अंग्रेजों की उस खौफनाक जेल में लगी थी देश के पहले आईआईटी की पहली क्लास, जहां बैरक की दीवारों के बीच सिखाए गए थे टेक्निकल फॉर्मूले

अंग्रेजों की उस खौफनाक जेल में लगी थी देश के पहले आईआईटी की पहली क्लास, जहां बैरक की दीवारों के बीच सिखाए गए थे टेक्निकल फॉर्मूले

भारतीय शिक्षा के इतिहास के पन्नों को जब भी पलटा जाता है, तो देश के पहले भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान यानी आईआईटी (IIT) की स्थापना और उसके शुरुआती दिनों की कहानी हर किसी को हैरान कर देती है. क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि जिस संस्थान से निकलकर आज दुनिया भर की बड़ी-बड़ी टेक कंपनियों में युवा अपनी धाक जमा रहे हैं, उसकी शुरुआत देश के किसी भव्य आधुनिक परिसर से नहीं बल्कि अंग्रेजों के जमाने की एक बेहद खौफनाक और कुख्यात जेल की चारदीवारी के भीतर हुई थी? जी हाँ, यह एक ऐसा ऐतिहासिक सच है जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं कि स्वतंत्रता के तुरंत बाद जब देश में उच्च तकनीकी शिक्षा की नींव रखने की तैयारी चल रही थी, तब बुनियादी ढांचे और क्लासरूम की कमी के कारण देश की पहली आईआईटी की कक्षाएं एक पुरानी जेल के बैरकों में लगाई गई थीं. जहाँ कभी खूंखार कैदी और स्वतंत्रता सेनानी अंग्रेजों की प्रताड़ना सहते थे, उसी ऐतिहासिक परिसर में उस दौर के चुनिंदा मेधावी छात्रों को आधुनिक इंजीनियरिंग के टेक्निकल फॉर्मूले और विज्ञान के गुर सिखाए गए थे.

खड़गपुर का हिंसक इतिहास और हिजली डिटेंशन कैंप की कहानी

हम बात कर रहे हैं पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर जिले में स्थित हिजली (Hijli) की, जहाँ ब्रिटिश शासनकाल के दौरान एक कुख्यात नजरबंदी शिविर यानी डिटेंशन कैंप हुआ करता था. इस कैंप को ब्रिटिश हुकूमत ने उन स्वतंत्रता सेनानियों और राजनीतिक बंदियों को कैद रखने के लिए बनाया था जो देश की आजादी के लिए अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाते थे. इस जेल के भीतर सुरक्षा के इतने कड़े और खौफनाक इंतजाम थे कि अच्छे-अच्छे कैदी अंदर जाने से कांपते थे. लेकिन देश के आजाद होने के बाद, जब पंडित जवाहरलाल नेहरू और दूरदर्शी शिक्षाविदों ने देश में उच्च कोटि के तकनीकी संस्थानों की स्थापना का बीड़ा उठाया, तो पश्चिम बंगाल के इसी हिजली कैंप को चुना गया. इतिहास के इस खौफनाक पन्ने को एक नए और उज्जवल भविष्य के अध्याय में बदलने का फैसला किया गया, ताकि जिस जगह पर कभी गुलामी और यातनाओं की दास्तान लिखी जाती थी, वही जमीन आगे चलकर देश की तकनीकी आत्मनिर्भरता और विज्ञान के विकास का सबसे बड़ा मंदिर बन सके.

कैसे जेल के बैरक बन गए देश के पहले आईआईटी के क्लासरूम

वर्ष 1951 में जब 'इस्टर्न हायर टेक्निकल इंस्टीट्यूट' के रूप में देश के इस पहले संस्थान की स्थापना हुई, तो शुरुआत में इसके पास अपना कोई नया भवन या आधुनिक कैंपस नहीं था. ऐसी स्थिति में प्रशासन ने तेजी दिखाते हुए उसी ऐतिहासिक हिजली डिटेंशन कैंप के बड़े-बड़े बैरकों, कमरों और प्रशासनिक इमारतों को थोड़ा बहुत सुधार कर कक्षाओं में तब्दील कर दिया. जो बैरक कभी कैदियों के रहने की जगह हुआ करती थीं, उन्हें प्रयोगशालाओं (Labs) और लेक्चर हॉल्स में बदल दिया गया. उन पुरानी दीवारों के साये में देश के कोने-कोने से आए पहले बैच के छात्रों ने गणित, भौतिकी और इंजीनियरिंग के बुनियादी फॉर्मूलों को सीखना शुरू किया. छात्रों और शुरुआती प्रोफेसरों के लिए यह अनुभव बेहद रोमांचक और चुनौतीपूर्ण था, क्योंकि वे एक ऐसी जगह पर बैठकर देश का भविष्य गढ़ रहे थे जिसका अतीत गुलामी और संघर्ष की कहानियों से भरा पड़ा था. बाद में इसी संस्थान को उसका आधिकारिक नाम 'भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, खड़गपुर' (IIT Kharagpur) मिला और इसने देश को पहला आईआईटी कैंपस होने का गौरव प्रदान किया.

गुलामी की दास्तां से लेकर आत्मनिर्भर भारत के निर्माण तक का सफर

हिजली जेल से लेकर देश के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थान बनने तक का यह सफर इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि दृढ़ इच्छाशक्ति और विजन से किसी भी बदहाल या दर्दनाक इतिहास को देश के विकास की धुरी में बदला जा सकता है. आज जब कोई छात्र खड़गपुर आईआईटी के विशाल और आधुनिक परिसर में टहलता है, तो उसे शायद ही कभी इस बात का अंदाजा होता है कि इस भव्य संस्थान की नींव उन पुरानी और खौफनाक जेल की दीवारों के बीच रखी गई थी. यह स्थान हमें यह भी याद दिलाता है कि हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान और संघर्ष के बाद ही हमें यह आजादी मिली है, और उसी स्वतंत्र भारत की धरती पर आधुनिक विज्ञान की इमारत खड़ी की गई है. आज यह ऐतिहासिक स्थल देश के हर युवा इंजीनियर के लिए एक प्रेरणास्रोत है, जो यह सिखाता है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अगर उद्देश्य साफ हो, तो इतिहास के पन्नों को नए सिरे से लिखकर एक महान भविष्य का निर्माण किया जा सकता है.

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