विदेश में MBBS करने वालों को NMC ने कंफ्यूज किया

विदेश में MBBS करने वालों को NMC ने कंफ्यूज किया

विदेश में मेडिकल की पढ़ाई कर रहे और डॉक्टरी की डिग्री हासिल कर चुके हजारों भारतीय छात्रों के भविष्य पर एक बार फिर अनिश्चितता और असमंजस के बादल मंडराने लगे हैं। देश में मेडिकल शिक्षा की सर्वोच्च नियामक संस्था राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) द्वारा विदेशी मेडिकल ग्रेजुएट्स (FMGs) की डिग्री की मान्यता को लेकर दिए गए दो विरोधाभासी बयानों और जवाबों ने छात्रों और उनके परिजनों की नींद उड़ा दी है। सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मांगी गई जानकारी के जवाब में एनएमसी द्वारा अलग-अलग समय पर दिए गए दो अलग-अलग उत्तरों ने विदेश से डॉक्टरी पढ़कर लौटे छात्रों के सामने बड़ा भ्रम खड़ा कर दिया है, जिससे उनके भारत में प्रैक्टिस करने के अधिकार पर सीधा सवालिया निशान लग गया है।

NMC के दो अलग-अलग जवाब: आखिर क्या है विदेशी मेडिकल डिग्री की मान्यता पर असमंजस?

पूरे विवाद की जड़ राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) द्वारा जारी किए गए दो अलग-अलग स्पष्टीकरण हैं। सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत दायर आवेदनों के जवाब में जब छात्रों ने विदेशी मेडिकल कॉलेजों की मान्यता, इंटर्नशिप की अवधि और लाइसेंसिंग नियमों से जुड़े सवाल पूछे, तो आयोग के विभिन्न विभागों ने परस्पर विरोधी जानकारियां प्रदान कीं। एक तरफ एक जवाब में कुछ विदेशी विश्वविद्यालयों के मेडिकल पाठ्यक्रमों को 'लाइसेंसिंग विनियम 2021' (FMGL Regulations 2021) के तहत पूरी तरह से वैध और मान्यता प्राप्त बताया गया, वहीं दूसरी ओर दूसरे जवाब में उन्हीं योग्यताओं या समान अध्ययन अवधि को अमान्य या अतिरिक्त शर्तों के अधीन करार दे दिया गया। इस विरोधाभास ने रूस, यूक्रेन, फिलीपींस, कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान और जॉर्जिया जैसे देशों से एमबीबीएस (MBBS) की पढ़ाई कर रहे छात्रों के बीच भारी भ्रम पैदा कर दिया है।

FMGL विनियम 2021 और 54 महीने का नियम: क्यों फंसा हुआ है हजारों छात्रों का पेंच?

राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग द्वारा 18 नवंबर 2021 को लागू किए गए 'फॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट लाइसेंसिंग रेगुलेशन' (FMGL Regulations 2021) के अनुसार, विदेश से एमबीबीएस करने वाले छात्रों के लिए कुछ सख्त शर्तें तय की गई थीं। इसके तहत कम से कम 54 महीने (4.5 साल) का थ्योरी व प्रैक्टिकल कोर्स, उसी देश में 12 महीने की अनिवार्य इंटर्नशिप और संबंधित देश के मेडिकल बोर्ड में प्रैक्टिस करने के लिए रजिस्ट्रेशन (लाइसेंस) होना अनिवार्य है। हालांकि, कोरोना महामारी और रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद कई देशों ने अपनी क्रेडिट प्रणाली और ऑनलाइन या ऑफलाइन कक्षाओं में बदलाव किए। जब भारतीय छात्रों ने एनएमसी से पूछा कि क्या युद्ध प्रभावित या ऑनलाइन माध्यम से पूरी की गई अवधियों को 54 महीने के नियम में गिना जाएगा, तो एनएमसी के अस्पष्ट और विरोधाभासी जवाबों ने छात्रों के करियर को अधर में लटका दिया।

विदेशी मेडिकल ग्रेजुएट्स की बढ़ी मुश्किलें: भारत में स्क्रीनिंग टेस्ट और रजिस्ट्रेशन पर मंडराया संकट

विदेशी मेडिकल कॉलेजों से पढ़ाई पूरी करके लौटने वाले भारतीय छात्रों को भारत में डॉक्टरी का अभ्यास करने या पीजी (PG) करने के लिए फॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट एग्जामिनेशन (FMGE) या आगामी नेशनल एग्जिट टेस्ट (NExT) पास करना अनिवार्य होता है। लेकिन एनएमसी द्वारा डिग्री की वैधता पर दिए गए भ्रमित करने वाले बयानों के कारण कई राज्यों की स्टेट मेडिकल काउंसिलों ने छात्रों को प्रोविजनल रजिस्ट्रेशन देने और 2 साल की अनिवार्य इंटर्नशिप आवंटित करने में हाथ खड़े करना शुरू कर दिया है। पढ़ाई में लाखों रुपये खर्च करने और सालों की मेहनत के बाद भी छात्रों को रजिस्ट्रेशन प्रमाणपत्र के लिए दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं।

छात्रों और अभिभावकों का फूटा गुस्सा: एनएमसी से तत्काल स्पष्ट गाइडलाइन्स जारी करने की मांग

एनएमसी के इस दोहरे रवैये और ढुलमुल रवैये से नाराज ऑल ऑल इंडिया फॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट्स एसोसिएशन (AIFMGA) और कई छात्र संगठनों ने केंद्र सरकार और स्वास्थ्य मंत्रालय से तुरंत हस्तक्षेप करने की गुहार लगाई है। अभिभावकों का कहना है कि अगर देश की सर्वोच्च नियामक संस्था ही किसी नियम पर एक राय नहीं रख सकती, तो छात्रों को किस आधार पर दोषी ठहराया जा सकता है? एसोसिएशन ने मांग की है कि एनएमसी अपने विभिन्न आरटीआई जवाबों और परिपत्रों पर सार्वजनिक रूप से एक व्यापक, स्पष्ट और एकमुश्त गजट नोटिफिकेशन जारी करे, जिससे देश और विदेश में पढ़ रहे मेडिकल स्टूडेंट्स को सही व सटीक जानकारी मिल सके और उनका भविष्य बर्बाद होने से बच सके।