डिग्री या इंसानियत? सर्वपल्ली राधाकृष्णन के शिक्षा दर्शन से समझिए असल तालीम का पैगाम, आज के दौर में क्यों है सबसे ज्यादा जरूरी

डिग्री या इंसानियत? सर्वपल्ली राधाकृष्णन के शिक्षा दर्शन से समझिए असल तालीम का पैगाम, आज के दौर में क्यों है सबसे ज्यादा जरूरी

आज की आधुनिक जीवनशैली और प्रतिस्पर्धी दौर में शिक्षा की परिभाषा महज अच्छे अंक हासिल करने, बड़ी डिग्रियों का संग्रह करने और मोटे सैलरी पैकेज वाली नौकरी पाने तक सिमट कर रह गई है। स्कूल से लेकर उच्च शिक्षण संस्थानों तक हर जगह केवल करियर और आर्थिक सफलता की होड़ मची है। लेकिन क्या केवल किताबी ज्ञान और डिग्रियों का ढेर किसी व्यक्ति को वास्तव में शिक्षित बना सकता है? जब समाज में उच्च शिक्षित लोगों द्वारा संवेदनहीनता, लालच और असहिष्णुता जैसी घटनाएं सामने आती हैं, तब यह बुनियादी सवाल उठना लाजिमी हो जाता है कि आखिर पढ़ाई का असली मकसद क्या है। इसी जटिल प्रश्न का सबसे सटीक और शाश्वत उत्तर भारत के पूर्व राष्ट्रपति, महान दार्शनिक और शिक्षक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के शिक्षा दर्शन में मिलता है।

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का शिक्षा दर्शन: केवल ज्ञान नहीं, चरित्र निर्माण है आधार

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का स्पष्ट मानना था कि शिक्षा का उद्देश्य केवल मस्तिष्क को सूचनाओं से भरना नहीं है, बल्कि व्यक्ति के अंतःकरण को जागृत करना है। उनका प्रसिद्ध विचार था कि यदि शिक्षा मनुष्य को एक बेहतर, करुणामयी और नैतिक इंसान नहीं बना सकती, तो वह शिक्षा अधूरी और व्यर्थ है। उन्होंने हमेशा इस बात पर जोर दिया कि तालीम ऐसी होनी चाहिए जो व्यक्ति को केवल आजीविका कमाना न सिखाए, बल्कि जीवन जीना सिखाए। जब तक शिक्षा में मानवीय मूल्य, दया, सत्य और सहिष्णुता शामिल नहीं होंगे, तब तक समाज का वास्तविक विकास संभव नहीं है। राधाकृष्णन के अनुसार, एक शिक्षित व्यक्ति वह नहीं है जिसके पास डिग्रियों का पुलिंदा है, बल्कि वह है जो समाज के कमजोर वर्ग के प्रति संवेदनशील है और अन्याय के खिलाफ खड़ा होने का नैतिक साहस रखता है।

आधुनिक युग में राधाकृष्णन के विचारों की प्रासंगिकता और भविष्य की राह

आज के सूचना क्रांति और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के दौर में राधाकृष्णन के विचार पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो चुके हैं। तकनीकी कौशल और पेशेवर दक्षता निसंदेह जीवन यापन के लिए जरूरी हैं, लेकिन तकनीक का सही उपयोग वही व्यक्ति कर सकता है जिसके भीतर मानवीय संवेदनाएं जीवित हों। अगर किसी डॉक्टर के पास बड़ी डिग्री है मगर मरीज के प्रति हमदर्दी नहीं, या किसी इंजीनियर के पास ज्ञान है मगर पर्यावरण और समाज के प्रति जिम्मेदारी का भाव नहीं, तो ऐसी शिक्षा अंततः विनाशकारी सिद्ध होती है। इसलिए आधुनिक शिक्षा प्रणाली को अब केवल परिणाम-केंद्रित होने के बजाय मूल्य-आधारित बनना होगा। हमें अपनी आने वाली पीढ़ी को यह सिखाना होगा कि डिग्रियां आपको पद दिला सकती हैं, लेकिन इंसानियत ही आपको सच्चा सम्मान और आत्मिक शांति दिला सकती है।