगा।
खाद्य सुरक्षा और उपभोक्ता हित सर्वोपरि
सरकार के सामने वर्तमान में दोहरी चुनौती है—एक तरफ एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम की गति को बनाए रखना और दूसरी तरफ खाद्य मुद्रास्फीति को काबू में रखते हुए आम उपभोक्ता को सस्ती दरों पर आवश्यक खाद्य सामग्री उपलब्ध कराना। केंद्र सरकार ने पहले ही चीनी के अनियंत्रित निर्यात पर कड़े प्रतिबंध लगा रखे हैं ताकि घरेलू बफर स्टॉक सुरक्षित रहे। यदि आयात शुल्क में रियायत की आधिकारिक अधिसूचना जारी होती है, तो यह स्पष्ट संदेश होगा कि सरकार आम नागरिकों की रसोई के बजट और खाद्य महंगाई को लेकर पूरी तरह सतर्क है। आने वाले कुछ दिनों में इस प्रस्ताव पर अंतिम मुहर लगने की पूरी संभावना है, जिससे उपभोक्ताओं को त्योहारी सीजन में बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।