72वें नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स दिल्ली नहीं गुजरात में: 70 साल पुरानी परंपरा टूटने पर मचे सियासी घमासान के बीच भड़के परेश रावल, बोले- 'क्या गुजरात पाकिस्तान में है?'

72वें नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स दिल्ली नहीं गुजरात में: 70 साल पुरानी परंपरा टूटने पर मचे सियासी घमासान के बीच भड़के परेश रावल, बोले- 'क्या गुजरात पाकिस्तान में है?'

भारतीय सिनेमा जगत के सबसे प्रतिष्ठित सम्मान 'राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार' (National Film Awards) के इतिहास में इस बार एक युगांतरकारी और अभूतपूर्व बदलाव देखने को मिलने जा रहा है। पिछले 70 वर्षों से भी अधिक समय से यह भव्य समारोह राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित होता रहा है, लेकिन 72वें संस्करण में यह दशकों पुरानी परंपरा टूटने जा रही है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की है कि 72वें नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स का आयोजन 22 सितंबर को गुजरात के केवड़िया स्थित एकता नगर (स्टैच्यू ऑफ यूनिटी परिसर) में किया जाएगा। राजधानी से बाहर देश के किसी अन्य राज्य में इस प्रतिष्ठित समारोह को ले जाने के निर्णय ने देश के राजनीतिक और सिनेमाई हलकों में एक नई तीखी बहस छेड़ दी है। वहीं, इस फैसले के विरोध में उठ रही आवाजों पर दिग्गज बॉलीवुड अभिनेता और पूर्व सांसद परेश रावल ने कड़ा ऐतराज जताते हुए आलोचकों को करारा जवाब दिया है।

'क्या गुजरात पाकिस्तान या बांग्लादेश में है?' — परेश रावल का दो टूक जवाब

नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स के दिल्ली से बाहर गुजरात शिफ्ट होने पर कुछ राजनीतिक दलों और फिल्मकारों द्वारा उठाए जा रहे सवालों पर जब समाचार एजेंसी एएनआई (ANI) ने अभिनेता परेश रावल से उनकी प्रतिक्रिया जाननी चाही, तो वह खासे भड़क गए। परेश रावल ने तल्ख लहजे में सवाल दागते हुए कहा, "तो क्या हुआ? क्या गुजरात बांग्लादेश या पाकिस्तान में है? यह भी हमारे ही देश का एक अभिन्न हिस्सा है। यह भव्य और राष्ट्रीय कार्यक्रम गुजरात में क्यों नहीं होना चाहिए? गुजरात में भी ऐसे बड़े आयोजन बिल्कुल होने चाहिए। मैं तो यह कहता हूं कि ऐसे प्रतिष्ठित आयोजन सिर्फ एक शहर तक सीमित रहने के बजाय देश के हर राज्य में बारी-बारी से होने चाहिए, इसमें कुछ भी बुरा या गलत नहीं है।"

परेश रावल ने आगे गणतंत्र दिवस का उदाहरण देते हुए कहा कि 26 जनवरी की परेड जैसी औपचारिकताएं राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में होती हैं, लेकिन कला, संस्कृति और सिनेमा से जुड़े राष्ट्रीय आयोजनों को पूरे भारत में घूमना चाहिए ताकि हर क्षेत्र के लोगों को इससे जुड़ने का गौरव मिल सके। उन्होंने विरोध करने वालों पर निशाना साधते हुए कहा कि कुछ राजनेताओं का काम ही हर सकारात्मक बदलाव में मीन-मेख निकालना और सवाल खड़े करना होता है।

वेन्यू बदलने पर क्यों मचा है सियासी और फिल्मी घमासान?

जैसे ही केंद्र सरकार की ओर से 72वें नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स को गुजरात के केवड़िया में आयोजित करने की घोषणा हुई, कई क्षेत्रीय नेताओं और बॉलीवुड से जुड़े लोगों ने इस पर सवाल उठाने शुरू कर दिए।

  • राज ठाकरे और एमएनएस का विरोध: महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के प्रमुख राज ठाकरे ने सीधे केंद्र सरकार की मंशा पर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स को दिल्ली से गुजरात ले जाने की असल वजह क्या है? अगर राष्ट्रीय राजधानी से बाहर इस सेरेमनी को शिफ्ट ही करना था, तो इसे मुंबई क्यों नहीं लाया गया, जो भारतीय सिनेमा की जन्मस्थली और आर्थिक व सांस्कृतिक राजधानी है।

  • फिल्ममेकर्स की आपत्ति: निर्देशक राहुल ढोलकिया सहित कुछ अन्य फिल्मकारों ने भी सवाल उठाया कि भारतीय सिनेमा को आकार देने वाले राज्यों (जैसे महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल या दक्षिण भारत) को दरकिनार कर केवल गुजरात को प्राथमिकता क्यों दी जा रही है।

केंद्र सरकार का विजन: 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' और क्षेत्रीय जुड़ाव

इस पूरे विवाद और आलोचनाओं पर केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने अपनी स्पष्ट नीति साझा की है। मंत्रालय के अनुसार, यह फैसला देश की क्षेत्रीय, सांस्कृतिक और भाषाई विविधता को मुख्यधारा से जोड़ने की एक सुनियोजित राष्ट्रीय पहल का हिस्सा है। मंत्रालय का कहना है कि राष्ट्रीय स्तर के गौरवशाली आयोजनों को सिर्फ लुटियंस दिल्ली के कमरों और ऑडिटोरियम तक कैद नहीं रखा जा सकता।

गुजरात के केवड़िया (एकता नगर) में सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रतिमा 'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी' के सानिध्य में यह आयोजन वास्तव में 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' के राष्ट्रीय संकल्प को मूर्त रूप देगा। सरकार की भविष्य की योजना के मुताबिक, आने वाले वर्षों में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों का मंच देश के अलग-अलग राज्यों (जैसे पूर्वोत्तर, दक्षिण और पूर्वी भारत) में भी बारी-बारी से सजेगा।

1954 से अब तक: क्या रहा है राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों का ऐतिहासिक सफर

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की स्थापना वर्ष 1954 में की गई थी, जब तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के कर-कमलों से पहली बार भारतीय फिल्मों को सम्मानित किया गया था। उस दौर में इन्हें 'स्टेट अवार्ड्स फॉर फिल्म्स' (State Awards) कहा जाता था। वर्ष 1953 में रिलीज हुई महान मराठी फिल्म 'श्यामची आई' (Shyamchi Aai) को देश की पहली सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का स्वर्ण पदक मिला था।

तभी से लेकर 71वें संस्करण तक, यह गरिमामयी समारोह हमेशा राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली में ही आयोजित किया जाता रहा है, जहां भारत के राष्ट्रपति विजेताओं को पदक और प्रशस्ति पत्र सौंपते हैं। लिहाजा, 72वें साल में इसका दिल्ली से बाहर किसी अन्य राज्य में जाना आजादी के बाद का सबसे बड़ा ऐतिहासिक और संरचनात्मक बदलाव माना जा रहा है।

72वें नेशनल अवॉर्ड्स के प्रमुख विजेता: किसे मिलेगा कौन सा सम्मान?

केवड़िया में 22 सितंबर को आयोजित होने वाले इस 72वें समारोह में भारतीय सिनेमा की भाषाई विविधता का अद्भुत संगम देखने को मिलेगा:

  • बेस्ट एक्टर (संयुक्त विजेता): बॉलीवुड अभिनेता कार्तिक आर्यन को फिल्म 'चंदू चैंपियन' में उनके असाधारण शारीरिक और भावनात्मक अभिनय के लिए, तथा दिग्गज मलयालम अभिनेता ममूटी को हॉरर-ड्रामा 'ब्रह्मयुगम' में उनके अद्वितीय अभिनय के लिए संयुक्त रूप से बेस्ट एक्टर इन लीडिंग रोल का अवॉर्ड दिया जाएगा। ममूटी के करियर का यह चौथा राष्ट्रीय पुरस्कार होगा।

  • बेस्ट फीचर फिल्म और बेस्ट एक्ट्रेस: फिल्म 'आर्टिकल 370' को सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म के खिताब से नवाजा जाएगा। इसी फिल्म में एक जांबाज खुफिया अधिकारी की भूमिका निभाने वाली यामी गौतम को बेस्ट एक्ट्रेस इन लीडिंग रोल का राष्ट्रीय पुरस्कार मिलेगा।

  • बेस्ट डेब्यू डायरेक्टर: अभिनेता रणदीप हुड्डा को उनके द्वारा निर्देशित पहली पीरियड-बायोपिक 'स्वातंत्र्य वीर सावरकर' के लिए बेस्ट डेब्यू डायरेक्टर का सम्मान दिया जाएगा।

  • सर्वश्रेष्ठ हिंदी फिल्म: दृष्टिबाधित उद्योगपति श्रीकांत बोल्ला के जीवन पर आधारित और राजकुमार राव अभिनीत फिल्म 'श्रीकांत' को सर्वश्रेष्ठ हिंदी फिल्म चुना गया है।

  • क्षेत्रीय और मुख्यधारा सिनेमा का दबदबा: मराठी, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, गढ़वाली, तुलु के साथ-साथ पहली बार किसी संथाली फिल्म को भी नॉन-फीचर फिल्म श्रेणी में सम्मानित किया जाएगा। इसके अलावा ब्लॉकबस्टर फिल्मों जैसे 'कल्कि 2898 एडी', 'अमरन', 'पुष्पा 2: द रूल', 'भूल भुलैया 3' और 'स्त्री 2' को भी विभिन्न तकनीकी व कलात्मक श्रेणियों में पुरस्कृत किया जाएगा।

भारतीय सिनेमा के विकेंद्रीकरण की एक नई शुरुआत

परेश रावल के बेबाक बयान और केंद्र सरकार के इस कदम ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि राष्ट्रीय महत्व के प्रतीक अब किसी एक भौगोलिक सीमा या शहर की बपौती नहीं हैं। गुजरात के केवड़िया में होने जा रहा यह समारोह न केवल भारतीय सिनेमा के कलाकारों को एक नया और भव्य मंच देगा, बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों की समृद्ध संस्कृति और पर्यटन को भी वैश्विक स्तर पर एक नई पहचान दिलाने में मददगार साबित होगा।