20 की उम्र में ‘बबीता जी’ बन घर-घर छाईं मुनमुन दत्ता, बॉलीवुड में क्यों नहीं चला जादू? जानिए अनसुनी कहानी

20 की उम्र में ‘बबीता जी’ बन घर-घर छाईं मुनमुन दत्ता, बॉलीवुड में क्यों नहीं चला जादू? जानिए अनसुनी कहानी

टेलीविजन जगत में कुछ किरदार ऐसे होते हैं जो समय की सीमाओं को पार कर हमेशा के लिए दर्शकों के दिलों में बस जाते हैं। ऐसा ही एक अविस्मरणीय और बेहद लोकप्रिय किरदार है 'तारक मेहता का उल्टा चश्मा' की 'बबीता जी' का, जिसे जीवंत किया है अभिनेत्री मुनमुन दत्ता ने। पश्चिम बंगाल के एक छोटे से शहर दुर्गापुर से निकलकर मायानगरी मुंबई में अपनी खास पहचान बनाने वाली मुनमुन दत्ता आज किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। जब मुनमुन ने इस शो में कदम रखा था, तब उनकी उम्र महज 20 वर्ष थी। इतनी छोटी उम्र में एक परिपक्व, आधुनिक और संजीदा महिला का किरदार निभाना और उसे भारतीय टेलीविजन के इतिहास के सबसे चर्चित किरदारों में शुमार करवा देना कोई साधारण उपलब्धि नहीं थी। गोकुलधाम सोसाइटी की सबसे स्टाइलिश महिला के रूप में उन्होंने पहले ही दिन से जो जादू बिखेरा, वह आज लगभग दो दशकों बाद भी बदस्तूर जारी है।

मुनमुन दत्ता का जन्म 28 सितंबर 1987 को पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर में एक संगीत प्रेमी बंगाली परिवार में हुआ था। उनके माता-पिता शास्त्रीय संगीत से जुड़े हुए थे, जिसके चलते मुनमुन का झुकाव भी बचपन से ही कला और संस्कृति की तरफ रहा। उन्होंने शास्त्रीय संगीत की बाकायदा शिक्षा भी ली थी, लेकिन उनकी किस्मत के सितारे उन्हें अभिनय और ग्लैमर की दुनिया में ले जाने का इशारा कर रहे थे। दुर्गापुर और कोलकाता से अपनी शुरुआती पढ़ाई पूरी करने के बाद वह उच्च शिक्षा के लिए पुणे आ गईं, जहां उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की। पढ़ाई के दौरान ही मुनमुन ने मॉडलिंग की दुनिया में अपने कदम रख दिए थे और कई फैशन शो व विज्ञापनों में अपनी खूबसूरती और आत्मविश्वास का लोहा मनवाया।

बॉलीवुड का सफर और बड़े पर्दे पर शुरुआती संघर्ष की हकीकत

मायानगरी मुंबई आने वाले हर कलाकार की तरह मुनमुन दत्ता की आंखों में भी बॉलीवुड के बड़े पर्दे पर छा जाने का सपना था। साल 2005 में उन्होंने बॉलीवुड के जाने-माने अभिनेता कमल हासन की फिल्म 'मुंबई एक्सप्रेस' से हिंदी सिनेमा में अपना डेब्यू किया। इसके बाद साल 2006 में उन्होंने पूजा भट्ट निर्देशित थ्रिलर फिल्म 'हॉलिडे' में काम किया, जिसमें उनके अभिनय की काफी सराहना की गई। मुनमुन में प्रतिभा की कोई कमी नहीं थी, उनका स्क्रीन प्रेजेंस शानदार था और वे हर तरह के रोल के लिए तैयार थीं, लेकिन उस दौर की बॉलीवुड इंडस्ट्री में बाहरी कलाकारों के लिए अपनी जड़ें जमाना बेहद कठिन चुनौती थी।

फिल्मों में काम करने के बावजूद उन्हें वह पहचान और मुख्य भूमिकाएं नहीं मिल पा रही थीं, जिसकी वे वास्तविक हकदार थीं। छोटे रोल्स और टाइपकास्ट होने का खतरा लगातार बना हुआ था। मुनमुन दत्ता ने कई बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए ऑडिशंस दिए, कई जगह सराहना मिली तो कई जगह निराशा हाथ लगी। बॉलीवुड की चकाचौंध और उसकी अनिश्चितताओं के बीच मुनमुन ने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने इस बात को बहुत जल्दी समझ लिया था कि कला का माध्यम चाहे बड़ा पर्दा हो या छोटा, सबसे ज्यादा मायने यह रखता है कि दर्शक आपके काम से कितना जुड़ाव महसूस करते हैं। यहीं से उनके जीवन में छोटे पर्दे का रुख करने का एक ऐसा मोड़ आया जिसने उनके पूरे करियर की दिशा ही बदल दी।

'हम सब बाराती' से 'तारक मेहता' तक: किस्मत का खेल और दिलीप जोशी का साथ

टेलीविजन पर मुनमुन दत्ता ने साल 2004 में प्रसारित हुए धारावाहिक 'हम सब बाराती' से शुरुआत की थी। इस धारावाहिक में उनके साथ वरिष्ठ अभिनेता दिलीप जोशी भी अहम भूमिका में थे। उस समय शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि यह मुलाकात भविष्य में भारतीय टीवी के सबसे यादगार स्क्रीन बॉन्ड की नींव रख रही थी। जब साल 2008 में निर्माता असित कुमार मोदी 'तारक मेहता का उल्टा चश्मा' के लिए कास्टिंग कर रहे थे, तब बबीता जी के आधुनिक, पढ़ी-लिखी और खूबसूरत किरदार के लिए किसी ऐसे चेहरे की तलाश थी जो चुलबुलेपन के साथ गरिमा को संभाल सके।

कहा जाता है कि दिलीप जोशी ने ही मेकर्स को मुनमुन दत्ता के नाम का सुझाव दिया था क्योंकि वे 'हम सब बाराती' के दौरान उनके पेशेवर अंदाज और अभिनय क्षमता से भली-भांति परिचित थे। मेकर्स ने जब मुनमुन का ऑडिशन लिया, तो उन्हें तुरंत एहसास हो गया कि बबीता कृष्णन अय्यर के रोल के लिए मुनमुन से बेहतर कोई दूसरा विकल्प हो ही नहीं सकता। मात्र 20 साल की उम्र में मुनमुन ने इस शो को साइन किया और उसके बाद जो हुआ, वह भारतीय टेलीविजन के इतिहास में दर्ज हो गया। बबीता जी और जेठालाल के बीच की खट्टी-मीठी नोकझोंक, मासूम आकर्षण और संवादों की टाइमिंग ने दर्शकों को टीवी स्क्रीन से बांध दिया।

बबीता जी का किरदार और गोकुलधाम की सबसे स्टाइलिश महिला का जलवा

'तारक मेहता का उल्टा चश्मा' में बबीता जी का किरदार सिर्फ एक पड़ोसी महिला का नहीं है, बल्कि वह गोकुलधाम सोसाइटी की सबसे प्रगतिशील, सुलझी हुई और ग्लैमरस किरदार के रूप में स्थापित हैं। शो में वैज्ञानिक कृष्णन सुब्रमण्यम अय्यर की बंगाली पत्नी के रूप में उनके किरदार ने राष्ट्रीय स्तर पर उत्तर और दक्षिण भारत के सांस्कृतिक मिलन को बेहद खूबसूरती से पेश किया। मुनमुन दत्ता ने अपने अभिनय, संवाद अदायगी और पहनावे से इस रोल में जान फूंक दी।

उनके किरदार की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि उसमें कहीं भी फूहड़ता नहीं आने दी गई। जेठालाल के साथ उनकी कॉमिक टाइमिंग और जेठालाल के मन ही मन उन पर लट्टू होने के ट्रैक को जिस सादगी और गरिमा के साथ मुनमुन ने निभाया, उसने इस समीकरण को पूरे परिवार के साथ बैठकर देखने लायक मनोरंजन बना दिया। देश के कोने-कोने में, चाहे मेट्रो शहर हों या दूरदराज के गांव, लोग उन्हें मुनमुन के बजाय 'बबीता जी' के नाम से ही जानने और पुकारने लगे। यह किसी भी कलाकार के लिए सबसे बड़ा सम्मान माना जाता है कि दर्शक उसे उसके वास्तविक नाम से ज्यादा उसके किरदार से प्यार करने लगें।

सिर्फ एक अभिनेत्री नहीं, रियल लाइफ में बेबाक और स्वतंत्र महिला की पहचान

मुनमुन दत्ता केवल कैमरे के सामने ही प्रभावशाली नहीं हैं, बल्कि असल जिंदगी में भी वे एक स्वतंत्र, आत्मनिर्भर और बेबाक महिला के तौर पर जानी जाती हैं। वे सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय रहती हैं और सामाजिक मुद्दों, पशु अधिकारों और मानसिक स्वास्थ्य जैसे विषयों पर खुलकर अपनी राय रखती हैं। वे एक उत्साही ट्रैवलर हैं और दुनिया के दर्जनों देशों की यात्रा कर चुकी हैं। उनके ट्रैवल व्लॉग्स और लाइफस्टाइल कंटेंट को यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर लाखों प्रशंसकों द्वारा बेहद पसंद किया जाता है।

एक मध्यमवर्गीय परिवार से निकलकर बिना किसी गॉडफादर के मुंबई जैसे महानगर में अपना खुद का आशियाना बनाना, अपनी पहचान स्थापित करना और दो दशकों तक लगातार शीर्ष पर बने रहना मुनमुन दत्ता की कड़ी मेहनत और दृढ़ संकल्प का प्रमाण है। भले ही बॉलीवुड की फिल्मों ने उनके लिए अपने दरवाजे पूरी तरह नहीं खोले, लेकिन टेलीविजन के जरिए उन्होंने करोड़ों दर्शकों के दिलों में जो जगह बनाई है, वह किसी भी फिल्मी सुपरस्टार के रुतबे से कम नहीं है। मुनमुन दत्ता की यह यात्रा साबित करती है कि अगर प्रतिभा और लगन सच्ची हो, तो कोई भी माध्यम आपको इतिहास रचने से नहीं रोक सकता।