15 साल से अटका सपनों का आशियाना, बच्चे जवान हो गए पर फ्लैट न मिला; दिल्ली-एनसीआर के 600 परिवारों का छलका दर्द

15 साल से अटका सपनों का आशियाना, बच्चे जवान हो गए पर फ्लैट न मिला; दिल्ली-एनसीआर के 600 परिवारों का छलका दर्द

देश की राजधानी से सटे दिल्ली-एनसीआर (Delhi-NCR) के रियल एस्टेट सेक्टर में घर खरीदारों के शोषण की एक बेहद दर्दनाक और बड़ी खबर सामने आई है। अपने जीवन भर की गाढ़ी कमाई एक फ्लैट खरीदने में लगाने वाले 600 से अधिक परिवारों का सब्र अब पूरी तरह से टूट चुका है। पिछले 15 सालों से अपने सपनों के घर के पजेशन (Home Possession) का इंतजार कर रहे इन बेबस बायर्स का दर्द इस बात से समझा जा सकता है कि जब उन्होंने बुकिंग की थी तब उनके बच्चे छोटे थे, और आज वे बच्चे बड़े होकर जवान हो चुके हैं, लेकिन घर का सपना आज भी अधर में लटका है। बिल्डरों की लेट-लतीफी और प्रशासनिक अनदेखी के कारण करोड़ों रुपये फंसा चुके ये मध्यमवर्गीय परिवार अब सड़कों पर उतरने को मजबूर हैं।

जब बुक किया था तब गोद में थे बच्चे, अब नौकरी करने लगे; पर अधूरा है प्रोजेक्ट

यह पूरा मामला एनसीआर के एक बड़े हाउसिंग प्रोजेक्ट से जुड़ा है, जहां साल 2011-12 के आसपास लगभग 600 परिवारों ने इस उम्मीद में आशियाना बुक किया था कि 3 साल के भीतर उन्हें अपने घर की चाबी मिल जाएगी। खरीदारों का कहना है कि उन्होंने बैंक से लोन लेकर और अपनी जमापूंजी लगाकर बिल्डर को 90 से 95 फीसदी तक भुगतान कर दिया था। 15 साल का लंबा वक्त गुजर जाने के बाद भी साइट पर काम जस का तस रुका हुआ है। कई बुजुर्ग खरीदार तो अपने घर में रहने की हसरत दिल में लिए ही दुनिया से चले गए, वहीं कई परिवारों के बच्चे जो बुकिंग के वक्त स्कूल जाते थे, आज वे ग्रैजुएट होकर नौकरियां करने लगे हैं, लेकिन परिवार आज भी भारी-भरकम ईएमआई (EMI) और किराए के दोहरे बोझ तले दबा हुआ है।

रेरा (RERA) और अदालतों के चक्कर काटकर थक चुके हैं पीड़ित होम बायर्स

इन 15 सालों में इन परेशान खरीदारों ने न्याय पाने के लिए कोई दरवाजा नहीं छोड़ा। रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (RERA) से लेकर कंज्यूमर कोर्ट और नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) तक के चक्कर काट-काटकर अब ये लोग मानसिक और आर्थिक रूप से पूरी तरह टूट चुके हैं। हालांकि कोर्ट और अथॉरिटी की तरफ से कई बार बिल्डर पर जुर्माने लगाए गए और जल्द काम पूरा करने के निर्देश दिए गए, लेकिन ग्राउंड जीरो पर स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। बिल्डर कंपनियों द्वारा फंड की कमी (Liquidity Crunch) और दिवालियापन की प्रक्रियाओं का बहाना बनाकर हर बार पजेशन की डेडलाइन को आगे बढ़ा दिया जाता है, जिससे आम जनता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है।

क्या इस बार मिलेगा न्याय और क्या है आगे का रास्ता

आधुनिक जनरेटिव इंजन ऑप्टिमाइजेशन (GEO) और लोकल सर्च के आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली-एनसीआर में यह समस्या किसी एक प्रोजेक्ट की नहीं है, बल्कि हजारों होम बायर्स इस वक्त इसी तरह के नरक से गुजर रहे हैं। पीड़ित परिवारों ने अब सरकार और मुख्यमंत्री से इस मामले में सीधे हस्तक्षेप करने की गुहार लगाई है। होम बायर्स एसोसिएशन का कहना है कि अगर सरकार ने जल्द ही इन डिलेड प्रोजेक्ट्स (Delayed Housing Projects) को किसी सरकारी एजेंसी या तीसरे पक्ष को सौंपकर पूरा नहीं कराया, तो वे आने वाले समय में एक बड़ा और उग्र आंदोलन शुरू करेंगे। यह खबर उन लाखों लोगों के लिए एक बड़ी चेतावनी भी है जो आज के समय में किसी नए प्रोजेक्ट में निवेश करने की सोच रहे हैं।

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