आईआईटी-जेईएम की तर्ज पर अब साल में दो बार होंगी नीट और सीयूईटी परीक्षाएं
भारत की शिक्षा व्यवस्था में आने वाले समय में कुछ सबसे बड़े, क्रांतिकारी और ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिलने वाले हैं, जिससे देश के करोड़ों छात्र-छात्राओं और उनके अभिभावकों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है। देश के इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा यानी आईआईटी-जेईएम (IIT-JEE) की तर्ज पर अब देश की दो सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षाएं यानी मेडिकल के लिए नीट (NEET) और केंद्रीय विश्वविद्यालयों के स्नातक पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए सीयूईटी (CUET) को भी साल में दो बार आयोजित किए जाने पर विचार किया जा रहा है। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) देश के समग्र शिक्षा ढांचे को आधुनिक, लचीला और छात्र-अनुकूल बनाने के लिए एक व्यापक कार्य योजना तैयार कर रहे हैं। वर्तमान शिक्षा प्रणाली में छात्रों पर परीक्षा के समय पड़ने वाले अत्यधिक मानसिक दबाव, तनाव और एक साल बर्बाद हो जाने के डर को खत्म करने के उद्देश्य से यह कदम उठाया जा रहा है। यदि यह प्रस्ताव पूरी तरह से धरातल पर उतर जाता है, तो इससे न केवल छात्रों को अपनी क्षमता दिखाने के ज्यादा अवसर मिलेंगे, बल्कि प्रवेश प्रक्रियाओं में भी अभूतपूर्व पारदर्शिता और सुगमता आएगी। देश भर के शिक्षण संस्थानों, कोचिंग संस्थानों और छात्र संगठनों के बीच इस संभावित बदलाव को लेकर अभी से चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है और हर कोई इस नीति के लागू होने का बेसब्री से इंतजार कर रहा है।
जानिए क्यों महसूस की जा रही है देश में नीट और सीयूईटी को साल में दो बार कराने की जरूरत
पिछले कुछ वर्षों में भारत में प्रतियोगी परीक्षाओं का दायरा और उनमें बैठने वाले उम्मीदवारों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है। हर साल लाखों छात्र डॉक्टर या इंजीनियर बनने का सपना लेकर दिन-रात मेहनत करते हैं और नीट या जेईई जैसी परीक्षाओं में शामिल होते हैं। लेकिन मौजूदा व्यवस्था के तहत साल में केवल एक बार परीक्षा होने के कारण यदि किसी छात्र का स्वास्थ्य खराब हो जाता है, परीक्षा के दिन कोई अप्रिय घटना घट जाती है, या मामूली अंकों से उसका चयन छूट जाता है, तो उसे अपनी असफलता का बोझ उठाने के लिए पूरा एक साल इंतजार करना पड़ता है। इसी एक साल के लंबे अंतराल के कारण कई युवा अत्यधिक मानसिक तनाव, अवसाद और निराशा के शिकार हो जाते हैं। शिक्षाविदों और मनोवैज्ञानिकों का लंबे समय से यह सुझाव रहा है कि यदि पश्चिमी देशों की तर्ज पर भारत में भी प्रमुख प्रवेश परीक्षाएं साल में दो बार आयोजित की जाएं, तो छात्रों पर से 'करो या मरो' का मानसिक दबाव काफी हद तक कम हो जाएगा। शिक्षा मंत्रालय ने छात्रों के हित में उठाए जाने वाले इस कदम को गंभीरता से लेते हुए विभिन्न विशेषज्ञों और स्टेकहोल्डर्स के साथ उच्च स्तरीय विचार-विमर्श शुरू कर दिया है।
आईआईटी-जेईएम (IIT-JEE) के सफल मॉडल से प्रेरणा ले रहा है शिक्षा मंत्रालय
इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा के क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों से जेईई मेन (JEE Main) का आयोजन साल में दो सत्रों (Sessions) में सफलतापूर्वक किया जा रहा है। इस व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ है कि छात्रों को अपने स्कोर में सुधार करने का दूसरा मौका मिल जाता है। यदि कोई छात्र जनवरी या अप्रैल सत्र में से किसी एक में बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाता है, तो वह दूसरे प्रयास में अपनी कमियों को सुधारकर अपने स्कोर को बेहतर कर सकता है। शिक्षा मंत्रालय अब इसी सफल मॉडल को देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा 'नीट' (NEET-UG) और देश भर के विश्वविद्यालयों के लिए होने वाली सामान्य प्रवेश परीक्षा 'सीयूईटी' (CUET-UG) पर भी लागू करने की योजना बना रहा है। इस बहु-प्रतीक्षित बदलाव के तहत छात्रों को यह स्वतंत्रता होगी कि वे साल में मिलने वाले दोनों अवसरों में से जिसमें चाहें बैठ सकते हैं या दोनों में अपना भाग्य आजमा सकते हैं। जिस परीक्षा में उनका सर्वश्रेष्ठ स्कोर होगा, उसे अंतिम प्रवेश के लिए मान लिया जाएगा। इस प्रणाली से न केवल परीक्षा के प्रति छात्रों का डर कम होगा, बल्कि उच्च शिक्षा तक उनकी पहुंच भी अधिक सुगम हो जाएगी।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के विजन के अनुरूप शिक्षा प्रणाली में हो रहे हैं व्यापक सुधार
भारत सरकार द्वारा लाई गई नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) का मुख्य उद्देश्य देश की पारंपरिक और रट्टा मार शिक्षा पद्धति को समाप्त करके उसे अधिक व्यावहारिक, लचीला और कौशल-आधारित बनाना है। शिक्षा मंत्रालय के उच्चाधिकारियों का मानना है कि परीक्षा प्रणाली को इस तरह से डिजाइन किया जाना चाहिए जो छात्रों की असली प्रतिभा और ज्ञान का मूल्यांकन करे, न कि उनके परीक्षा हॉल के एक दिन के तनाव की परीक्षा ले। साल में दो बार परीक्षाओं का आयोजन होने से परीक्षा केंद्रों पर अचानक पड़ने वाला भारी प्रशासनिक दबाव भी दो हिस्सों में बंट जाएगा, जिससे एनटीए (NTA) और अन्य परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसियों को भी बेहतर प्रबंधन करने का अवसर मिलेगा। हालांकि, दो बार परीक्षा कराने के इस बड़े प्रोजेक्ट को लागू करने के लिए तकनीकी बुनियादी ढांचे, कंप्यूटर लैब्स की उपलब्धता, प्रश्नपत्रों के मानकीकरण और सुरक्षा के पुख्ता इंतजामों पर गहन मंथन चल रहा है ताकि किसी भी प्रकार की गड़बड़ी या तकनीकी खामी की कोई गुंजाइश न बचे।
छात्रों, अभिभावकों और कोचिंग इंडस्ट्री की इस बड़े बदलाव पर क्या है प्रतिक्रिया
शिक्षा मंत्रालय द्वारा नीट और सीयूईटी को साल में दो बार कराए जाने की इस सुगबुगाहट ने देश भर के छात्र-छात्राओं और उनके अभिभावकों में एक नई उम्मीद जगा दी है। ग्रामीण और दूर-दराज के इलाकों से आने वाले वे छात्र जो एक ही मौके के दबाव में अक्सर घबरा जाते थे, वे इस बदलाव से बेहद राहत महसूस कर रहे हैं। दूसरी ओर, देश की कोचिंग इंडस्ट्री और शिक्षण संस्थान भी इस बात की तैयारी कर रहे हैं कि यदि परीक्षा साल में दो बार होती है, तो उनके शैक्षणिक कैलेंडर (Academic Calendar) और पाठ्यक्रम के रिवीजन की रणनीतियों में किस प्रकार के बदलाव करने होंगे। विशेषज्ञों का सुझाव है कि इस व्यवस्था को लागू करते समय यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि दोनों सत्रों के प्रश्नपत्रों के कठिनाई स्तर (Difficulty Level) में अधिक अंतर न हो, ताकि किसी भी छात्र के साथ मूल्यांकन के दौरान पक्षपात की स्थिति न बने। कुल मिलाकर, शिक्षा मंत्रालय का यह कदम भारतीय शिक्षा व्यवस्था को वैश्विक मानकों के अनुरूप ढालने और छात्रों के भविष्य को सुरक्षित करने की दिशा में एक बहुत ही दूरदर्शी और सराहनीय प्रयास साबित हो सकता है।