'टीवी एक्टर होकर फिल्में ठुकराता है, बड़ा घमंडी है...': जब सुपरस्टार यश ने करियर के शुरुआती दिनों में एक साथ रिजेक्ट कर दी थीं 7 फिल्में

'टीवी एक्टर होकर फिल्में ठुकराता है, बड़ा घमंडी है...': जब सुपरस्टार यश ने करियर के शुरुआती दिनों में एक साथ रिजेक्ट कर दी थीं 7 फिल्में

आज जब सिनेमाघरों में 'रॉकिंग स्टार' यश (Yash) का नाम स्क्रीन पर चमकता है, तो तालियों और सीटियों की गूंज से पूरा थिएटर दहल उठता है। 'KGF चैप्टर 1' और 'KGF चैप्टर 2' जैसी ऐतिहासिक ब्लॉकबस्टर फिल्मों के जरिए भारतीय सिनेमा के इतिहास को फिर से लिखने वाले यश आज पैन-इंडिया सिनेमा के सबसे बड़े ब्रांड बन चुके हैं। उनकी आगामी फिल्म 'टॉक्सिक: ए फेयरी टेल फॉर ग्रोन-अप्स' (Toxic) और नितेश तिवारी की महाकाव्य फिल्म 'रामायण' को लेकर पूरे देश में जिस स्तर का रोमांच और उत्सुकता है, वह किसी भी समकालीन अभिनेता के लिए एक सपना हो सकती है।

लेकिन चकाचौंध, करोड़ों के बॉक्स ऑफिस कलेक्शन और राष्ट्रीय ख्याति के इस मुकाम पर पहुंचने से बहुत पहले यश का सफर अस्वीकृतियों, आर्थिक तंगहाली और कड़वे अनुभवों से भरा हुआ था। अपने करियर के शुरुआती दिनों में जब यश छोटे पर्दे यानी टेलीविजन सीरियल्स में काम कर रहे थे, तब उन्होंने एक ऐसा कठोर और अकल्पनीय फैसला लिया था जिसके चलते पूरी फिल्म इंडस्ट्री ने उन पर 'घमंडी', 'अहंकारी' और 'अड़ियल' होने का ठप्पा लगा दिया था। यश ने उस दौर में एक साथ सात-सात फिल्मों के ऑफर्स को सीधे तौर पर ठुकरा दिया था।

जेब में महज 300 रुपये और आंखों में बड़े सपने: बस ड्राइवर के बेटे की बगावत

कर्नाटक के हासन जिले के एक बेहद सामान्य और मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे नवीन कुमार गौड़ा (यश) के पिता कर्नाटक राज्य सड़क परिवहन निगम (KSRTC) में एक साधारण बस ड्राइवर थे और मां एक गृहिणी थीं। परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी थी कि वे चाहते थे कि उनका बेटा कोई सुरक्षित सरकारी नौकरी या डिग्री हासिल कर परिवार का सहारा बने। लेकिन यश के मन में बचपन से ही अभिनेता बनने का जुनून सवार था।

जब उन्होंने अपने माता-पिता के सामने फिल्मों में जाने की इच्छा जाहिर की, तो परिजनों ने इसे बचकानी जिद समझकर खारिज कर दिया। आखिरकार, 16 वर्ष की उम्र में यश अपनी जेब में केवल 300 रुपये लेकर अपने घर से भागकर बेंगलुरु पहुंच गए। अनजान शहर में यश के पास न तो कोई जान-पहचान थी और न ही सिर छुपाने की कोई पक्की जगह। वे बेंगलुरु के मशहूर थिएटर ग्रुप 'बेनाका' (Benaka Drama Troupe) से जुड़े, जहां उन्होंने नाटकों के मंचन के दौरान बैकस्टेज वर्कर, लाइटमैन और चाय लाने जैसे बुनियादी काम किए ताकि वे रंगमंच और अभिनय की बारीकियों को करीब से सीख सकें।

टीवी के दिनों में एक साथ 7 फिल्में ठुकराने का किस्सा: क्यों भड़क उठे थे निर्माता-निर्देशक?

थिएटर में कड़ी मेहनत के बाद यश को कन्नड़ टेलीविजन धारावाहिकों में छोटे-मोटे रोल मिलने शुरू हुए। साल 2004 के आसपास ईटीवी कन्नड़ और अन्य चैनलों पर प्रसारित धारावाहिकों जैसे 'उत्तरायण' (Uttarayan), 'नंदा गोकुला' (Nanda Gokula) और मशहूर सीरियल 'प्रीति इल्लाद मेले' (Preeti Illada Mele) में यश के अभिनय और उनकी स्क्रीन प्रेजेंस ने दर्शकों का दिल जीत लिया। वे बहुत कम समय में कन्नड़ टीवी इंडस्ट्री के सबसे लोकप्रिय और चहेते युवा स्टार बन गए।

उस दौर में टेलीविजन पर यश की इस जबरदस्त टीआरपी और लोकप्रियता को भुनाने के लिए चंदनवन (कन्नड़ फिल्म उद्योग) के कई बड़े निर्माता और निर्देशक उनके पास अपनी फिल्मों के ऑफर्स लेकर आने लगे। किसी भी नवागंतुक और संघर्षरत कलाकार के लिए टीवी से फिल्मों में मुख्य अभिनेता के रूप में डेब्यू करना एक बहुत बड़ा सपना होता है। अधिकांश युवा अभिनेता फिल्मों में ब्रेक पाने के लिए कोई भी रोल स्वीकार कर लेते हैं, लेकिन यश का नजरिया बिल्कुल अलग था।

यश ने एक के बाद एक लगातार 7 फीचर फिल्मों के ऑफर्स को रिजेक्ट कर दिया। जब उनसे इसकी वजह पूछी गई, तो उन्होंने साफ कहा कि इन सभी फिल्मों की कहानियां घिसी-पिटी और बिना किसी लॉजिक की थीं। निर्माता केवल उनकी टीवी की लोकप्रियता का फायदा उठाकर एक सतही प्रेम कहानी या फॉर्मूला एक्शन फिल्म बनाकर मुनाफा कमाना चाहते थे, जिसमें किरदार के लिए कोई अभिनय की गुंजाइश नहीं थी।

यश के इस बोल्ड और बेबाक रुख से उस समय के दिग्गज फिल्ममेकर्स बुरी तरह नाराज हो गए। इंडस्ट्री के गलियारों में यह बातें फैलने लगीं कि "एक मामूली टीवी सीरियल का एक्टर खुद को सुपरस्टार समझ रहा है", "यह लड़का बहुत घमंडी और बदतमीज है", और "यह इंडस्ट्री में कभी टिक नहीं पाएगा।"

'काम न मिलना मंजूर था, लेकिन खराब काम करना नहीं': यश की वो अटूट जिद

सालों बाद एक राष्ट्रीय इंटरव्यू में अपने उस फैसले पर खुलकर बात करते हुए यश ने बताया था कि लोगों ने जिसे उनका 'घमंड' (Ego) समझा, वह वास्तव में उनका अपने क्राफ्ट के प्रति 'स्वाभिमान' (Self-Respect) और विजन था।

यश ने कहा था, "जब मैं टीवी कर रहा था, तो मुझे अच्छा पैसा और दर्शकों का भरपूर प्यार मिल रहा था। मेरे पास खाने के लिए रोटी थी। मैं केवल फिल्मों में आने के नाम पर किसी ऐसी घटिया स्क्रिप्ट का हिस्सा नहीं बनना चाहता था जिसे देखकर मेरे दर्शक ठगा हुआ महसूस करें। मैंने खुद से वादा किया था कि मैं जब भी बड़े पर्दे पर कदम रखूंगा, तो एक ऐसी कहानी के साथ आऊंगा जो लोगों के दिलों पर छाप छोड़े, भले ही इसके लिए मुझे कितना भी लंबा इंतजार क्यों न करना पड़े।"

यश को इस बात का पूरा भरोसा था कि यदि वे एक बार किसी गलत फिल्म में फंस गए, तो दर्शक उन्हें हमेशा के लिए खारिज कर देंगे। इसलिए उन्होंने निर्माताओं की नाराजगी की परवाह किए बिना अपनी शर्तों पर काम करने का फैसला किया।

'मोगिना मनसू' से शुरू हुआ बड़ा धमाका: साबित हुआ कि यश का फैसला सही था

लंबे इंतजार और 7 फिल्मों को ठुकराने के बाद साल 2008 में निर्देशक शशांक ने यश को फिल्म 'मोगिना मनसू' (Moggina Manasu) की स्क्रिप्ट सुनाई। यह एक मल्टी-स्टारर फिल्म थी जिसमें मुख्य भूमिका में राधिका पंडित थीं और यश को एक सहायक अभिनेता (Supporting Role) का किरदार ऑफर हुआ था।

इंडस्ट्री के कई लोगों ने यश को सलाह दी कि जब वे टीवी के लीड हीरो हैं, तो उन्हें फिल्म में सेकंड लीड या सपोर्टिंग रोल नहीं करना चाहिए। लेकिन यश को इस फिल्म की कहानी और अपने किरदार 'राहुल' की गहराई में दम नजर आया। उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के फिल्म साइन कर ली।

जब फिल्म रिलीज हुई, तो यह एक बहुत बड़ी क्रिटिकल और कमर्शियल हिट साबित हुई। यश के संवेदनशील और दमदार अभिनय की इतनी सराहना हुई कि उन्हें उस साल के फिल्मफेयर बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर (कन्नड़) के पुरस्कार से नवाजा गया। इस फिल्म की सफलता ने उन सभी आलोचकों और फिल्म निर्माताओं के मुंह पर हमेशा के लिए ताला लगा दिया जो यश को घमंडी कहते थे।

'रॉकी भाई' से 'टॉक्सिक' तक: जिद जब राष्ट्रीय क्रांति बन जाती है

'मोगिना मनसू' के बाद यश ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 'किराताका', 'ड्रामा', 'गूगली', 'गजाकेसरी' और 'मिस्टर एंड मिसेज रामाचारी' जैसी बैक-टू-बैक ब्लॉकबस्टर फिल्मों ने उन्हें कर्नाटक का सबसे बड़ा सुपरस्टार यानी 'रॉकिंग स्टार' बना दिया।

लेकिन यश की जिद केवल एक राज्य का स्टार बनने तक सीमित नहीं थी। जब उन्होंने निर्देशक प्रशांत नील के साथ मिलकर 'KGF' (कोलार गोल्ड फील्ड्स) की परिकल्पना की, तब भी पूरी भारतीय फिल्म इंडस्ट्री ने इसे पागलपन समझा था। किसी ने यह नहीं सोचा था कि कन्नड़ भाषा की कोई फिल्म पूरे भारत के बॉक्स ऑफिस पर 1200 करोड़ से अधिक की कमाई कर सकती है और बॉलीवुड व हॉलीवुड को हिलाकर रख सकती है। यह यश का वही अटूट आत्मविश्वास और अपनी कहानी पर भरोसा था, जिसने एक बार फिर इतिहास रच दिया।

आज यश अपनी आगामी फिल्म 'टॉक्सिक' (Toxic) की शूटिंग में व्यस्त हैं, जिसका निर्देशन मशहूर राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता निर्देशक गीतू मोहनदास कर रही हैं। KGF 2 के बाद दो साल तक कोई नई फिल्म साइन न करके सही स्क्रिप्ट का इंतजार करना यह साबित करता है कि यश के भीतर की वह 'कलाकार वाली जिद' आज भी उतनी ही जिंदा और बेदाग है।

युवा पीढ़ी के लिए एक अनमोल सीख: अपने विजन पर भरोसा रखें

यश की यह अनसुनी दास्तान यह सिखाती है कि दुनिया अक्सर उन लोगों को 'घमंडी' या 'अड़ियल' समझ लेती है जो भीड़ की तरह चलने से इनकार कर देते हैं और अपनी शर्तों पर अपनी किस्मत लिखना चाहते हैं।

यदि उस समय युवा यश ने तात्कालिक लालच या दबाव में आकर उन 7 औसत फिल्मों को स्वीकार कर लिया होता, तो शायद भारतीय सिनेमा को आज वह 'रॉकी भाई' कभी नहीं मिल पाता जिसने दुनिया भर में भारतीय सिनेमा का परचम लहराया। यश का यह सफर साबित करता है कि जब आपकी नीयत साफ हो, मेहनत सच्ची हो और अपने क्राफ्ट पर अटूट भरोसा हो, तो आपकी वही जिद एक दिन पूरी दुनिया के लिए मिसाल बन जाती है।

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