डिग्री-डिप्लोमा के बाद भी क्यों नहीं मिल रही नौकरी? NITI आयोग ने खोली पोल, सिर्फ युवाओं को 1 साल में मिला रोजगार

डिग्री-डिप्लोमा के बाद भी क्यों नहीं मिल रही नौकरी? NITI आयोग ने खोली पोल, सिर्फ युवाओं को 1 साल में मिला रोजगार

आज के समय में देश के युवाओं के मन में सबसे बड़ा और डरावना सवाल यही है कि आखिरकार कॉलेजों से भारी-भरकम फीस देकर डिग्रियां और डिप्लोमा हासिल करने के बाद भी उन्हें मनमुताबिक नौकरियां क्यों नहीं मिल पा रही हैं? इस गंभीर और सुलगते हुए सवाल का जवाब खुद देश के नीति-निर्धारक संस्थान यानी नीति आयोग (NITI Aayog) ने अपने एक हालिया विश्लेषण में बेबाकी से रखा है। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, देश की शिक्षा प्रणाली और मौजूदा जॉब मार्केट के बीच एक बहुत बड़ा खपड़ा या स्किल गैप पैदा हो चुका है, जिसके कारण ग्रेजुएट्स की फौज तैयार होने के बावजूद उन्हें रोजगार नहीं मिल पा रहा है। आंकड़ों के चौंकाने वाले सच के मुताबिक, अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद के शुरुआती एक साल के भीतर केवल 8.25 प्रतिशत युवाओं को ही नियमित और संतोषजनक नौकरियां मिल पाती हैं, जबकि बाकी के युवा या तो बेरोजगार रहते हैं या फिर अंडर-एम्प्लॉयमेंट (कम वेतन वाली और योग्यता से कम स्तर की नौकरियों) का शिकार हो जाते हैं। इस सनसनीखेज खुलासे के बाद से देश भर के शैक्षणिक संस्थानों, विश्वविद्यालयों और युवाओं के भविष्य को लेकर एक बार फिर से राष्ट्रीय स्तर पर बहस छिड़ गई है।

पारंपरिक डिग्रियों और आधुनिक बाजार की स्किल डिमांड में भारी खाई

नीति आयोग द्वारा किए गए इस विस्तृत विश्लेषण में इस बात पर मुख्य रूप से जोर दिया गया है कि हमारे देश के विश्वविद्यालयों और कालेजों में पढ़ाई जाने वाली पारंपरिक पठन-पाठन शैली और आधुनिक इंडस्ट्री की वास्तविक जरूरतों के बीच जमीन-आसमान का फर्क है। आज के तकनीकी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) वाले दौर में कंपनियों को ऐसे युवाओं की तलाश होती है जिनके पास कोडिंग, डेटा एनालिटिक्स, क्रिटिकल थिंकिंग, डिजिटल मार्केटिंग और व्यावहारिक प्रॉब्लेम-सॉल्विंग स्किल्स जैसी आधुनिक क्षमताएं हों। इसके विपरीत, हमारे शिक्षण संस्थान आज भी दशकों पुराने सिलेबस और रटने की पुरानी पद्धति (Rote Learning) पर टिके हुए हैं। जब एक छात्र 3 से 4 साल की डिग्री या डिप्लोमा लेकर बाहर निकलता है, तो इंडस्ट्री के मानकों के हिसाब से वह पूरी तरह अनफिट साबित होता है। यही वह मूल कारण है जिसकी वजह से डिग्रियों के बंडल हाथ में होने के बावजूद युवाओं को कंपनियों के इंटरव्यू राउंड में निराशा हाथ लगती है।

सिर्फ 8.25% रोजगार दर: आंकड़ों के आईने में देश की उच्च शिक्षा का सच

नीति आयोग की इस रिपोर्ट में जो आंकड़े सामने आए हैं, वे किसी भी संवेदनशील नागरिक को झकझोर देने के लिए काफी हैं। रिपोर्ट के अनुसार, डिग्री और डिप्लोमा धारक युवाओं में से केवल 8.25 प्रतिशत युवाओं को ही अपनी पढ़ाई खत्म होने के पहले साल के भीतर गुणवत्तापूर्ण रोजगार मिल पाता है। बाकी के 90 प्रतिशत से अधिक युवा या तो लगातार नौकरियों की तलाश में भटकते रहते हैं, या फिर वे गिग इकॉनमी (डिलिवरी बॉय, कैब ड्राइवर या छोटे-मोटे संविदा कार्य) में कम वेतन पर काम करने के लिए मजबूर हो जाते हैं। इस स्थिति के कारण देश की युवा आबादी, जिसे 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' (जनसांख्यिकी लाभांश) कहा जाता है, वह वरदान साबित होने के बजाय एक सामाजिक और आर्थिक चुनौती बनता जा रहा है। यदि समय रहते इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में बेरोजगारी का यह संकट और अधिक विकराल रूप धारण कर सकता है।

संस्थानों और इंडस्ट्री के बीच तालमेल की भारी कमी

इस पूरे संकट के पीछे एक बहुत बड़ी वजह यह भी है कि हमारे देश के अधिकांश शैक्षणिक संस्थानों और कॉर्पोरेट जगत (Industry) के बीच संवाद और सहयोग का भारी अभाव है। पश्चिमी देशों या विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तर्ज पर हमारे यहां कैंपस प्लेसमेंट या इंटर्नशिप की व्यवस्था केवल चुनिंदा टॉप टियर (Tier-1) संस्थानों तक ही सीमित है। छोटे शहरों, टियर-2 और टियर-3 शहरों के कॉलेजों से निकलने वाले लाखों छात्रों को कभी यह पता ही नहीं चल पाता कि आज की तारीख में इंडस्ट्री की असल मांग क्या है। कॉलेज प्रशासन केवल डिग्री बांटने की फैक्ट्री बनकर रह गए हैं, जहां छात्रों को व्यावहारिक ज्ञान (Practical Knowledge) देने के बजाय केवल सैद्धांतिक किताबी बातें पढ़ाई जाती हैं। जब तक यूनिवर्सिटी और कंपनियां मिलकर मिलकर पाठ्यक्रम (Curriculum) तैयार नहीं करेंगी, तब तक इस समस्या का कोई स्थाई समाधान निकलना नामुमकिन है।

वोकेशनल ट्रेनिंग और स्किल डेवलपमेंट की सख्त जरूरत

नीति आयोग ने अपनी इस रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से यह सुझाव दिया है कि देश की शिक्षा नीति में अब आमूल-चूल परिवर्तन करने का समय आ गया है। स्कूली स्तर से लेकर उच्च शिक्षा तक केवल किताबी ज्ञान पर जोर देने के बजाय 'वोकेशनल ट्रेनिंग' (व्यावसायिक प्रशिक्षण) और स्किल डेवलपमेंट को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। सरकार और प्राइवेट सेक्टर को मिलकर ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाने चाहिए जहां युवाओं को शुरुआत से ही रियल-टाइम प्रोजेक्ट्स पर काम करने का मौका मिले। इसके अलावा, छात्रों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग और आधुनिक तकनीकी हुनर से लैस करना अब कोई विकल्प नहीं बल्कि एक अनिवार्यता बन चुका है।

युवाओं के लिए भविष्य की राह और नीति निर्माताओं के सामने चुनौती

डिग्री और डिप्लोमा के मोह से बाहर निकलकर अब युवाओं को भी इस कड़वी सच्चाई को स्वीकार करना होगा कि केवल एक कागजी डिग्री उन्हें नौकरी नहीं दिला सकती। सफलता हासिल करने के लिए उन्हें अपनी स्किल्स को लगातार अपग्रेड करना होगा और व्यावहारिक ज्ञान पर फोकस करना होगा। वहीं दूसरी ओर, केंद्र और राज्य सरकारों के नीति निर्माताओं के सामने यह एक बहुत बड़ी चुनौती है कि वे देश की शिक्षा व्यवस्था को कॉरपोरेट जगत की जरूरतों के मुताबिक ढालें, ताकि देश के करोड़ों युवा अपनी योग्यता के अनुसार सही मुकाम हासिल कर सकें और देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती दे सकें।

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