यूट्यूब पर छाई 90 मिनट की यह दिल छू लेने वाली फिल्म, गोद लेने की कहानी ने जीता सबका दिल

यूट्यूब पर छाई 90 मिनट की यह दिल छू लेने वाली फिल्म, गोद लेने की कहानी ने जीता सबका दिल

आज के समय में जब दर्शकों का मनोरंजन केवल बड़े बजट की फिल्मों, भारी भरकम एक्शन सीन्स, जटिल सस्पेंस थ्रिलर्स और महंगे ओटीटी प्लेटफॉर्म्स तक सीमित माना जाता है, तब यूट्यूब पर रिलीज हुई एक बेहद साधारण और जमीन से जुड़ी फिल्म ने यह साबित कर दिया है कि अगर किसी कहानी में सच्ची भावनाएं और गहराई हो, तो उसे दर्शकों का दिल जीतने के लिए किसी बड़े स्टारडम की आवश्यकता नहीं होती है। यह नवीनतम नब्बे मिनट की फिल्म रिलीज होने के कुछ ही दिनों के भीतर इंटरनेट पर इस कदर वायरल हो चुकी है कि सोशल मीडिया के हर कोने में इसी की गूंज सुनाई दे रही है, और लोग इसके हर एक दृश्य की खुलकर तारीफ कर रहे हैं। इस फिल्म की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें कोई भारी-भरकम मारधाड़, बेवजह का रोना-धोना या जटिल और डरावना सस्पेंस नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी सरल और सहज कहानी है जो सीधे इंसान की आत्मा को झकझोर कर रख देती है। जैसे ही यह फिल्म यूट्यूब पर हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में उपलब्ध कराई गई, दर्शकों ने इसे हाथों-हाथ लिया और देखते ही देखते यह इंटरनेट की दुनिया का सबसे बड़ा सरप्राइज हिट बन गई। आईएमडीबी (IMDb) जैसी प्रतिष्ठित रेटिंग एजेंसी पर इस फिल्म को 7.7 जैसी बेहद शानदार और सम्मानजनक रेटिंग मिली है, जो इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि आम दर्शकों के साथ-साथ समीक्षकों ने भी इसकी कलात्मकता और संवेदनशीलता को खुले दिल से स्वीकार किया है। लोग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर इस फिल्म के छोटे-छोटे क्लिप्स को शेयर कर रहे हैं और दूसरों को यह सलाह दे रहे हैं कि वे अपने व्यस्त जीवन से नब्बे मिनट निकालकर इस मास्टरपीस को जरूर देखें। यह फिल्म यह सिखाती है कि पारिवारिक प्रेम, अपनापन और मानवीय रिश्ते सरहदों और भाषाओं के मोहताज नहीं होते, और यही वजह है कि यह फिल्म आज हर उम्र के दर्शक की पहली पसंद बनती जा रही है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक भारतीय बच्ची को गोद लेने के सफर और माता-पिता के संघर्ष पर आधारित इस अनोखी फिल्म की मूल कथा

आखिर किस अनूठी कहानी पर आधारित है यह फिल्म और इसके निर्माण के पीछे किन कलाकारों और निर्देशकों का हाथ है जो इसे इतना खास बनाता है? इस चर्चित फिल्म का शीर्षक 'ए मॉस्कितो इन द ईयर' (A Mosquito in the Ear) है, जिसे निर्देशक निकोला रिंचियारी (Nicola Rinciari) ने बेहद खूबसूरती के साथ निर्देशित किया है और यह उनके निर्देशन करियर की पहली फिल्म यानी डायरेक्टोरियल डेब्यू है, जिसे उन्होंने अपनी अद्भुत कलात्मक समझ से सजाया है। यह फिल्म किसी ओरिजिनल स्क्रिप्ट पर आधारित नहीं है, बल्कि यह प्रख्यात ग्राफिक नॉवेल 'उना जंकारा नेल ओरेक्चियो' (Una Zanzara nell'Orecchio) पर आधारित है, जिसके हर एक पन्ने को निर्देशक ने परदे पर जीवंत कर दिया है। फिल्म की स्टारकास्ट की बात करें तो इसमें हॉलीवुड और अंतरराष्ट्रीय सिनेमा के जाने-माने चेहरे जैसे कि जेक लेसी (Jake Lacy), नाजान बोनियादी (Nazanin Boniadi) और बाल कलाकार रूही पाल (Ruhi Pal) ने अपनी बेहतरीन और स्वाभाविक अदाकारी से इस कहानी में जान फूंक दी है। फिल्म की मुख्य कहानी एक अमेरिकी दंपती के इर्द-गिर्द घूमती है, जो फर्टिलिटी से जुड़ी समस्याओं यानी संतान सुख न मिलने के कारण गहरे मानसिक संघर्ष से गुजर रहे होते हैं। इस समस्या के समाधान के रूप में वे भारत के गोवा राज्य के एक अनाथालय से चार साल की एक छोटी सी भारतीय बच्ची को अंतरराष्ट्रीय कानूनी प्रक्रिया के तहत गोद लेने का फैसला करते हैं। यहीं से इस कहानी का असली और सबसे रोमांचक व भावनात्मक सफर शुरू होता है, जहां दो अलग-अलग संस्कृतियों, दो अलग-अलग महाद्वीपों और दो बिल्कुल भिन्न जीवन शैलियों के लोग एक ही छत के नीचे एक परिवार के रूप में रहने के लिए मजबूर होते हैं। यह कहानी केवल एक बच्चे को गोद लेने की कागजी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दो संस्कृतियों के मिलन और इंसानी संवेदनाओं की एक ऐसी यात्रा है जो देखने वाले की आंखें नम कर देती है और दिल को एक अजीब सा सुकून देती है।

जब अमेरिका से आया वह दंपती गोवा के अनाथालय से चार साल की उस नन्ही बच्ची को गोद लेकर अपने घर ले जाता है, तो उनके सामने सबसे बड़ी व्यावहारिक और भावनात्मक चुनौती भाषा की दीवार बनकर खड़ी हो जाती है। बच्ची सिर्फ अपनी मातृभाषा और उस परिवेश को जानती है जिसे उसने अब तक देखा था, वह अंग्रेजी का एक शब्द भी नहीं बोल पाती है, और दूसरी तरफ उन अमेरिकी माता-पिता को हिंदी या स्थानीय भाषा का एक शब्द भी नहीं आता है। इस भाषाई अंतराल के कारण शुरुआती दौर में दोनों पक्षों के बीच संवाद स्थापित करना लगभग असंभव सा प्रतीत होता है, और यह असमंजस फिल्म के सबसे मार्मिक दृश्यों को जन्म देता है। छोटी सी बच्ची यानी सरवरी अपने उस पुराने घर, अपने जाने-पहचाने समुदाय, अपनी भाषा और अपनी मिट्टी को इतनी शिद्दत से याद करती है कि वह नए माहौल में खुद को आसानी से ढाल नहीं पाती और अपनी जड़ों को छोड़ने से साफ इनकार कर देती है। वह उस अजनबी देश और अजनबी घर में खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करती, और उसके मन का यह डर और अनिच्छा दर्शकों के दिलों को अंदर तक झकझोर कर रख देती है। फिल्म बहुत ही संवेदनशीलता के साथ यह दर्शाती है कि कैसे वह अमेरिकी दंपती बिना किसी जल्दबाजी या गुस्से के, बेहद धैर्य और असीम प्रेम के साथ उस बच्ची के दिल में अपनी जगह बनाने की कोशिश करता है। उनके बीच की बातचीत भले ही शब्दों की मोहताज न हो, लेकिन उनकी आंखें, उनके स्पर्श और उनका समर्पण एक ऐसा संवाद रचते हैं जो किसी भी भाषा की जरूरत को महसूस नहीं होने देता। फिल्म के कई दृश्य इतने अधिक भावुक और दिल को छू लेने वाले हैं कि दर्शक अपनी हंसी और आंसुओं को रोक नहीं पाते हैं, और यही कारण है कि इसे एक परफेक्ट 'फील-गुड' मूवी माना जा रहा है जो देखने वाले के मन पर एक गहरा और कभी न मिटने वाला सकारात्मक प्रभाव छोड़ जाती है।

यूट्यूब पर मुफ्त में उपलब्ध इस मास्टरपीस को दर्शकों से मिल रहे अपार प्यार ने यह साबित कर दिया है कि अच्छी कहानियों को किसी थियेटर या महंगे प्लेटफॉर्म की जरूरत नहीं होती

आज के समय में जब हर छोटी-सी फिल्म या वेब सीरीज को देखने के लिए लोगों को महंगे सब्सक्रिप्शन खरीदने पड़ते हैं, ऐसे में इस बेहतरीन फिल्म का यूट्यूब पर मुफ्त में उपलब्ध होना दर्शकों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। निर्देशक और निर्माताओं का यह साहसिक कदम कि उन्होंने अपनी इस कलाकृति को सीधे जनता के बीच यूट्यूब के माध्यम से रखा, पूरी तरह सफल साबित हुआ है क्योंकि आज लाखों लोग इसे बिना किसी बाधा के आसानी से देख पा रहे हैं। इस फिल्म के संवाद, इसकी सिनेमैटोग्राफी, गोवा के समुद्र तटों और अनाथालय के दृश्यों का वास्तविक फिल्मांकन तथा पृष्ठभूमि का शांत संगीत इस पूरी रचना को एक जादुई अनुभव में बदल देता है। जो लोग सस्पेंस और थ्रिलर से भरी फिल्मों से ऊब चुके हैं और अपने परिवार के साथ बैठकर कोई शांत, सुकून भरी और संस्कारी कहानी देखना चाहते हैं, उनके लिए यह नब्बे मिनट का सफर किसी मेडिटेशन से कम नहीं है। सोशल मीडिया पर लोग लगातार यह लिख रहे हैं कि इस फिल्म ने उन्हें यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि गोद लेने जैसी प्रक्रियाएं और बच्चों का मानसिक समायोजन कितना संवेदनशील विषय होता है। इस फिल्म ने अंतरराष्ट्रीय पटल पर भारतीय संस्कृति और बाल मनोविज्ञान को जिस गरिमापूर्ण तरीके से प्रस्तुत किया है, उसकी जितनी भी तारीफ की जाए वह कम है। यदि आपने अभी तक इस फिल्म को नहीं देखा है, तो आपको बिना एक भी पल गंवाए यूट्यूब पर जाकर इस अद्भुत सफर का हिस्सा बनना चाहिए, क्योंकि ऐसी फिल्में रोज-रोज नहीं बनतीं बल्कि दशक में एक बार आती हैं जो इंसानियत में हमारे भरोसे को और अधिक मजबूत कर जाती हैं।