यहां देवी से पहले होती है ‘राक्षस’ की पूजा! पैर धोकर, तिलक लगाकर करती है कुंवारी कन्या
हमारे देश में देवी-देवताओं की पूजा होती है, ये तो हम सब जानते हैं। पर क्या आपने कभी सुना है कि कहीं पर किसी राक्षस (दानव) की भी पूजा होती हो? और वो भी पूरी श्रद्धा और परंपरा के साथ!
यह कोई कहानी नहीं, बल्कि बुंदेलखंड की धरती की एक अनोखी और हैरान कर देने वाली हकीकत है। झांसी जिले के पास, मां शारदा देवी के एक प्रसिद्ध मंदिर में एक ऐसी परंपरा निभाई जाती है, जिसे देखकर आप भी दांतों तले उंगली दबा लेंगे।
क्या है यह अनोखी परंपरा?
यहां, नवरात्रि की नवमी के दिन, हजारों भक्तों की भीड़ के बीच, देवी मां की पूजा से पहले मंदिर के बाहर बैठे उनके ‘रक्षक’, एक राक्षस की मूर्ति की पूजा की जाती है। और यह पूजा कोई और नहीं, बल्कि एक कुंवारी कन्या (छोटी बच्ची) करती है। वह पूरी विधि-विधान से राक्षस के पैर धोती है, उन पर तिलक लगाती है और फूल चढ़ाकर आरती उतारती है। इसके बाद ही मंदिर के अंदर देवी की पूजा शुरू होती है।
तो आखिर एक राक्षस की पूजा क्यों? (इसके पीछे है एक दिलचस्प कहानी)
आप सोच रहे होंगे कि जिस राक्षस को बुराई का प्रतीक माना जाता है, उसकी पूजा क्यों?
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह राक्षस कोई आम दानव नहीं, बल्कि देवी मां का सबसे बड़ा भक्त और द्वारपाल (अंगरक्षक) था। उसका नाम मरदान सिंह था। कहा जाता है कि जब देवी मां यहां निवास करने आईं, तो उन्होंने मरदान सिंह की भक्ति और शक्ति से प्रसन्न होकर उसे यह वरदान दिया था कि, "इस मंदिर में मेरी पूजा से पहले हमेशा तुम्हारी पूजा होगी।"
तब से लेकर आज तक, सदियों से यह परंपरा चली आ रही है। यहां के लोग मरदान सिंह को राक्षस नहीं, बल्कि अपनी देवी का सबसे वफादार रक्षक मानते हैं और उसी सम्मान के साथ उनकी पूजा करते हैं।
यह अनोखी परंपरा हमें दिखाती है कि भारत की आस्था और संस्कृति कितनी विविध और गहरी है, जहां एक राक्षस को भी उसकी भक्ति के लिए पूजा जाता है।