यूजीसी नेट जून परीक्षा के री-एग्जाम फैसले के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में क्यों दाखिल की गई याचिका

यूजीसी नेट जून परीक्षा के री-एग्जाम फैसले के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में क्यों दाखिल की गई याचिका

देशभर के विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में असिस्टेंट प्रोफेसर की पात्रता और जूनियर रिसर्च फेलोशिप (JRF) के लिए आयोजित होने वाली प्रतिष्ठित राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा यानी यूजीसी नेट (UGC NET 2026) एक बार फिर से कानूनी विवादों के घेरे में आ गई है। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) द्वारा जून सत्र की परीक्षा के कुछ विषयों के पेपर दोबारा कराए जाने के फैसले के खिलाफ अब अदालत का दरवाजा खटखटाया गया है। दिल्ली हाईकोर्ट ने परीक्षा में शामिल होने वाली एक अभ्यर्थी द्वारा दायर की गई याचिका पर बेहद गंभीर रुख अपनाते हुए केंद्र सरकार और एनटीए को आधिकारिक तौर पर नोटिस जारी कर दिया है। याचिकाकर्ता ने अदालत में यह दलील दी है कि बिना किसी ठोस और पारदर्शी प्रक्रिया के अचानक से परीक्षा को रद्द करके दोबारा री-एग्जाम कराने का फैसला पूरी तरह से मनमाना, अनुचित और उम्मीदवारों के मौलिक अधिकारों का हनन करने वाला है। इस कानूनी कदम के बाद से देश भर के उन लाखों परीक्षार्थियों की धड़कनें एक बार फिर तेज हो गई हैं जो अपनी परीक्षा की तैयारी पूरी कर चुके थे और अब नए सिरे से पैदा हुई इस असमंजस की स्थिति से खासे चिंतित नजर आ रहे हैं।

परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था एनटीए (NTA) के नियमों और बुलेटिन की अनदेखी करने का क्या लगाया गया है गंभीर आरोप?

दायर की गई याचिका में मुख्य रूप से यह आरोप लगाया गया है कि एनटीए ने यूजीसी नेट जून 2026 के सूचना बुलेटिन (Information Bulletin) में तय किए गए नियमों, उपबंधों और निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना ही अचानक से परीक्षा को दोबारा कराने का नोटिस जारी कर दिया। याचिकाकर्ता के वकीलों ने अदालत को बताया कि एजेंसी ने बिना यह बताए कि किस आधार पर और किन त्रुटियों की वजह से परीक्षा को रद्द किया जा रहा है, सीधे तौर पर री-टेस्ट की घोषणा कर दी, जो कि प्रशासनिक पारदर्शिता के सिद्धांतों के बिल्कुल विपरीत है। नियमों के उल्लंघन के इस मामले में अदालत ने प्राधिकारियों से यह स्पष्ट करने को कहा है कि क्या उनके द्वारा उठाया गया यह कदम तयशुदा वैधानिक दिशा-निर्देशों के दायरे में आता है या नहीं। छात्रों का भी यह मानना है कि यदि इस तरह से बिना पुख्ता कारणों के परीक्षा को बार-बार रद्द किया जाता रहेगा, तो इससे न केवल छात्रों का बहुमूल्य समय बर्बाद होगा बल्कि उनके मानसिक स्वास्थ्य और भविष्य पर भी इसका बहुत ही प्रतिकूल असर पड़ेगा।

अंग्रेजी, कॉमर्स और सोशियोलॉजी जैसे प्रमुख विषयों के प्रश्नपत्रों में आखिर किन गड़बड़ियों और त्रुटियों का हुआ था खुलासा?

गौरतलब है कि एनटीए ने पहले ही यह स्पष्ट किया था कि जून 2026 के दौरान आयोजित हुई परीक्षा में अंग्रेजी, कॉमर्स और सोशियोलॉजी विषयों के प्रश्नपत्रों में कई प्रकार की तथ्यात्मक, मुद्रण संबंधी (Typographical) और अनुवाद की गंभीर त्रुटियां पाई गई थीं। इन विषयों के पेपर में प्रमुख विद्वानों के नाम गलत तरीके से छापे जाने, पुस्तकों के नाम गार्बल होने, व्याकरण की अशुद्धियों और कई प्रश्नों के गलत अनुवाद होने की वजह से छात्रों की तरफ से भारी शिकायतें दर्ज कराई गई थीं। इन शिकायतों की जांच के लिए बनाई गई विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट के आधार पर ही एनटीए ने अंग्रेजी और कॉमर्स की परीक्षा 9 सितंबर तथा सोशियोलॉजी की परीक्षा 10 सितंबर को दोबारा आयोजित करने का फैसला लिया था। हालांकि, एक तरफ जहां कुछ छात्र इन गड़बड़ियों के कारण री-एग्जाम के पक्ष में थे, वहीं दूसरी तरफ वे छात्र जो अपनी परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन कर चुके थे, इस अचानक लिए गए फैसले से बेहद आहत और निराश नजर आ रहे हैं।

परीक्षा शुल्क रिफंड और आगामी सुनवाई को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने क्या दिए हैं महत्वपूर्ण निर्देश?

इस पूरे मामले की गंभीरता को समझते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने न केवल NTA और केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है, बल्कि पूर्व में हुई परीक्षा के लिए छात्रों द्वारा चुकाए गए परीक्षा शुल्क (Examination Fee) के रिफंड को लेकर भी उचित निर्णय लेने का निर्देश दिया है। अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए आगामी 6 अक्टूबर की तारीख मुकर्रर की है, जिस पर पूरे देश के छात्र समुदाय की नजरें टिकी हुई हैं। याचिका में यह भी मांग की गई है कि यदि अदालत री-एग्जाम के फैसले को सही भी मानती है, तो दोबारा परीक्षा देने वाले छात्रों से किसी भी प्रकार का अतिरिक्त शुल्क नहीं वसूला जाना चाहिए और पुराने पेपर के मूल्यांकन पर भी विचार किया जाना चाहिए। उच्च न्यायालय के इस रुख से यह साफ हो गया है कि आने वाले दिनों में शैक्षणिक परीक्षाओं और स्वायत्त संस्थाओं की कार्यप्रणाली को लेकर कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर और अधिक कड़े नियम तय किए जा सकते हैं, जिससे छात्रों के हितों की रक्षा पूरी सुरक्षा के साथ की जा सके।